5 डर जिनके चलते दहशत में अफगानिस्तान से भाग रहे हैं लोग

नई दिल्ली, 16 अगस्त: अफगानिस्तान के लाखों अमन-पसंद लोगों का बुरा सपना सच हो गया है। उनकी जिंदगी एकबार फिर से दो दशक से पहले फ्लैश बैक वाली स्थिति में चली गई है। अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के दौरान वहां जो बच्चे पैदा लिए हैं, उन्हें अपने माता-पिता से उन खौफनाक मंजरों की कहानियां सुनने को मिल रही हैं। उन्हें लग रहा है कि अब अफगानिस्तान में रहना मतलब मौत। अफगानिस्तान से डर के मारे भागने वाले लोगों में 5 वजहों से खौफ है। इसके पीछे उनकी बदकिस्मती तो है ही, उनकी सरकार और वैश्विक समुदाय भी कम दोषी नहीं है।

अमेरिका की विश्वसनीयता खत्म

अमेरिका की विश्वसनीयता खत्म

अफगानिस्तान में तालिबान के आतंकियों के सामने अमेरिका की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। दो दिन पहले की बात है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने दावा किया था कि काबुल पर कब्जा करने में तालिबान को 90 दिन लग जाएंगे। यही नहीं उन्होंने बाजी पलटने की संभावना से भी इनकार नहीं किया था। तालिबान को काबुल में राष्ट्रपति के महल पर कब्जे में उसके बाद दो दिन भी नहीं लगे। अमेरिका 20 साल तक अफगानिस्तान में डेरा जमाए रहा। लेकिन, आखिरकार उसने अपनी फजीहत तो करवाई ही है, अफगान सरकार का साथ देने वाले लाखों अफगानियों की जान को भी खतरे में डाल दिया है। अफगानिस्तान से लोगों के बेतहाशा भागने का यह बहुत बड़ा कारण है। जो बाइडेन प्रशासन ने 31 अगस्त तक अपने सैनिकों को वापस करने की मियाद तय की थी, लेकिन उससे पहले भी वो अफगानिस्तानी राष्ट्रपति तक की रक्षा नहीं कर पाई। रविवार रात तक काबुल में स्थिति ऐसी हो चुकी थी कि अमेरिका को 65 से ज्यादा देशों के साथ तालिबान से गुहार लगानी पड़ गई कि जो अफगानी मुल्क छोड़ना चाहते हैं, उन्हें आसानी से निकलने का रास्ता दें। जाहिर है कि जिसके भरोसे दो दशक गुजार दिया, जब उसी ने अपनी स्थिति दयनीय बना ली है तो उनका साथ देने वालों में दहशत बढ़ना लाजिमी है।

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    देश छोड़कर भाग गए राष्ट्रपति अशरफ गनी

    देश छोड़कर भाग गए राष्ट्रपति अशरफ गनी

    तालिबान के आतंकियों ने जब रविवार को राजधानी काबुल को चारों तरफ से घेर लिया तो अफगानिस्तानी राष्ट्रपति नागरिकों को उनकी किस्मत के भरोसे छोड़कर देश से भाग गए। कहा जा रहा है कि उन्होंने पहले पड़ोसी देश ताजिकिस्तान में जाकर शरण लेने की कोशिश की। बात नहीं बनी तो वो ओमान के रास्ते अमेरिका जाने की कोशिशों में जुट गए। जबकि, दो-तीन दिन पहले तक वह अफगानियों के सामने सही तथ्य नहीं रख रहे थे। तालिबान मजार-ए-शरीफ पहुंचना वाला था, तो वे भी वहां जाकर उन्होंने अपने सैनिकों से डटे रहने को कहा। जबकि, सच्चाई ये थी कि महज 10 दिनों में अफगानिस्तान के सभी बड़े शहरों पर कब्जा कर लिया गा था। हजारों की तादाद में अफगानी सैनिक हथियार डालते जा रहे थे। उन्हें तालिबान के खिलाफ डटे रहने के लिए गनी की सरकार मिलिट्री सपोर्ट नहीं पहुंचा पा रही थी। जाहिर है कि जिस राष्ट्रपति के आश्वसानों पर नागरिक अबतक भरोसा कर रहे थे और वही अचानक भाग खड़ें हों तो अफगानी पर क्या गुजर रही होगी इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने फेसबुक पर सिर्फ यह बयान देकर अपने हाथ खड़े कर लिए हैं, 'तालिबान अपनी तलवारों और बंदूकों के दम पर जीत गया है और अपने देश के नागरिकों के सम्मान, संपत्ति और आत्म-संरक्षण के लिए वही जिम्मेदार हैं।' जिन नागरिकों ने तालिबान के खिलाफ सरकार का साथ दिया, जब सरकार के मुखिया नागरिकों की सोचे बिना अपनी जान बचाकर भाग गया तो लोगों में दहशत नहीं होगी तो क्या होगी।

    तालिबान यानी इस्लाम की कट्टरता का क्रूर ब्रांड

    तालिबान यानी इस्लाम की कट्टरता का क्रूर ब्रांड

    आम अफगानियों और अफगानिस्तान में रह रहे विदेशी नागरिकों के मन में तालिबान की क्रूरता की दहशत कैसी है, उसे सोशल मीडिया पर काबुल एयरपोर्ट से रविवार रात की आई तस्वीरों से ज्यादा अच्छी तरह से बयां नहीं किया जा सकता। हवाई जहाजों में घुसने के लिए लोग जिस तरह से मचल रहे थे, वैसी तस्वीर शायद इस दुनिया ने कभी नहीं देखी होगी। भारत के बंटवारे के दौरान ट्रेनों के उस खौफनाक मंजर की यादें अभी भी सोशल मीडिया पर ताजी हो जाती हैं। लेकिन, हवाई जहाज में भेड़-बकरियों की तरह घुसने की कोशिश कर रहे लोगों को किसी ने नहीं देखा होगा। यह दहशत है तालिबान का। मुस्लिम शासन की आड़ में उसकी क्रूरता का। काबुल पर अपनी जीत की घोषणा करते हुए तालिबान के को-फाउंटर अब्दुल गनी बरादर ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर कहा है, 'अब समय है परखने और साबित करने का, अब हमें यह दिखाना होगा कि हम अपने देश की सेवा कर सकते हैं....' अब तालिबान तय करेगा कि महिला घरों से बाहर निकलेंगी तो उसके लिए शर्तें क्या होंगी। यह तालिबान बताएगा कि पुरुषों ने दाढ़ी नहीं रखी तो उसका अंजाम क्या होगा? तालिबान के इस्लामिक कानून के तहत अफगानी लड़कियां स्कूल जा सकेंगी या नहीं? किसी महिला पर यदि व्यभिचार के आरोप लग गए तो क्या उसे स्टेडियम में फिर से पत्थर मार-मार कर मार दिया जाएगा? यह तालिबान का इतिहास है और फिर से यह सब देखने के लिए कोई वहां रहने को तैयार नहीं है।

    अफगानिस्तान को सबने अकेला छोड़ दिया

    अफगानिस्तान को सबने अकेला छोड़ दिया

    रविवार को तालिबान ने जिस तरह से काबुल पर नियंत्रण किया, उसकी इतनी जल्दी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। हजारों पुलिस वाले और सरकारी अधिकारियों ने अचानक अपना पद छोड़ दिया। वर्दी छोड़ दी और हथियार डालकर जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए। तालिबान ने पहले कहा था कि उसने अपने आतंकियों को काबुल में घुसने से मना किया है। लेकिन, रविवार रात वह सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर दाखिल हो गए और राष्ट्रपति पैलेस पर कंट्रोल कर लिया। पिछले कई हफ्तों में जिन हजारों लोगों ने काबुल को सबसे सुरक्षित मानकर शरण लिया था, चंद घंटे में ही उनके सामने जिंदगी और मौत नाचनी शुरू हो गई। अफगानिस्तान में मौजूद ऐसे लोगों को दुनिया ने उनके हाल पर छोड़ दिया है। अगर बचकर निकल गए तो हो सकता है कि पूरी जिंदगी जी लें। वहां रहे तो अंजाम सिर्फ तालिबान को मालूम है।

    तालिबान की दहशत का इतिहास

    तालिबान की दहशत का इतिहास

    अफगानिस्तान के लोगों के मन में एकबार फिर से 23 साल पहले वाली दहशत घर कर चुकी है। बात 1998 की है। तालिबान के आतंकवादियों ने राजधानी काबुल पर कब्जा किया तो देश में इस्लामिक कानूनों के मुताबिक एक से बढ़कर एक डराने वाले फरमान जारी करने शुरू कर दिए। सत्ता में आते ही शरिया कानून शुरू किया गया, जिन्होंने भी नाफरमानी की उन्हें सरेआम सजा दी जाने लगी। तालिबान के खिलाफ आवाज उठाई तो चौराहे पर लटका दिया जाता था। हत्या और यौन अपराधों के मामले में सड़कों पर खून बहाए जाने लगे। चोरी करने वालों के शरीर का अंग काट दिया जाता था। तो कई गुनाहों के लिए आरोपियों को सड़कों पर कोड़े मारे जाते थे। टीवी, संगीत और सिनेमा बंद कर दिए गए तो घरों की खिड़कियों पर भी काले रंग चढ़ा दिए गए। बच्ची 10 साल की हो जाती थी तो स्कूल जाना भी बंद कर दिया जाता था। धार्मिक कट्टरता की सबसे खौफनाक मिसाल दुनिया ने तब देखी थी, जब बामियान में महात्मा बुद्ध की ऐतिहासिक भव्य प्रतिमा जिसे चट्टान काटकर सदियों पहले तराशा गया था, उसे भंग कर दिया गया। लेकिन, उस तालिबान शासन को भी पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई ने मान्यता दे दी थी।

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