विश्व महिला दिवस: वे काम जिनसे महिलाएं बनती हैं सशक्त

विश्व महिला दिवस: वे काम जिनसे महिलाएं बनती हैं सशक्त

कई औरतें सबसे ज़्यादा सशक्त और आज़ाद तब महसूस करती हैं जब वो अकेली कहीं जाती हैं.

पढ़िए उन महिलाओं के अनुभव जो एक दिन घर से अकेली ही घूमने निकल पड़ीं, जिसके बाद से उनकी ज़िंदगी के सफ़र को एक अलग ही दिशा मिली. जहाँ जाकर उन्होंने सिर्फ़ अपनों की ही नहीं बल्कि ख़ुद की भी ख़ुशी और ख्वाहिशों का ख़याल रखना सीख लिया है.

विश्व महिला दिवस: वे काम जिनसे महिलाएं बनती हैं सशक्त

जूही परमार, अभिनेत्री

जब मैं अकेले घूमने जाती हूँ तो आज़ाद महसूस करती हूँ. इससे मुझे ख़ुद के साथ वक़्त बिताने और दुनिया को अपने नज़रिए से देखने का मौक़ा मिलता है.

मैं पूरी तरह बेख़ौफ़ होकर नए लोगों से मिलती हूं, सीखती हूं और दुनिया को एक नए नज़रिए से समझती हूं.

विश्व महिला दिवस: वे काम जिनसे महिलाएं बनती हैं सशक्त

प्रियंका मेहरोत्रा, बिज़नेसवुमन

मैं हमेशा से अकेले और इंडिपेंडेंट होकर घूमना चाहती थी और मैंने अपनी ये ख्वाहिश आख़िरकार दिसंबर 2014 में पूरी की.

मैं अकेली यूरोप घूमने गई. मैं पहली बार अकेले बेल्जियम गई थी. जब मैं अकेले घूमी तो मैंने ख़ुद के बारे में कई ऐसी चीज़ें जानी जिनसे मैं पहले अनजान थी. मैंने सिर्फ़ बाहरी दुनिया को नहीं बल्कि अपने अंदर की दुनिया को भी जाना.

इसने मुझे ख़ुद के साथ ही ख़श रहना सिखाया और मैंने हर हाल में हर पल को खुलकर जीना सीखा.

बसें छूटीं, ट्रेन के ग़लत टिकट ख़रीदे, फ्रेंच फ्राई खाकर काम चलाया, अंग्रेज़ी ना जानने वालों से इशारों में बातें की, बहुत ज़्यादा ठंड से जूझी - इन सभी अनुभवों ने मुझे सिखाया कि हमारे पास हमेशा एक विकल्प होता है, प्रतिक्रिया देने का विकल्प.

बेल्जियम के बाद मैं कई जगह गई, लेकिन पहली यात्रा की याद हमेशा ख़ास रहती है, वो एक बड़ी सहासिक यात्रा की ओर हमारा पहला कदम होता है.

विश्व महिला दिवस: वे काम जिनसे महिलाएं बनती हैं सशक्त

आशिमा, क्रिएटिव डायरेक्टर

मुझे घूमना बहुत पसंद है. मैं नई-नई जगह जाती हूं. मुझे नए लोगों से मिलना बहुत अच्छा लगता है.

जब मैंने अकेले घूमना शुरू किया तो मैं अपने प्रति ज़्यादा ज़िम्मेदार महसूस करने लगी और इसने मुझे अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने में मदद की. मुझे अब ज़िंदगी ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है.

विश्व महिला दिवस: वे काम जिनसे महिलाएं बनती हैं सशक्त

रिद्धिमा भाटिया, कुकिंग और बेकिंग एक्सपर्ट

आज के वक़्त में इंडिपेंडेंट होना बहुत ज़रूरी है और इसी का एक पहलू है अकेले ट्रैवल करना. कई लोगों के लिए पहली बार अकेले कहीं जाना एक आध्यात्मिक अनुभव होता है और मैं जब भी अकेले ट्रैवल करती हूँ तो मुझे ठीक ऐसा ही लगता है.

अकेले घूमना मुझे शांति देता है, मुझे बहुत मज़ा आता है और बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है.

जब मैं अकेली विदेश जाती हूँ और वहाँ अकेली रहती हूँ तो मुझे बहुत आत्मविश्वास से भरा हुआ महसूस होता है और लगता है कि कुछ भी करना मामुकिन है.

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सुरुची गोस्वामी त्रिखा, आईटी प्रोफ़ेशनल

10 साल से मैं सोलो ट्रैवल कर रही हूँ. इस दौरान मैं दुनिया भर की महिलाओं से मिली. कई मायनों में भले ही हम अलग थीं लेकिन हम सभी में एक चीज़ कॉमन थी, हम सभी महिलाओं के लिए एक सुरक्षित दुनिया चाहती थीं.

इस महिला दिवस मैं महिलाओं के लिए एक सुरक्षित दुनिया की कामना करती हूँ ताकि वो बेखौफ होकर अपने सारे सपने पूरी कर सकें.

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हरलीन टूटेजा, फ्रीलांस राइटर

काम की भाग-दौड़ के बीच मैं हमेशा से एक रंगबिरंगी ज़िंदगी जीने का सपना देखती थी, इसलिए मैंने 2019 में अकेले घूमने का फैसला किया.

मैंने उत्तर भारत के पहाड़ों के बारे में बहुत सुना था, लेकिन वो कभी मुझे अपनी ओर खींच नहीं पाए, इसलिए मैंने दक्षिण भारत जाने का फ़ैसला किया. दक्षिण को लेकर मेरे मन में महेशा से कुछ स्टीरियोटाइप थे, लेकिन चेन्नई में क़दम रखते ही वो एक पल में दूर हो गए. वहां के लोगों ने बहुत प्यार से मेरा स्वागत किया.

पुदुचेरी की अपनी पहले सोलो ट्रिप के बाद मेरी दिलचस्पी दक्षिण भारत की संस्कृति, खाने, पहनावे, फिल्मों, गानों में बहुत बढ़ गई. यहां तक कि मैंने तमिल भाषा भी कुछ-कुछ सीख ली. पूरे 2019 में मैंने दक्षिण भारत की कई जगहों पर ट्रैवल किया क्योंकि मुझे हमेशा वहां बहुत ही सुरक्षित और घर जैसा महसूस हुआ.

अकेले घूमने के अपने अनुभव से मैं यही कहूंगी कि हम लोगों को उनके कल्चर और रहन-सहन के आधार पर अलग मानते हैं, लेकिन अगर आप नज़रिया बदलकर देखें तो यही वो कड़ी है जो हमें एक दूसरे से जोड़ती है.

इस महिला दिवस मैं सभी महिलाओं से कहना चाहती हूं कि आइए कुछ नया करने की कोशिश करते हैं, अकेले घूमने की अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ते हैं और नए मुकाम बनाते हैं, एक दूसरे से ज़्यादा प्यार करने की कोशिश करते हैं.

किसे पता, आप हज़ारों मील दूर अपना घर ढूंढ लें?

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जसप्रीत कौर, ई कॉमर्स एग्ज़ीक्यूटिव

पहली बार मैं 21 साल की उम्र में अकेले घूमने गई थी. इससे पहले तक मैं हमेशा अपने परिवार और दोस्तों के साथ ही कहीं भी गई थी.

2018 में होली के अगले दिन मैं ताज महल देखने के लिए अकेली आगरा निकल पड़ी.

पहली बात, मुझे अकेले ट्रैवल करने में कुछ भी अटपटा या असहज नहीं लगा. हाँ, लोगों ने कई बार मुझे ये ज़रूर पूछा कि मैं अकेली क्यों हूँ, लेकिन इसके अलावा मेरा पूरा अनुभव बहुत ही सुकून भरा और आज़ादी का एहसास कराने वाला रहा.

इस सोलो ट्रिप के बाद मैं बहुत ज़्यादा आज़ाद महसूस करने लगी और मुझमें विश्वास आया कि मैं सब कुछ ख़ुद कर सकती हूं.

जो लड़कियां अब भी अकेले घूमने में हिचकती हैं, मैं उनसे कहूंगी कि अपने टिकट बुक करो और निकल पड़ो.

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