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Parliament Session Cost: संसद चलाना कितना महंगा, एक दिन का खर्च आपकी सोच से परे, एक मिनट की कीमत चौंका देगी

Parliament Session Cost: संसद का शीतकालीन सत्र आज से शुरू होकर 19 दिसंबर 2025 तक चलेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि सरकार इस सत्र को सार्थक, रचनात्मक और जनता की उम्मीदों के मुताबिक बनाना चाहती है।

संसद के इस शीतकालीन सत्र लगभग 10 से ज्यादा बिल पेश किए जा सकते हैं। विपक्ष SIR को लेकर हंगामा कर सकता है। लेकिन संसद की राजनीति और हंगामे के बीच एक बड़ा सवाल हमेशा खड़ा रहता है-संसद को चलाने में आखिर कितना खर्च आता है और जब संसद रुकती है तो देश का कितना पैसा डूब जाता है?

Parliament Session Cost

🟡 एक मिनट का खर्च 2.5 लाख रुपये! ये आंकड़ा चौंकाता है

हर दिन संसद के दोनों सदन लोकसभा और राज्यसभा कुल मिलाकर छह घंटे तक काम करने के लिए निर्धारित हैं। इसमें दोपहर के खाने का एक घंटा शामिल नहीं होता। पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने 2012 में बताया था कि संसद को चलाने में सरकार को काफी भारी खर्च उठाना पड़ता है।

संसद जब सक्रिय रूप से चल रही होती है, तो हर एक मिनट का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपये आता है। यह आंकड़ा 2012 में पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने साझा किया था। इनके मुताबिक एक मिनट चलाने में लोकसभा और राज्यसभा पर 1.25 लाख-1.25 लाख रुपये का खर्च आता है।

संसद (लोकसभा-राज्यसभा) को चलाने में एक मिनट का खर्च 2.5 लाख रुपये आता है, तो अब समझते हैं कि पूरे 6 घंटे (यानी 360 मिनट) का खर्च कितना होगा।

छह घंटे = 360 मिनट

अब खर्च का हिसाब इसी आधार पर लगाया जाएगा।

गणना

  • 1 मिनट का खर्च = 2.5 लाख रुपये
  • 360 मिनट का खर्च = 2.5 लाख × 360
  • 2.5 लाख × 360 = 90,00,00,000 रुपये (9 करोड़ रुपये)

सीधे शब्दों में-

  • 2.5 लाख = 2,50,000
  • 2,50,000 × 360 = 9,00,00,000 रुपये
  • यानि कुल 9 करोड़ रुपये।

आज के खर्च को देखकर ये अनुमान और भी ज्यादा हो सकता है, लेकिन नए आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए संसद में हर एक मिनट का हंगामा टैक्सपेयर के पैसे की बड़ी बर्बादी माना जाता है।

इसीलिए जब भी संसद में हंगामा होता है, कार्यवाही बाधित होती है या बार-बार स्थगन होता है, तो सीधे-सीधे करोड़ों रुपये का नुकसान होता है, जो टैक्सपेयर्स यानी आम जनता की जेब से जाता है।

🟡 कैसा रहा था 2024 का शीतकालीन सत्र?

2024 का शीतकालीन सत्र उन सत्रों में शामिल रहा जिसने सबसे ज्यादा समय बेकार किया। विवाद, विरोध, नारेबाजी और ठप बैठकों ने न सिर्फ कामकाज रोका, बल्कि कई करोड़ रुपये की रकम भी बर्बाद कर दी।

शीतकालीन सत्र 2024 में लोकसभा में 5 बिल पेश हुए थे और 4 पास हुए थे। राज्यसभा में 3 बिल पास हुए थे। 26 नवंबर 2024 को संविधान दिवस पर विशेष सत्र आयोजित किया गया था। लेकिन प्रश्नकाल लगभग ठप रहा था। लोकसभा 20 में से 12 दिन 10 मिनट से ज्यादा नहीं चला था।

लोकसभा का हाल

  • लोकसभा ने 2024 के सत्र में कुल 65 घंटे 15 मिनट का समय विरोध और अव्यवस्था की वजह से खो दिया। इससे टैक्सपेयर्स के करीब 97,87,50,000 रुपये सीधा-सीधा बर्बाद हो गए। PRS मुताबिक लोकसभा ने तय समय का सिर्फ 52% ही काम किया था।
  • 2024 में नवंबर 25 से दिसंबर 20 तक चले इस सत्र में अडानी मुद्दे पर चर्चा की मांग, गृह मंत्री अमित शाह के डॉ. बीआर अंबेडकर टिप्पणियों पर विपक्ष की प्रतिक्रिया और अन्य राजनीतिक आरोपों ने कामकाज बार-बार बाधित किया।

राज्यसभा में स्थिति और भी खराब

राज्यसभा में सभापति तत्कालीन जगदीप धनखड़ ने कहा था कि सदन ने प्रभावी रूप से सिर्फ 43 घंटे 27 मिनट ही काम किया, जिसकी कुल उत्पादकता मात्र 40.03% रही। 19 दिनों में से 15 दिन तो प्रश्नकाल भी ढंग से नहीं चल पाया था।

🟡 इतना खर्च क्यों होता है संसद चलाने में?

संसद चलाने का खर्च सिर्फ बिजली-पानी पर नहीं होता। इसमें शामिल हैं,

  • सांसदों और अधिकारियों का वेतन
  • सुरक्षा व्यवस्था
  • प्रशासनिक खर्च
  • तकनीकी संसाधन
  • स्टाफ
  • लॉजिस्टिक्स और रख-रखाव
  • दस्तावेज़ीकरण और लाइव टेलीकास्ट की लागत
  • जब सदन चलता है तो इन सभी पर एक साथ भारी खर्च आता है। इसीलिए हर मिनट की कीमत लाखों में पहुंच जाती है।

🟡 कुल मिलाकर तस्वीर क्या निकलती है?

संसद का हर मिनट देश के टैक्सपेयर के 2.5 लाख रुपये खर्च कराता है। जब सत्र हंगामों की भेंट चढ़ जाता है, तो करोड़ों रुपये यूं ही बर्बाद हो जाते हैं। इसीलिए हर गैर-उत्पादक दिन सिर्फ राजनीति नहीं, देश की आर्थिक हानि भी है। संसद लोकतंत्र की आत्मा है। यहां होने वाला हर मिनट का काम जनता का भविष्य तय करता है। लेकिन जब यह मिनट गाली-गलौज, हंगामे और बहसबाजी में निकल जाए, तो नुकसान सिर्फ राजनीतिक नहीं, आर्थिक भी होता है।

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