राहुल गांधी कर्नाटक बचाने में होंगे कामयाब?
देश के विकास के लिए क्या ज़रूरी है? कर्नाटक मॉडल. जहां पर ना सिर्फ़ सबके लिए काम होता है बल्कि नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है. कांग्रेस ये बात सिर्फ़ कर्नाटक के लोगों को ही नहीं बल्कि देश में भी सबको बताने में लगी है.
कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभालने के बाद राहुल गांधी के लिए कर्नाटक पहला बड़ा चुनाव है. गुजरात में बीजेपी को उसके गढ़ में 100 सीटों के अंदर समेटने और हाल में हुए उपचुनावों में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस उत्साहित तो है, लेकिन डरी भी है.
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क्या राहुल को होगा फ़ायदा?
नए नवेले कांग्रेस अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती कर्नाटक में अपनी सत्ता बचाने की है. अगर कांग्रेस कर्नाटक को बचाने में कामयाब होती है, तो राहुल गांधी को इसका फ़ायदा साल के अंत में होने वाले बीजेपी सत्तारूढ़ राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो मिलेगा, साथ ही वो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में विपक्षी नेता के तौर पर मोदी को टक्कर दे सकते हैं. और इसका सीधा फ़ायदा 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कर्नाटक में मिल सकता है जहां लोकसभा की 28 सीटें हैं.
लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं. इस चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन काफ़ी मायने रखता है और यही वजह है कि इस बार कर्नाटक में विधानसभा चुनावों की घोषणा से पहले 2018-19 के लोकलुभावन बजट में कांग्रेस की रणनीति भी साफ़ दिखी.
इस बजट के ज़रिए उन्होंने केन्द्र सरकार के लोक-लुभावन नीतियों का मुकाबला किया और भविष्य में राज्य और केन्द्रीय स्तर पर कांग्रेस की नीतियों की तरफ़ भी इशारा किया.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में बीमा कवरेज और निःशुल्क एलपीजी गैस कनेक्शन के साथ-साथ बिना सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों की परेशानियों को दूर करने के लिए कई घोषणाएं की गई हैं.
कर्नाटक राज्य सरकार ने किसानों के लिए बजट में खास प्रावधान रखे. इससे राज्य में क़रीब 70 लाख किसानों को फ़ायदा होगा. लेकिन कांग्रेस की नज़रें सिर्फ़ कर्नाटक में बसे किसानों पर ही नहीं है बल्कि इसके ज़रिए तीन बड़े राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में आने वाले चुनाव पर भी हैं, जहां किसानों की नाराज़गी खुल कर सामने आई है.
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लोगों और मीडिया से जुड़ने की रणनीति
कांग्रेस की कोशिश है कि वो मतदाताओं से नीतियों के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी जुड़े. यही वजह है कि कांग्रेस अपने संगठन को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करने में लगी है ताकि कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को बताएं कि कर्नाटक सरकार क्या अच्छा काम कर रही है.
साथ ही राज्य स्तर पर बदलाव के बाद ज़िला स्तर पर भी कांग्रेस अपनी प्रचार टीमें गठित करेगी. पार्टी का मकसद ज़मीनी स्तर पर पहुंच बढ़ाना है ताकि स्थानीय मुद्दे उठाए जा सकें.
साथ ही कांग्रेस इन दिनों पूरी ताकत से लोगों से अपना संवाद बेहतर बनाने में जुटी है. गुजरात में चुनाव अभियान में मिली कामयाबी को पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर दोहराना चाहती है.
कर्नाटक में पार्टी ने उन नेताओं के नाम कमोबेश तय कर लिए हैं जो प्रवक्ता होंगे और मीडिया में अपनी बात रखेंगे. इन नेताओं को ख़ास वर्कशॉप लगाकर ट्रेनिंग दी जा रही है.
कांग्रेस की रणनीति ये है कि वो अपने पक्ष को तेज़ी से जनता के सामने रखे. किसी भी मुद्दे पर प्रतिक्रिया में भी पार्टी तेज़ी दिखाए और मीडिया से ताल्लुकात बेहतर करे. साथ ही प्रवक्ता के अलावा पार्टी के बड़बोले नेताओं को प्रचार से दूर रखा जाए. इसी वजह से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आधिकारिक तौर पर बोलने से बच रहे हैं.
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राहुल गांधी भविष्य के प्रधानमंत्री
पार्टी की कोशिश है कि लोग कांग्रेस आलाकमान राहुल गांधी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करें. एक ऐसा आलाकमान जो लोगों से जुड़ता है, उनके साथ खाता-पीता है, और तो और उनके भले के लिए सिर्फ़ राज्य में ही नहीं बल्कि देश में आने वाले समय में नीतियां बनाएगा.
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क्या कर रहे हैं राहुल?
इसी रणनीति के तहत राहुल गांधी का चुनाव प्रचार बेल्लारी से शुरू किया गया. बेल्लारी से सोनिया गांधी ने सबसे पहले लोकसभा चुनाव लड़ कर जीत हासिल की थी. उन्होंने बीजेपी दिग्गज सुषमा स्वराज को वहां से हराया था.
ये एक बड़े चुनाव के लिए राहुल गांधी का पहला प्रदर्शन था. तब 29 साल के राहुल और 27 साल की प्रियंका गांधी ने एक हफ्ते तक अपनी मां के साथ प्रचार किया था.
इसी बेल्लारी ने 2013 विधानसभा चुनाव में सात साल तक विपक्ष में रखने के बाद कांग्रेस की सत्ता वापसी में अहम भूमिका निभाई थी.
2010 में विपक्ष के नेता सिद्धारमैया ने कथित खनन माफिया रेड्डी भाइयों के विरोध में बेंगलुरू से बेल्लारी तक 350 किलोमीटर की पदयात्रा निकाली थी.
इस चुनाव में राहुल गांधी यहां कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से मिल रहे हैं और उनके बीच में अपने आप को उनका नेता बनाने में लगे हैं. बेल्लारी में राहुल ने लोगों से कहा कि यही वो जगह से जहां से आपने मेरी मां को लोकसभा भेजा था, तब मैं अपनी मां के साथ आया करता था.
वहीं जेवारगी में राहुल ने स्वर्गवासी पूर्व मुख्यमंत्री धरम सिंह का ज़िक्र करते हुए कहा कि वो और मल्लिकार्जुन खड़गे ने यहां पर क्षेत्र के लिए फ़ंड और लोगों के लिए रोज़गार जुटाने का काम किया था. साथ ही वादा किया कि वो क्षेत्र को पिछड़े सेक्शन 371(जे) (पिछड़ा क्षेत्र) के तहत लाएंगे.
लोगों से संवाद में राहुल गांधी राष्ट्रीय और स्थानीय नेताओं को साथ लेकर घूम रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक राहुल गांधी संवाद में माहिर हो रहे हैं, लेकिन साथ ही वो मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को, जो शानदार वक्ता हैं, पूरा मौका दे रहे हैं.
कर्नाटक मॉडल के ज़रिए मोदी पर निशाना
कांग्रेस की कोशिश है कि लोगों के सामने सिद्धरमैया का कर्नाटक मॉडल एक उदाहरण के रूप में रखे. एक ऐसा मॉडल जो हर तबके के लोगों के लिए काम करता है और जो नीति बनाता है वो सफलतापूर्वक लागू करता है.
राहुल गांधी लोगों के सामने बार-बार कर्नाटक मॉडल का ज़िक्र कर रहे हैं और इस मॉडल के ज़रिए प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार पर निशाना साध रहे हैं. "जो कहते हैं वो करते हैं" का नारा लेकर राहुल गांधी दलित, किसान और अल्पसंख्यकों को लुभा रहे हैं.
धर्म और जाति को साधने का प्रयास
गुजरात चुनाव के बाद कांग्रेस अध्यक्ष अब मंदिर दर्शन के साथ ही दरगाह पर चादर चढ़ाकर हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम वोटरों को भी साधने में लगे हैं.
गुजरात चुनाव की रणनीति से अलग कर्नाटक में राहुल गांधी मंदिर और दरगाह दोनों जगह अपनी उपस्थिति बना रहे हैं. कलबुर्गी में वो पहले मशहूर बसवेश्वर मंदिर गए और अपने पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी को याद किया.
राहुल गांधी से पहले कलबुर्गी के बसवेश्वर मंदिर में उनके पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी भी दर्शन करने आ चुके हैं. इस मंदिर को शहर का ग्राम देवता भी कहा जाता है और यहां पर हिंदू के साथ ही मुस्लिम समुदाय के लोग भी आते हैं. ख़ासतौर पर लिंगायत समुदाय के लोग बड़ी संख्या में इस मंदिर में आते हैं.
बसवेश्वर मंदिर के दर्शन के बाद राहुल ने कलबुर्गी में ही ख्वाजा बंदे नवाज़ की दरगाह पर चादर चढ़ाई और कर्नाटक चुनाव में जीत के लिए दुआ मांगी.
कांग्रेस की ये रणनीति सिर्फ़ मंदिर दरगाह के दर्शन में ही नहीं बल्कि प्रदेश इकाई परिवर्तन में साफ़ दिखी. कांग्रेस ने प्रदेश इकाई की कमान दलित नेता जी परमेश्वरा को सौंपी.
लिंगायत को खींचने का प्रयास
वहीं लिंगायत नेता एसआर पाटिल को उत्तर कर्नाटक का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया क्योंकि इस इलाके में लिंगायत समुदाय का असर है.
इसी तरह वोक्कालिगा समुदाय के नेता डीके शिवकुमार को प्रचार अभियान समिति की कमान दी गई.
दिनेश गुंडूराव (ब्राह्मण) को कांग्रेस ने दक्षिण कर्नाटक का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया. पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हैं ही. वे कुरुबा (पिछड़े) समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं.
राजनीति में लिंगायत का प्रभाव
लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता देने की मांग पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खुलकर समर्थन किया था. कर्नाटक की आबादी में 18 फ़ीसदी लिंगायत समुदाय के लोग हैं.
पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की अच्छी खासी आबादी है. अच्छी खासी आबादी और आर्थिक रूप से ठीकठाक होने की वजह से कर्नाटक की राजनीति पर इनका प्रभावी असर है.
अस्सी के दशक की शुरुआत में रामकृष्ण हेगड़े ने लिंगायत समाज का भरोसा जीता. हेगड़े की मृत्यु के बाद बीएस येदियुरप्पा लिंगायतों के नेता बने. 2013 में बीजेपी ने येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाया तो लिंगायत समाज ने भाजपा को वोट नहीं दिया.
सोनिया गांधी ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले 2012 में लिंगायतों के सिद्धगंगा मठ के प्रमुख शिवकुमार स्वामी की 105वीं सालगिरह पर आयोजित समारोह में भाग लिया था. नतीजतन कांग्रेस फिर से सत्ता में लौट आई. अब बीजेपी फिर से लिंगायत समाज में गहरी पैठ रखने वाले येदियुरप्पा को सीएम कैंडिडेट के रूप में आगे रख रही है.
अगर कांग्रेस लिंगायत समुदाय के वोट को तोड़ने में सफल होती है तो यह बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित होगी.
इसके अलावा जीत के लिए पार्टी ने खास रणनीति तैयार की है.
क्या है कांग्रेस की रणनीति?
इसके तहत कांग्रेस के सहयोगी संगठनों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से नए लोग जोड़े जाएंगे. पेशेवर लोगों को मीडिया में कांग्रेस का पक्ष रखने और प्रवक्ता बनाने में तरजीह दी जाएगी.
साथ ही उम्मीदवारों के लिए खास वर्कशाप होंगे जिसमें ये समझाया जाएगा कि कांग्रेस की विचारधारा और राजनीतिक स्टैंड क्या है. उन्हें पार्टी में आ रहे बदलावों को अपनाने को तैयार रहना होगा.
कांग्रेस की रणनीति मोदी सरकार की नाकामियों को जनता तक पहुंचाने की भी हैं. साथ ही राज्यों की बीजेपी सरकारों की खामियों को भी पार्टी उजागर करेगी.
एंटी इंकम्बेंसी बड़ा फ़ैक्टर
हालांकि कांग्रेस इस बार काफी उत्साहित तो है, लेकिन डरी भी है. उसका एक कारण कर्नाटक में सत्ता बदलने की परंपरा है.
कर्नाटक में आमतौर से कोई भी सरकार दूसरी बार सत्ता में नहीं आई है. 1994 से यही क्रम चल रहा है. कर्नाटक की जनता इस परपंरा को जारी रखा तो कांग्रेस के लिए मुश्किल हो सकती है.
दूसरा बीजेपी ने 2017 नवंबर से अपना चुनाव प्रचार ज़ोरशोर से शुरू कर दिया था. जबकि कांग्रेस ने अपनी रणनीति जनवरी में बनानी शुरू की.
बीजेपी पर कांग्रेस मुक्त दक्षिण भारत बनाने का भार है. ऐसे में देखना होगा कि राहुल गांधी अपने दक्षिण भारत की एकमात्र सबसे बड़े राज्य में अपने पार्टी की सत्ता बचाने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं?
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