मोदी के मंत्री मनोज सिन्हा, गाजीपुर में दिखा पाएंगे वो मैजिक जो 30 साल में नहीं हुआ
नई दिल्ली- मोदी सरकार में रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा (Manoj Sinha) को उनके काम के दम पर बीजेपी ने फिर से पूर्वी यूपी की गाजीपुर (Gazipur)सीट से ही चुनाव लड़ने का मौका दिया है। सिन्हा के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास लिए काफी काम भी किए हैं। लेकिन, गाजीपुर लोकसभा सीट का एक इतिहास उन्हें जरूर डराता होगा। दरअसल, पिछले तीन दशकों में यहां से कोई भी सांसद लगातार दोबारा जीत नहीं पाया है। खुद मनोज सिन्हा (Manoj Sinha)को भी यहां पर दो बार हार का झटका लग चुका है। ऐसे में जब नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के लिए बीजेपी यूपी में एक-एक सीट के लिए संघर्ष कर रही है, तो सवाल उठता है कि क्या मनोज सिन्हा (Manoj Sinha)यहां से लगातार दोबारा नहीं जीतने वाली परंपरा को इसबार तोड़ पाएंगे?

मनोज सिन्हा के साथ क्या हुआ?
गाजीपुर (Gazipur) लोकसभा सीट से कांग्रेस के जैनुल बशर आखिरीबार लगातार दो बार 1980 एवं 1984 में सांसद चुने गए थे। 1989 के लोकसभा चुनाव में यह सिलसिला जो टूटा, वह आजतक बदला नहीं है। बीते 30 साल में या तो यहां पर उस सांसद की हार हो गई या उसे अगले चुनाव में टिकट ही नहीं मिला। इस अनुभव से मनोज सिन्हा (Manoj Sinha) भी अच्छी तरह वाकिफ हैं। वे 1996 में पहली बार भाजपा के टिकट पर यहां से संसद में दाखिल हुए, लेकिन 1998 के चुनाव में उन्हें यहां के लोगों का समर्थन नहीं मिल पाया। 1999 में एक बार फिर से गाजीपुर (Gazipur) की जनता ने उन्हें सिर पर बिठा लिया, लेकिन 2004 में साइनिंग इंडिया के साथ ही इनकी भी चमक फीकी पड़ गई। 2014 में उन्हें इस संसदीय क्षेत्र से तीसरी बार सांसद बनने का मौका मिला और 2019 में वह फिर से गाजीपुर (Gazipur) की जनता के सामने हैं। इसलिए यह देखना दिलचस्प हो गया है कि वह इस सीट की तीन दशकों में बनी इस परिपाटी को किस तरह तोड़ पाते हैं? या फिर से गाजीपुर (Gazipur) अपना तीस वर्षों वाला इतिहास दोहराने वाला है।

महागठबंधन भी है बड़ी चुनौती
मनोज सिन्हा (Manoj Sinha) के सामने इस बार एक और चुनौती खड़ी हुई है। वह चुनौती है सपा एवं बसपा (SP-BSP) का गठबंधन। गाजीपुर (Gazipur) संसदीय सीट में जातीय समीकरण बहुत ज्यादा मायने रखता है और सिन्हा को इस मामले में 2014 के मुकाबले निश्चित रूप से समस्या बढ़ चुकी है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक लोकल जर्नलिस्ट आलोक त्रिपाठी का कहना है कि, '1989 के बाद से कोई भी वर्तमान सांसद लगातार दूसरी बार नहीं जीत पाया। मनोज सिन्हा अपने विकास कार्यों के दम पर जीत का विश्वास जता रहे हैं, लेकिन गठबंधन की चुनौती को हल्के में नहीं लिया जा सकता।'

गाजीपुर में पहले क्या हुआ?
गाजीपुर (Gazipur) सीट पर सपा-बसपा (SP-BSP) गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर मनोज सिन्हा को चुनौती दे रहे अफजाल अंसारी भी 2004 में एसपी के टिकट पर चुनाव जीते थे, लेकिन अगली बार 2009 में बसपा के टिकट पर खड़े हुए और उन्हें सपा के राधेमोहन सिंह ने हरा दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में राधेमोहन सिंह को एसपी का टिकट नहीं मिला और इस तरह उनकी जीत का सिलसिला भी टूट गया। गाजीपुर (Gazipur) से 1989 में जगदीश कुशवाहा निर्दलीय चुनाव जीते थे और 1991 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विश्वनाथ शास्त्री जीते थे, लेकिन दोनों ही दूसरी बार संसद नहीं पहुंच पाए। गाजीपुर (Gazipur) की राजनीति पर पारखी नजर रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता एसके राय के मुताबिक, 'बीते 30 वर्षों में जो लोग यहां से सांसद निर्वाचित हुए, उनमें ज्यादातर को अगले चुनाव में जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा। कुछ की सीट बदल गई और कुछ की अपनी पार्टी से नहीं बनी। आगे यह परिपाटी कब टूटेगी, कहा नहीं जा सकता।'

1989 से पहले ट्रेंड अलग था
मनोज सिन्हा की इस संसदीय सीट की कहानी थोड़ी अलग है। 1989 से पहले यहां कई बार सांसद लगातार दूसरी बार चुने गए, लेकिन कोई जीत की हैट्रिक नहीं लगा पाया। कांग्रेस के हरप्रसाद सिंह 1952 और 1957 के चुनाव में जीते और फिर मैदान से बाहर हो गए। सीपीआई के सरजू पांडेय भी 1967 और 1971 के बाद संसद नहीं पहुंच सके। पहले 1980 में और फिर 1984 के राजीव लहर में चुनाव जीतने वाले जैनुल बशर भी जीत की हैट्रिक नहीं लगा पाए।












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