जानिए क्यों वाराणसी बना मोदी का पसंदीदा शहर

वाराणसी से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चुनाव लड़ना, अपने वोट बैंक को पक्का करने की पार्टी की एक ऐसी कोशिश है जिसमें वह हर हाल में सफलता हासिल करना चाहेगी। वाराणसी की सीट पर अजेय रहने वाले मुरली मनोहर जोशी को कानपुर भेजने में भी पार्टी ने कोई हिचक नहीं दिखाई।
इस बार बीजेपी के लिए क्यों है यूपी खास
उत्तर प्रदेश देता है प्रधानमंत्री बनने का सपना
20 करोड़ की जनसंख्या वाला उत्तर प्रदेश देश की चुनावी प्रक्रिया में काफी अहम है। देश के इस सबसे बड़ा राज्य में छह चरणों में वोट डाले जाएंगे। 10 अप्रैल से वोट डाले जाने की प्रक्रिया की शुरुआत उत्तर प्रदेश में होगी और यह 12 मई तक जारी रहेगी। इन छह चरणों का आखिरी दौर वाराणसी में खत्म होगा और 12 मई को यहां पर जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी।
272 में से लोकसभा की 80 सीटें उत्तर प्रदेश में ही हैं और ऐसे में खुद-ब-खुद इस राज्य की अहमियत सामने आ जाती है। जब तक किसी पार्टी को उत्तर प्रदेश से वोट नहीं हासिल होते उसके लिए लोकसभा का रास्ता कांटों से भरा नजर आने लगता है। उत्तर प्रदेश में चार राजनीतिक पार्टियों का प्रभाव है, बीजेपी, कांग्रेस, सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी। इस राज्य में जहां कांग्रेस के लिए वोटर्स का रुझान विधानसभा चुनावों के दौरान सामने आ गया है तो वहीं समाजवादी पार्टी की पकड़ भी अब कमजोर नजर आने लगी है।
वाजेपर्इ के बाद मोदी
बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों को यहां से जब-जब वोट्स हासिल हुए, उसने देश की सत्ता पर राज किया है। सिर्फ इतना ही नहीं जिस पार्टी ने यहां के विधानसभा चुनावों में अपना अस्तित्व बनाया उसके मुखिया ने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा। आज यही सपना शायद नरेंद्र मोदी की आंखों में भी है और सिर्फ नरेंद्र मोदी ही क्यों बीजेपी को अगर राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत वापसी करनी है तो उसे इस बार के चुनावों में अपनी मजबूत पकड़ बनानी होगी।
वर्ष 2004 से पार्टी का गणित मुश्किल में है और सबसे बड़ी वजह है उत्तर प्रदेश। पार्टी अटल बिहारी वाजपेई के बाद कोई भी ऐसा नेता उत्तर प्रदेश की जनता के सामने पेश नहीं कर पाई है जिसमे जनता देश के नेतृत्व के लायक सभी खूबियों को तलाश सके। अब उसे मोदी के रूप में शायद वह नेता हासिल हुआ है जिसकी लोकप्रियता गुजरात से निकलकर उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी है। यह बात एग्जिट पोल्स और कई सर्वे में भी साफ हो चुकी है। ऐसे में पार्टी ने बिना कोई रिस्क उठाए मोदी को वाराणसी से चुनाव लड़वाना बेहतर समझा।
सिर्फ पूर्वांचल नहीं आसपास के राज्यों पर भी होगा असर
राजनीति के पंडितों की मानें तो शायद मोदी में वैसा ही करिश्मा है जो कभी अटल बिहारी वाजपेर्इ में हुआ करता था। इसके अलावा वारणसी उत्तर प्रदेश का एक ऐसा शहर है जहां पर आने वाले नतीजों का असर पार्टी के लिए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और झारखंड के नतीजों पर भी नजर आ सकता है।
उत्तर प्रदेश और इन चारों राज्यों में की लोकसभा सीटों का टोटल 175 है। यह आंकड़ा अपने आप में सारी कहानी कह जाता है और ऐसे में न सिर्फ बीजेपी बल्कि किसी भी पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। अगर बीजेपी को इन सभी जगहों पर अच्छे वोट्स हासिल हो गए तो फिर एनडीए को सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता है।
मोदी के सामने मुख्तार अंसारी भी चुनौती पेश करेंगे
हालांकि वाराणसी के एक तबके में इस बात को लेकर थोड़ा अफसोस भी है कि यहां के लोकप्रिय नेता डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी को यहां की बजाय कानपुर से चुनाव लड़वाया जा रहा है लेकिन जानकारों के मुताबिक इस बात का कोई खास असर वोटिंग पर नजर नहीं आएगा।
बीजेपी को उम्मीद है कि वाराणसी से मोदी की उम्मीदवारी उसे पूर्वांचल की 20 से 25 सीटें दिला सकती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति के पंडितों की मानें तो मोदी का असर वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में साफ नजर आता है लेकिन यह बात कहना कि उसके वोटों की संख्या में पांच गुना तक इजाफा होगा फिलहाल थोड़ा मुश्किल है।
केजरीवाल पैदा कर सकते हैं थोड़ी मुश्किल
मोदी की जीत को वाराणसी से लगभग तय माना जा रहा है लेकिन उनकी राह में एक मुश्किल आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल नजर आ रहे हैं। केजरीवाल की लहर को सबने दिसंबर 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में साफ देखा था जब आप पार्टी दूसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आई थी। इसके अलावा वाराणसी से ही बीएसपी के मुख्तार अंसारी भी चुनाव लड़ने जा रहे हैं जिनका पिछला रिकॉर्ड काफी अच्छा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मोदी की जीत यों तो वाराणसी से पक्की है लेकिन अंसारी और केजरीवाल के आने से वोट बंट सकते हैं। ऐसे में हो सकता है कि उनकी राह थोड़ी मुश्किल हो जाए। लेकिन इसके बावजूद उनकी जीत कहीं न कहीं पक्की हो चुकी है।












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