NRC Draft: क्‍यों असम में पड़ी इसकी जरूरत और कौन है ड्राफ्ट में शामिल होने के योग्‍य

असम में सोमवार को दूसरा नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) ड्राफ्ट रिलीज कर दिया एनआरसी के पहले ड्राफ्ट को 31 दिसंबर 2017 और इस वर्ष एक जनवरी को जारी किया गया था। उस ड्राफ्ट में कुल जनसंख्‍या के 1.9 करोड़ लोगों के नाम थे।

गुवाहाटी। असम में सोमवार को दूसरा नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) ड्राफ्ट रिलीज कर दिया एनआरसी के पहले ड्राफ्ट को 31 दिसंबर 2017 और इस वर्ष एक जनवरी को जारी किया गया था। उस ड्राफ्ट में कुल जनसंख्‍या के 1.9 करोड़ लोगों के नाम थे। सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस ड्राफ्ट को पब्लिश करने के लिए 30 जून की डेडलाइन तय की थी। लेकिन इसे आगे बढ़ा दिया गया क्‍योंकि लिस्‍ट उस समय पूरी नहीं हो सकी थी। असम में करीब 2,500 एनआरसी सेवा केंद्र बनाए गए हैं जहां पर लोग अपना नाम चेक कर सकते हैं। गया। इस ड्राफ्ट के मुताबिक दो करोड़ 89 लाख लोग भारतीय नागरिक हैं तो वहीं करीब 40 लाख लोग ऐसे हैं जो भारत के नागरिक नहीं हैं। असम की कुल जनसंख्‍या तीन करोड़ 29 लाख है। ये भी पढ़ें-NRC draft: असम में 40 लाख लोग नहीं भारत के नागरिक

पहली बार सन् 1951 में आया ड्राफ्ट

पहली बार सन् 1951 में आया ड्राफ्ट

एनआरसी डॉक्‍यूमेंट को पहली बार असम में साल 1951 में लाया गया था। उस समय इसका मकसद ईस्‍ट पाकिस्‍तान से आने वाले उन नागरिकों को अलग करना था जिनका कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं था। सन् 1971 में जब भारत और पाकिस्‍तान के बीच जंग हुई तो ईस्‍ट पाकिस्‍तान ही बांग्‍लादेश बन गया। साल 1984 में असम समझौता साइन हुआ और इस समझौते के तहत 24 मार्च 1971 से असम में बसे नागरिकों को ही कानूनी तौर पर भारत के नागरिक का दर्जा दिया जा सकता था। ऐसे लोग जिनके पूर्वजों का नाम एनआरसी 1951 की लिस्‍ट में आया था या फिर जो 24 मार्च 1971 में आई निर्वाचन सूची या फिर किसी और आधिकारिक डॉक्‍यूमेंट में दर्ज हैं, उन्‍हें इस ड्राफ्ट में शामिल किया गया है।

80 के दशक में हुए हिंसक प्रदर्शन

80 के दशक में हुए हिंसक प्रदर्शन

असम में पिछले कुछ वर्षों में विदेशियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं और इसमें हिंदु और मुस्लिम दोनों ही शामिल थे। साल 1971 में भारत-पाकिस्‍तान की जंग के बाद भारी तादाद में शरणार्थी यहां पर आकर बस गए। इनके बसने के साथ ही असम में विदेशियों के आने का मुद्दा गरम हो गया और प्रदर्शन होने लगे। 70 के दशक के अंत में और 80 के दशक के मध्‍य में असम में विदेशियों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के आधार पर ही सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच असम समझौता साइन हुआ। इस समझौते के तहत नागरिकता के लिए जरूरी योग्‍यताओं पर रजामंदी बनी।

फिर आया डी वोटर्स का कॉन्‍सेप्‍ट

फिर आया डी वोटर्स का कॉन्‍सेप्‍ट

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों की मानें तो एनआरसी असम में नागरिकता से जुड़े मुद्दे का समाधान नहीं कर सकता है। उनका मानना है कि असम में हजारों की तादाद में ऐसे में लोग हैं जिन्‍हें या तो 'डी' वोटर्स यानी डाउटफुल वोटर्स के तौर पर चिन्हित किया गया है या फिर जिनके पूर्वज इसमें शामिल रहे हैं या फिर ऐसे लोग जिनके केसेज फॉरेनर्स ट्रिब्‍यूनल में कई वर्षों से अटके पड़े हैं, ऐसे लोगों को एनआरसी अथॉरिटीज की ओर से संज्ञान में नहीं लिया जाता है। भारत के चुनाव आयोग ने सन् 1997 में 'डी' वोटर्स का कॉन्‍सेप्‍ट लॉन्‍च किया था।

कितने डी वोटर्स असम में

कितने डी वोटर्स असम में

असम में करीब 125,000 डी वोटर्स हैं और 131,000 से ज्‍यादा केसेज फॉरेन ट्रिब्‍यूनल्‍स में अटके हैं। साल 2016 में असम में बीजेपी सरकार सत्‍ता में आई और करीब 15,000 लोगों को पिछले वर्ष ही विदेशी घोषित किया गया है। साल 1985 से 2016 के बीच 90,000 लाख लोगों को विदेशी घोषित किया जा चुका है। ऑल असम माइनॉरिटी स्‍टूडेंट्स यूनियन (एएएमएसयू) की ओर से दावा किया गया था कि करीब 20 लाख लोगों का नाम फाइनल लिस्‍ट में नहीं होगा लेकिन यह आंकड़ा दोगुना है। करीब 40 लाख लोग असम में ऐसे हैं जिनका नाम इस लिस्‍ट में नहीं है।

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