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नरेंद्र मोदी सरकार को 'दलित' शब्दावली से क्यों दिक्कत है?

By Bbc Hindi

भारत सरकार के सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया संस्थानों से कहा है कि वो दलित शब्दावली का इस्तेमाल ना करें. मंत्रालय का कहना है कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक शब्दावली है और इसी का इस्तेमाल किया जाए.

मंत्रालय के इस फ़ैसले का देश भर के कई दलित संगठन और बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं. इनका कहना है कि दलित शब्दावली का राजनीतिक महत्व है और यह पहचान का बोध कराता है.

इसी साल मार्च महीने में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने भी ऐसा ही आदेश जारी किया था. मंत्रालय ने सभी राज्यों के सरकारों को निर्देश दिया था कि आधिकारिक संवाद या पत्राचार में दलित शब्दावली का इस्तेमाल नहीं किया जाए.

मंत्रालय का कहना है कि दलित शब्दावली का ज़िक्र संविधान में नहीं है.

दलित
Getty Images
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सरकार में ही मतभेद

सरकार के इस निर्देश पर केंद्र की एनडीए सरकार में ही मतभेद है. एनडीए की सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के नेता और मोदी कैबिनेट में सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास अठावले दलित के बदले अनुसूचित जाति शब्दावली के इस्तेमाल के निर्देश से ख़ुश नहीं हैं.

अठावले महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स आंदोलन से जुड़े रहे हैं और कहा जाता है कि इसी आंदोलन के कारण दलित शब्दावली ज़्यादा लोकप्रिय हुई. अठावले का कहना है कि दलित शब्दावली गर्व से जुड़ी रही है.

वहीं सूचना प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि यह आदेश बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देश पर दिया गया है. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भी मोहनलाल मनोहर नाम के एक व्यक्ति ने दलित शब्दावली के इस्तेमाल को बंद करने के लिए याचिका दायर की थी.

याचिका में कहा गया था कि दलित शब्द अपमानजनक है और इसे अनुसूचित जातियों को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

हालांकि इसे लेकर कोर्ट का कोई अंतिम फ़ैसला नहीं आया है. बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने सरकार को इस पर विचार करने के लिए कहा था.

दलित शब्द का सामाजिक संदर्भ

यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है, ''मराठी में दलित का मतलब शोषित और अछूत से है. यह एक व्यापक शब्दावली है जिसमें वर्ग और जाति दोनों समाहित हैं. दलित शब्द का इस्तेमाल कहीं से भी अपमानजनक नहीं है. यह शब्दावली चलन में 1960 और 70 के दशक में आई. इसे साहित्य और दलित पैंथर्स आंदोलन ने आगे बढ़ाया.''

जाने-माने दलित चिंतक कांचा इलैया सूचना प्रसारण मंत्रालय के इस आदेश की मंशा पर शक ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, ''दलित का मतलब उत्पीड़ित होता है. जिन्हें दबाकर रखा गया है या जिन पर ज़ुल्म ढाया गया है, वो दलित हैं. इसकी एक सामाजिक पृष्ठभूमि है जो दलित शब्दावली में झलकती है.''

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ''दलित शब्दावली से हमें पता चलता है कि इस देश की बड़ी आबादी के हक़ को मारकर रखा गया है और उन पर ज़ुल्म ढाए गए. ये आज भी अछूत हैं. दलित शब्द की जगह आप अनुसूचित जाति को लाते हैं तो यह केवल संवैधानिक स्थिति बताता है और सामाजिक, ऐतिहासिक संदर्भ को चालाकी से गोल कर देता है.''

'ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ है दलित शब्दावली'

इलैया कहते हैं, ''दलित शब्दावली का मतलब दुनिया भर में पता है कि ऐसा देश जहां करोड़ों लोग आज भी अछूत हैं. सरकार को लगता है कि ये तो बदनामी है और इसे ख़त्म करने का आसान तरीक़ा है कि शब्दावली ही बदल दो. दलित ब्राह्मणवाद के विरोध की एक शब्दावली है. यह एक बड़ा मुद्दा है. इसका समाजिक संदर्भ बहुत ही मजबूत है और शोषित तबकों को लामबंद करने का आधार है. यह पहचान मिटाने की कोशिश है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय संवाद में इस बड़े मुद्दे पर गुमराह करने जैसा है. हमलोग इसका विरोध करेंगे. इस सरकार में टर्म और शब्द बदलने का चलन बढ़ा है.''

इलैया कहते हैं, ''अगर हम किसी को दलित कहते हैं तो उसकी पहचान और सामाजिक हैसियत को इंगित करते हैं. अनुसूचित जाति का मतलब तो एक संवैधानिक स्टेटस हुआ. इसमें पहचान पूरी तरह से ग़ायब है. दलित कहने में कुछ भी अपमानजनक नहीं है. सरकार इनकी सामाजिक पहचान को ऐसे नहीं मिटा सकती है. मुख्यधारा में शामिल करने का यह ढोंग नहीं चलेगा.''

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सोशल साइंस के प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण का मानना है कि इस फ़ैसले से सरकार को बहुत राजनीतिक फ़ायदा नहीं होगा.

'दलित शब्दावली अपमानजनक नहीं'

उन्होंने कहा, ''दलित शब्द का इस्तेमाल पत्रकारिता और साहित्य में लंबे समय से होता रहा है और इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. दलित शब्दावली का एक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ है.''

भारतीय जनता पार्टी के सांसद उदित राज को भी लगता है कि दलित शब्दावली के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगनी चाहिए. उदित राज कहते हैं, ''दलित शब्द इस्तेमाल होना चाहिए क्योंकि ये देश-विदेश में ये प्रयोग में आ चुका है, सारे डॉक्युमेंट्स, लिखने-पढ़ने और किताबों में भी प्रयोग में आ चुका है. दलित शब्द द्योतक है कि लोग दबे हैं, कुचले हैं. ये शब्द संघर्ष, एकता का प्रतीक बन गया है. और जब यही सच्चाई है तो ये शब्द रहना चाहिए.''

वो कहते हैं, ''अगर यही दलित शब्द ब्राह्मण के लिए इस्तेमाल किया जाता तो सम्मानित हो जाता. शब्दों से कुछ नहीं होता. ये शब्द गाली बिल्कुल नहीं है. अगर कोई शब्द (दलित की जगह) प्रयोग में आ जाएगा तो उसे गाली ही माना जाएगा. ये पिछड़े हैं, हज़ारों वर्ष से शोसित हैं. अगर इतिहास ठीक से पढ़ाया जाएगा तभी सवर्णों में संतोष होगा कि इन्हें आरक्षण देना उचित है. अगर दलितों को ब्राह्मण कह दिया जाएगा तो वो शब्द भी अपमानित मान लिया जाएगा. जब चमार को चोहड़ा कहा जाता था तो एतराज था. अब चोहड़ा से वाल्मीकि हो गया तो सम्मान बढ़ गया? कुछ नहीं बढ़ा. इतिहास को पढ़ाकर और सच्चाई को बताकर ही आगे बढ़ा जा सकता है.''

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भारतीय समाज में जिनसे लोग छुआछूत करते थे गांधी ने उन्हें हरिजन कहना शुरू किया था जबकि बाबा साहेब आंबेडकर उन्हें दबाया हुआ तबका कहते था. आज़ाद भारत में हरिजन टर्म को लेकर काफ़ी विवाद हुआ और फिर इसके इस्तेमाल से लोग बचने लगे और अब यह मीडिया में इस्तेमाल के चलन से बाहर है.

मंत्रालय के इस आदेश को लोग सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में हैं. कांचा इलैया ने भी बीबीसी से कहा कि वो इसे चुनौती देंगे.

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English summary
Why Narendra Modi government struggling with 'dalit' terminology

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