भैय्याजी जोशी पर संघ को इतना भरोसा क्यों?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सबसे बड़े पद पर भैय्याजी जोशी एक बार फिर विराजमान हो गए हैं. हाल ही में नागपुर में हुई संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में चुनाव प्रक्रिया के बाद यह घोषणा की गई.

क्या वजह है कि आरएसएस प्रमुख डॉक्टर मोहन भागवत के तेज़ और मुखर व्यक्तित्व के साथ उनकी पार्टनरशिप सफल मानी जा रही है?

संघ में सरकार्यवाह की भूमिका चीफ़ जनरल सेक्रेटरी वाली होती है और उनका चुनाव हर तीन साल में होता है. भैय्याजी जोशी को 2009 से यह दायित्व संघ लगातार सौंप रहा है.

1947 में मध्य प्रदेश के इंदौर में पैदा हुए और पश्चिमी महाराष्ट्र में बीए तक शिक्षा प्राप्त करने वाले सुरेश राव उपाख्य भैय्याजी जोशी अपनी कुछ अहम विशेषताओं के लिए संघ में अलग और ख़ास स्थान रखते हैं.

उम्र के सत्तर वर्षों के बाद भी किसी युवा की तरह वो लगातार सफ़र करते हैं और संगठन पर पकड़ कायम रखते हैं. 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अगर कौतूहल बढ़ा है, या संघ की शाखाओं मे बढ़ोतरी हुई है तो उसके लिए सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ संघचालक डॉ. मोहन भागवत और सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी की विस्तारवादी कार्यशैली का भी योगदान है.

संघ के स्वयंसेवक
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संघ के स्वयंसेवक

बदल दिया रुख़

मीडिया या प्रचार को लेकर संघ की बेरुख़ी याद की जाती रही है. करीब पांच साल पहले गर्मियों में एक घटना हुई. नागपुर के रेशिम बाग स्थित स्मृति भवन के बाहर कुछ मीडियाकर्मियों ने भैय्याजी जोशी को देखकर उन्हें आवाज़ दी.

दरअसल, भाजपा से जुड़ी एक बड़ी ख़बर पर संघ की राय जानने के लिए इन मीडियाकर्मियों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था. आमतौर पर संघ के बड़े पदाधिकारी इस तरह पुकार लगाने पर ना आते हैं, ना ही जवाब देते हैं.

लेकिन उस तपती दोपहर को सफ़ेद शर्ट और लुंगी पहने भैय्याजी चलकर आगे आए और हँसकर चुनिंदा शब्दों में कैमरों के आगे अपना पक्ष रखा.

गर्मियों में मीडियाकर्मियों को स्वास्थ्य का ख़्याल रखने की नसीहत देते हुए लौट गए. उन्होंने जवाब में वही पुरानी बात कही थी कि भाजपा के मामलों पर संघ क्या कह सकता है.

लेकिन उन्होंने ख़ुद आगे बढ़कर यह कहा था और बाइट की ज़रूरत पूरी होने पर मीडियाकर्मी ख़ुश थे. बदलते ज़माने में यह संघ के बदलते रुख़ का एक परिचायक था.

1975 में पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में संघ से जुड़े जोशी को आपातकाल के दौरान जनजागरण और लातूर के विनाशकारी भूकंप के दौरान पुनर्वासन कार्यों के लिए सराहा जा चुका है.

स्वयंसेवकों की सरकार बताने का चलन

हालांकि, सार्वजनिक मंचों पर देश की हर सरकार को संघ की ओर से 'अपनी' या 'देश की वर्तमान सरकार' कहकर सम्बोधित किया जाता रहा है. भाजपा से विशेष रिश्तों पर जवाब यह रहा है कि हर राजनैतिक दल में स्वयंसेवक जा सकते हैं, गए हैं. भाजपा में इसका प्रमाण अधिक है.

लेकिन अब इस कथन में बदलाव दिखता है. संघ के मंच से खुलकर वर्तमान केंद्र सरकार 'संघ विचारों से प्रेरित स्वयंसेवकों की सरकार' होने की बात कही जाती है. सरकार के सामने मौजूद चुनौतियों पर सरसंघचालक अपने भाषणों में सुझाव देते हैं, संघ का मत प्रकट करते हैं, सरकार पर निशाना साधते हैं या सरकार के सामने परिस्थितियों का सहानुभूति से ज़िक्र करते हुए बचाव करते भी नज़र आते हैं.

सरकार्यवाह पद पर चौथी बार आसीन होने के बाद रविवार को मीडिया से रूबरू हुए भैय्याजी जोशी ने कहीं-कहीं न सिर्फ़ अपनी ही सरकार पर कटाक्ष किए बल्कि बग़ैर लाग-लपेट के बात भी रखी.

किसानों से जुड़े मुद्दों पर उनका दो टूक जवाब था, "किसानों के सवालों पर कोई सरकार संवेदनहीन हो नहीं सकती. उन्हें संवेदनशील होना ही होगा."

लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी साफ़-साफ़ कह दिया, "कृषि मामले की नीतियों में बदलाव लाकर उनकी उपज को उचित मूल्य मिलेगा, ऐसा भरोसा किसानों को दिलाना आवश्यक है."

साथ ही उन्होंने यह भी माना कि, "किसानों से जुड़े ये सवाल बड़ी चुनौती हैं.'

बैंकों से किसी भी तरह बड़े कर्ज़ लेकर बैंकों को ही चपत देने की घटनाओं पर उन्होंने कहा, "देश की बैंकिंग क्षेत्र में कमियां हैं. बैंक अधिकारियों की गड़बड़ी से लोग रक़म लेकर भाग जाते हैं. शासन व्यवस्था को इसे गंभीरता से लेना होगा क्योंकि देश के आर्थिक जगत के लिए ये ख़तरा है. व्यवस्था को निर्दोष बनाना होगा."

अगले चुनावों में भाजपा को संघ का समर्थन मिलेगा? इसके संकेत देते हुए उन्होंने कहा कि, "केंद्र सरकार के काम और योजनाओं के चलते उन्हें जनता का समर्थन है और जनता सरकार के पीछे खड़ी होगी."

भैय्याजी के बारे में कहा जाता है कि वह नपे-तुले शब्दों का प्रयोग करते हैं लेकिन ध्यान पूरा इस बात पर होता है कि जो संदेश जहां पहुँचाना है, वहां सटीक पहुंचे. प्रतिमाओं को गिराए जाने के मामले हों, या फिर राम मंदिर पर अदालती फैसले का इंतज़ार, भैय्याजी के जवाबों से ये साफ़ दिखाई दिया.

कार्यकर्ताओं को साधने की कला

संगठन में या संघ परिवार में किन्हीं विषयों पर कुछ सदस्यों के बीच मनमुटाव भी हो तो उसे सहजता से सुलझाने में भैय्याजी जोशी और डॉक्टर भागवत की महारथ के कई किस्से सुनाए जाते हैं. विश्व हिन्दू परिषद के डॉ. प्रवीण तोगड़िया स्वयं पर हुए कथित हमले को लेकर संघ से गुस्सा ज़रूर नज़र आए थे लेकिन बाद में ख़ामोश पड़ गए.

होनहार कार्यकर्ताओं की पहचान करना, उन्हें किसी न किसी बड़े काम से जोड़कर व्यस्त कर देना, यह भी विशेषता संगठन के लिए कम ज़रूरी नहीं होती है.

नागपुर के शिक्षाविद डॉ. दिलीप सेनाड बताते हैं, "मेरा उनका परिचय संघ शिक्षा वर्ग में हुआ था, दस बारह साल पहले जब भैय्याजी अखिल भारतीय सेवा प्रमुख थे. मैंने डरते-डरते उन्हें घर आने का न्यौता दिया. वह अगले दिन सहजता से चले आए. बाद में उन्हें पता चला कि मैंने संस्कृत में भी उच्च शिक्षा ली है. उन्होंने सहजता से मुझे उपनिषदों के सार पर पुस्तक लिखने की बात कह दी. उद्देश्य यह था कि सामान्य लोगों तक बात पहुंचे. मैं आज भी उसी पर कार्यरत हूं."

ऐसी ही खूबियों के चलते श्री सुरेश राव उपाख्य भैय्याजी जोशी के हाथों फिर संघ की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है.

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