सीरिया और भारत एक दूसरे के इतने क़रीब क्यों आ रहे हैं?

सीरिया के विदेश मंत्री फ़ैसल मकदाद 17 नवंबर से 21 नवंबर तक भारत के दौरे पर हैं. सीरियाई विदेश मंत्री की मुलाक़ात भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से हुई है.

दोनों विदेश मंत्रियों ने द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की और उन अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी बात की जो दोनों देशों के हितों से जुड़े हैं.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने सीरियाई विदेश मंत्री के दौरे को लेकर जारी बयान में कहा है कि भारत सीरिया को एक पावर प्लांट और एक स्टील प्लांट बनाने के लिए 28 करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद देगा.

वियॉन न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में सीरियाई विदेश मंत्री फ़ैसल मकदाद ने कहा है, ''सीरिया में जारी भीषण संघर्ष यानी 2013, 2014 और 2015 में भी भारतीय दूतावास ने दमिश्क में अपना ऑपरेशन बंद नहीं किया था. यहाँ तक कि राजधानी दमिश्क स्थित सीरियाई विदेश मंत्रालय की इमारत पर रॉकेट से हमले हो रहे थे.''

''इस मुश्किल समय में भी भारत और सीरिया के बीच उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की आवाजाही रुकी नहीं थी. दमिश्क से दिल्ली आने में चार घंटे का वक़्त लगता है. इसलिए आप दोनों देशों में समय और जगह के लिहाज से क़रीबी को समझ सकते हैं.

जो सीरिया के लिए ख़तरनाक है, वह भारत के लिए भी है. हम दोनों धर्मनिरपेक्ष देश हैं. हम दोनों के लोकतांत्रिक सिद्धांतों में भरोसा करते हैं.''

सीरिया भले मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन संविधान में उसका कोई राजकीय धर्म नहीं है. सीरिया एक गणतंत्र है और संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष भी है.

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ऐतिहासिक रिश्ते

सीरियाई विदेश मंत्री ने कहा, ''सीरिया का मानना है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए. पिछले दो सालों से सीरिया जब खाद्य संकट से जूझ रहा था तो भारत ने चावल भेजा था. हम एशियाई देश हैं. आप हमें पश्चिम एशियाई देश कह सकते हैं, लेकिन यहाँ एशिया का दिल है.''

मार्च 2011 में लोकतंत्र के समर्थन में शुरू हुआ आंदोलन सीरिया को गृहयुद्ध में लेकर चला गया था. इस दौरान अमेरिका सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को हटाने की पुरज़ोर कोशिश करता रहा, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली.

दूसरी तरफ़ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बशर अल-असद के साथ खड़े रहे और उन्होंने अमेरिका की रणनीति चलने नहीं दी.

इस दौरान भारत सीरिया में किसी बाहरी सैन्य दख़ल का विरोध करता रहा. यूपीए की सरकार का भी यही रुख़ था. भारत का तर्क था कि सभी पक्षों को साथ बैठकर बात करनी चाहिए. 2013 में भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि सीरिया में सैन्य समाधान कोई विकल्प नहीं हो सकता है.

सीरिया और भारत के बीच ऐतिहासिक रूप से अच्छे संबंध रहे हैं. आज़ादी के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दायरे से बाहर जाकर अरब देशों से अच्छे संबंध बनाए थे.

नेहरू ने 1957 और 1960 में सीरिया का दौरा किया था. नेहरू ने सीरिया की बाथ पार्टी और उसके नेताओं से अच्छे संबंध बनाए थे.

इसराइल की बार इलान यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉक्टर रामी गिनात ने अपने शोध में लिखा है कि स्थानीय प्रेस में नेहरू के दौरे को लेकर काफ़ी गहमागहमी थी.

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असद परिवार

लोगों में काफ़ी उत्साह था. नेहरू के स्वागत में 10 हज़ार से ज़्यादा लोग एयरपोर्ट पर खड़े थे. नेहरू को देखकर लोग एक आवाज़ में बोल रहे थे- विश्व शांति के नायक का स्वागत है. एशिया के नेता ज़िंदाबाद के नारे लग रहे थे.

1978 और 1983 में तत्कालीन सीरियाई राष्ट्रपति हाफ़िज़ अल-असद ने भारत का दौरा किया था. 2003 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सीरिया के दौरे पर गए थे. वाजपेयी का सीरिया दौरा 15 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का था.

इसके बाद 2008 में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद भारत के दौरे पर आए. फिर दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का आना-जाना लगा रहा.

2010 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने सीरिया का दौरा किया था. कहा जाता है कि भारत ने असद के परिवार से हमेशा अच्छे संबंध रखे.

बशर अल-असद के पिता हाफ़िज़ अल-असद 1971 से 2000 तक सीरिया की सत्ता में रहे. 2000 के बाद बशर अल-असद के पास सीरिया की कमान है.

2011 में शुरू हुए अरब स्प्रिंग के बाद बशर अल-असद के लिए मुश्किलें बढ़ीं. असद पर भी दबाव था कि वह सत्ता से बाहर जाएँ. अमेरिका इसका खुलकर समर्थन भी कर रहा था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

2013 में सीरिया में जारी टकराव के समाधान के लिए जिनेवा- II कॉन्फ़्रेंस हुई थी. रूस ने इसमें भारत की भूमिका की भी बात कही थी.

इस कॉन्फ़्रेंस में भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद शामिल हुए थे. सलमान ख़ुर्शीद ने इस सम्मेलन में भारत का रुख़ रूस और चीन की लाइन पर ही रखा था.

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जिनेवा में ख़ुर्शीद ने कहा था, ''सीरिया में जारी टकराव के कारण भारत के हित दांव पर लगे हैं. भारत का पश्चिम एशिया और खाड़ी के इलाक़ों से एतिहासिक संबंध रहा है. सीरिया और इस इलाक़े से हमारा जुड़ाव व्यापार, इन इलाक़ों में रह रहे भारतीयों की कमाई, ऊर्जा और सुरक्षा से सीधा है. यहाँ किसी भी तरह के टकराव से हमारा हित व्यापक पैमाने पर प्रभावित होता है.''

2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के सीरिया दौरे पर भारतीय विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता नवतेज सरना ने सीरिया टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था कि भारत का अरब वर्ल्ड से बहुत मज़बूत संबंध है और ख़ास कर सीरिया से.

उन्होंने कहा था कि वाजपेयी के सीरिया दौरे से पता चलता है कि भारत के लिए यह मुल्क कितनी अहमियत रखता है.

सरना से पूछा गया कि क्या भारत के इसराइल से बढ़ते सुरक्षा संबंधों के कारण सीरिया को लेकर रुख़ स्पष्ट नहीं है? इसके जवाब में सरना ने कहा था कि इस तरह की बातें प्रेस में चलती हैं, लेकिन हक़ीक़त में सीरिया को लेकर कोई भी कन्फ़्यूजन नहीं है.

तब अटल बिहारी वाजपेयी के साथ पांचजन्य के तत्कालीन संपादक तरुण विजय भी गए थे.

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उन्होंने सीरिया टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''सीरिया का यह मेरा पहला दौरा है. सीरिया अरब जगत का एक मुस्लिम देश है. मुझे लगा था कि यह बहुत ही रूढ़िवादी देश होगा.

लेकिन जब मैं यहाँ आया तो मेरी धारणा बिल्कुल ग़लत साबित हुई. सीरिया की तस्वीर बिल्कुल ही अलग है. यहाँ महिलाओं के साथ बिल्कुल भेदभाव नहीं है.

बल्कि कई मामलों में यहाँ की महिलाएँ पुरुषों से भी आगे हैं. भारतीयों को लेकर यहाँ के लोगों का व्यवहार दोस्ताना है. यहाँ के लोग भारतीयों से गर्मजोशी से मिलते हैं.''

तरुण विजय ने कहा था, ''सीरिया में परिवार के मूल्यों का भी आदर किया जाता है. सीरिया में बशर अल-असद का शासन सेक्युलर है और इस लिहाज से अरब वर्ल्ड में उनका बड़ा योगदान है. मैं सीरिया में कई जगहों पर गया. मैंने देखा कि कई भारतीय शहरों की तुलना में वहां के शहर ज़्यादा प्रगतिशील और आधुनिक हैं."

तरुण विजय ने कहा था, ''मैं उमय्याद मस्जिद भी गया था. मैं हिन्दू हूँ लेकिन लोगों ने गर्मजोशी से स्वागत किया. मैंने देखा कि मुसलमान और ईसाई आपस में ख़ुशी से एक साथ रह रहे हैं. किसी भी धर्म के साथ भेदभाव नहीं है. सीरिया के लोग बहुत ही सभ्य और आकर्षक होते हैं.''

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