कौन बनेगा देश का अगला प्रधानमंत्री, क्या सही साबित होंगे एग्जिट पोल?
नई दिल्ली- 23 तारीख को लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने से पहले तक फिलहाल एग्जिट पोल पर ही चर्चा होती रहेगी। हम यहां विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश में राजनीति की जमीनी हकीकत और वहां के लिए आए एग्जिट पोल (Exit poll) की ही बात करेंगे। क्योंकि, प्रदेश में मायावती (Mayawati) और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के सपा-बसपा-आरएलडी (SP-BSP-RLD) महागठबंधन (Mahagathbandhan) बनने के बावजूद ज्यादातर एग्जिट पोल (Exit poll) के जो परिणाम आए हैं, उसको लेकर काफी लोग हैरान हैं। यूपी (UP) में चुनाव के मर्म को समझने वाले बड़े-बड़े जानकार भी अधिकतर एग्जिट पोल के नतीजों को लेकर आश्चर्य में पड़े हुए हैं। हम यहां आपके लिए जो विश्लेषण लेकर आए हैं, उसका मकसद इन्हीं आशंकाओं, जमीनी हालातों और मानव व्यहार (Human behavior) को समझने और एक्सपर्ट की राय के आधार पर उसे परखने की है। क्योंकि, इस बार भी 23 तारीख को देश के अगले प्रधानमंत्री बनने का रास्ता यूपी (Uttar Pradesh) से ही होकर गुजरना लगभग तय है।

यूपी में क्या कहता है एग्जिट पोल?
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh)में महागठबंधन (Mahagathbandhan)बनते ही यह साफ लगने लगा था कि अब नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सपना साकार होना बहुत मुश्किल है। लेकिन, तमाम एग्जिट पोल (Exit poll)ने इस धारणा को फिलहाल गलत ठहरा दिया है। अगर यूपी के लिए आए 6 एग्जिट पोल के नतीजों का औसत निकालें तो महागठबंधन के बावजूद बीजेपी (BJP) की अगुवाई वाले एनडीए (NDA) को 52 और सपा-बसपा-आरएलडी (SP-BSP-RLD) को 26 एवं कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की गई है। ज्यादातर एग्जिट पोल में यूपी में महागठबंधन का प्रयोग नाकाम होता दिख रहा है। मायावती (Mayawati)और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav)ने यूपी (UP) में बीजेपी (BJP) का विजयरथ रोकने के लिए चौधरी अजित सिंह की आरएलडी के साथ गठबंधन का प्रयोग किया, लेकिन अधिकतर पोल में इसका फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। अगर यह अनुमान रिजल्ट में तब्दील होते हैं तो एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन के लिए बड़ा झटका होगा। सिर्फ दो एग्जिट पोल में सपा-बसपा-आरएलडी (SP-BSP-RLD) को 40 से ज्यादा सीटें बताई गई हैं, जिनमें अधिकतम संख्या 45 है। लेकिन, ज्यादातर एग्जिट पोल में बीजेपी (BJP) के ग्राफ को 2014 के मुकाबले नीचे तो दिखाया जा रहा है, लेकिन यह उतना कम नहीं है, जिसकी आशंका जताई जा रही थी। 5 एग्जिट पोल में बीजेपी को 50 से ज्यादा और दो में तो 65 से भी अधिक सीटें दी गई हैं। वहीं, ज्यादातर एग्जिट पोल में मायावती (Mayawati) और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के महागठबंधन को 10 से लेकर 29 सीटें ही दी जा रही हैं।

उतना असरदार क्यों नहीं हुआ महागठबंधन?
अगर हम एग्जिट पोल को (Exit poll) आधार मानकर चलें तो ये लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में मायावती (Mayawati) और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) एक-दूसरे का वोट ट्रांसफर करवाने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए हैं। दि पायनियर में छपी एक लेख में एक एक्सपर्ट ने इसका असल कारण बताने की कोशिश की है। कानपुर स्थिति सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स (Centre for Study of Society and Politics-CSSP) के डायरेक्टर डॉक्टर एके वर्मा (Dr AK Verma) के मुताबिक, "गठबंधन इस आधार पर बनाया गया था कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपनी पार्टी का वोट बीएसपी में ट्रांसफर करा पाएंगे और मायावती समाजवादी पार्टी को दलितों का वोट दिला पाएंगी। लेकिन, कागजों पर किए गए हिसाब-किताब में कई बार बड़ी चीजें छूट जाती हैं। पुराने उदाहरण और मौजूदा सच्चाई हमें बताता है कि मायावती और अखिलेश दोनों वोटों को ट्रांसफर करा पाने में उस हद तक कामयाब नहीं हो पाए होंगे, जितनी की जरूरत थी। अगर ऐसा हुआ है, तो बीजेपी के मुकाबले उनके चांस खत्म हो सकते हैं।"

ठीक से वोट ट्रांसफर नहीं करा पाए माया एवं अखिलेश?
तथ्य ये है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को 22.2 फीसदी और बीएसपी को 19.6 फीसदी वोट मिले थे। वर्मा बताते हैं, "अगर हम उन्हें यह मानकर जोड़ दें कि दोनों में शत-प्रतिशत वोट ट्रांसफर हुआ होगा, तब गठबंधन का वोट शेयर 41.8 फीसदी होगा। 2014 में यूपी में बीजेपी का वोट शेयर 42.3 फीसदी और उसकी सहयोगी अपना दल का वोट शेयर 1 फीसदी था। इन दोनों की तुलना करें तो एनडीए का 43.3 फीसदी वोट शेयर, एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन से 1.5 प्रतिशत ज्यादा है।" वो ये भी बताते हैं कि, "गठबंधन के सहयोगियों के बीच वोट ट्रांसफर करा पाना,करने से कहने में ज्यादा आसान है। वैसे भी अखिलेश अपनी पार्टी का वोट ट्रांसफर करवाने की क्षमता के लिए नहीं जाने जाते हैं। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस को एसपी (SP) का वोट ट्रांसफर करवाने में नाकाम रहे थे, जिसे सिर्फ 6.25 फीसदी वोट मिले और 114 सीटें लड़कर भी सिर्फ 7 पर ही जीत पाई थी। " डॉक्टर वर्मा ये भी कहते हैं कि, "मायावती की पहचान एक ऐसी नेता की रही है, जो जिस पार्टी को चाहें उसके लिए सफलतापूर्वक दलित वोटों का ट्रांसफर करवा दें। लेकिन, उनकी पारंपरिक छवि और दलित वोटों पर उनकी पकड़ को हाल के चुनावों में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।"

दलितों में बीजेपी की पकड़ मजबूत हुई है
दलित वोटों पर मायावती की पकड़ थोड़ी ढीली पड़ने की बात कही जा रही है, तो बीजेपी ने दलितों के बीच अपना आधार काफी मजबूत किया है और उसे काफी सफलता भी मिली है। 2014 के चुनावों में उसने यूपी की सभी 17 सुरक्षित लोकसभा सीटें जीत ली थी और 2017 के विधानसभा में भी राज्य की 80 सुरक्षित विधानसभा सीटों में से 70 पर उसके उम्मीदवार विजय रहे थे। इन हालातों में अगर एग्जिट पोल माया और अखिलेश को निराश कर रहा है, तो इसमें कोई हैरानी लायक बात नहीं कही जा सकती। डॉक्टर वर्मा बहुत ही चौंकाने वाली संभावना व्यक्त करते हुए कहते हैं, "अगर ऐसा होता है, तो सबकी नजरें उनकी इकट्ठे वोट शेयर में होने वाली गिरावट पर रहेगी। क्योंकि, गठबंधन (Alliance) और बीजेपी (BJP) ही यूपी में फ्रंट-रनर हैं, उनके वोट शेयर क्रमश: लगभग 35 फीसदी और 45 फीसदी रह सकते हैं। इसी से बीजेपी की अगुवाई वाले नेशनल डेमोक्रेटिक एलाएंस (NDA) को गठबंधन (SP-BSP-RLD) पर बढ़त मिलता है।"

2014 में यूपी का एग्जिट पोल ऐसा था
2014 में सीएनएन-आईबीएन के लिए लोकनीति-सीएसडीएस ने यूपी में बीजेपी और उसके सहयोगियों को 45 से 53 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की थी। सपा को 13 से 17, बसपा को 10 से 14 और कांग्रेस को 3 से 5 सीटें मिलने का अनुमान जताया था। वहीं, एबीपी न्यूज-नीलसन द्वारा किए गए एग्जिट पोल में बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को 46, सपा को 12, बसपा को 13 और कांग्रेस को 8 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था। टाइम्स नाउ-ओआरजी के सर्वे में दावा किया गया था कि एनडीए 49 सीटों पर जीत हासिल करेगी। न्यूज 24-टुडे चाणक्य ने एनडीए को 67 तो यूपीए को 3 सीटें जीतने का दावा किया था। इस सर्वे ने सपा को 4 और बीएसपी को 3 सीटें मिलने की बात कही थी। इंडिया टीवी सी-वोटर्स के मुताबिक एनडीए को 54 तो यूपीए को 7 सीटें मिलने का अनुमान जताया था। इस सर्वे ने सपा को 11 और मायावती की बीएसपी को 8 सीटें दी थीं। लेकिन, बसपा का खाता भी नहीं खुला था और सपा सिर्फ परिवार की 5 सीटें जीत पाई थी।
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