कौन हैं विश्वेश्वरय्या, जिनके नाम पर मोदी ने राहुल को चैलेंज किया

विश्वेश्वरय्या
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विश्वेश्वरय्या

मैदान तैयार है और दांव पर कर्नाटक है. यही वजह है कि इन दिनों चुनावी महासमर के अभियान में एक दिग्गज शख़्स का नाम भी मुक़ाबले की वजह बन गया है.

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और ये इन दिनों दो वजहों से चर्चा का विषय बने हुए हैं. पहला, ये मैसूर से आते हैं और दूसरा ये कि इनका नाम लेने में कांग्रेस अध्यक्ष ज़रा राहुल गांधी लड़खड़ा गए थे.

एक चुनावी सभा में कर्नाटक के दिग्गजों के नाम लेते हुए ये चूक हुई. इस रैली में उन्होंने कहा था, ''बड़े-बड़े नाम हैं, टीपू सुल्तान जी, कृष्ण राजा वडियार, विश्वस्वे...विश्वा...रैया...विश्वरैया...(मुस्कुराहट)...कुवेंपू जी...'' और विश्वेश्वरय्या के नाम के संबोधन में लड़खड़ाना भारी पड़ा.

साथ ही राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये चुनौती भी दी थी कि अगर वो संसद में 15 मिनट बोलेंगे तो मोदी टिक नहीं पाएंगे.

मंगलवार को मोदी ने पलटवार किया.

मोदी का पलटवार चैलेंज

मोदी
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मोदी

उन्होंने कहा, ''कांग्रेस अध्यक्ष जी ने हाल ही में मुझे चुनौती दी. उन्होंने कहा कि अगर वो संसद में 15 मिनट बोलेंगे तो मोदी जी बैठ भी नहीं पाएंगे. ये उन्होंने मुझे चुनौती दी है.''

''वे 15 मिनट बोलेंगे, ये भी बहुत बड़ी बात है. और मैं बैठ नहीं पाऊंगा, ये सुनकर मुझे याद आता है, क्या सीन है.''

मोदी ने कहा, ''कांग्रेस के अध्यक्ष जी, आपने सही कहा. हम आपके सामने नहीं बैठ सकते. आप तो नामदार हैं और हम कामदारों की क्या हैसियत की हम आपके सामने बैठ पाएं. हम तो अच्छे कपड़े भी नहीं पहन सकते. आपके सामने बैठकर हक़ कहां से हो सकता है.''

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''लेकिन इस चुनाव अभियान के दौरान कर्नाटक में, आपको जो भाषा पसंद हो, उसमें. हिंदी, अंग्रेज़ी या आपकी माता जी की मातृभाषा में आप 15 मिनट, हाथ में कागज़ लिए बिना कर्नाटक की आपकी सरकार की अचीवमेंट, सिद्धियां, 15 मिनट कर्नाटक की जनता के सामने बोल दीजिए.''

''और एक छोटा काम साथ-साथ काम कर देना. उस 15 मिनट के भाषण के दरम्यान, कम से कम पांच बार श्रीमान विश्वेश्वरय्या के नाम का उल्लेख कर देना. अगर इतना कर लिया तो कर्नाटक की जनता इस बात का फ़ैसला कर लेगी कि आपकी बातों में कितना दम है.''

कौन हैं विश्वेश्वरय्या?

लेकिन सवाल ये कि जिनके नाम और विरासत को लपकने की कोशिश हो रही है वो हैं कौन. और कर्नाटक चुनावों में अचानक उनकी अहमियत इतनी बढ़ी क्यों?

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या देश के बड़े इंजीनियर और जानकार रहे हैं. भारत में उनका जन्मदिन, 15 सितंबर अभियन्ता दिवस (इंजीनियर्स डे) के रूप में मनाया जाता है.

वो मैसूर के 19वें दीवान थे जिनका कार्यकाल साल 1912 से 1918 के बीच रहा. उन्हें न सिर्फ़ 1955 में भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया बल्कि सार्वजनिक जीवन में योगदान के लिए किंग जॉर्ज पंचम ने उन्हें ब्रिटिश इंडियन एम्पायर के नाइट कमांडर से भी नवाज़ा.

वो मांड्या ज़िले में बने कृष्णा राजा सागर बांध के निर्माण के मुख्य स्तंभ माने जाते हैं और उन्होंने हैदराबाद शहर को बाढ़ से बचने का सिस्टम भी दिया.

विश्वेश्वरय्या के पिता संस्कृत के जानकार थे. वो 12 साल के थे जब उनके पिता का निधन हो गया. शुरुआती पढ़ाई चिकबल्लापुर में करने के बाद वो बैंगलोर चले गए जहां से उन्होंने 1881 में बीए डिग्री हासिल की. इसके बाद पुणे गए जहां कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में पढ़ाई की.

उन्होंने बॉम्बे में पीडब्ल्यूडी से साथ काम किया और उसके बाद भारतीय सिंचाई आयोग में गए.

क्या-क्या बनाया?

दक्षिण भारत के मैसूर को एक विकसित और समृद्धशाली इलाक़ा बनाने में उनकी अहम भूमिका रही है. तब कृष्ण राज सागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत संस्थान उनकी कोशिशों का नतीजा हैं.

इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहा जाता है. वो 32 साल के थे, जब उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी भेजने का प्लान तैयार किया, जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया.

सरकार ने सिंचाई व्यवस्था दुरुस्त बनाने के लिए एक समिति बनाई जिसके तहत उन्होंने एक नया ब्लॉक सिस्टम बनाया.

उन्होंने स्टील के दरवाज़े बनाए जो बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था.

उनके इस सिस्टम की तारीफ़ ब्रिटिश अफ़सरों ने भी की. विश्वेश्वरय्या ने मूसा और इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान बनाया. इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया.

वो उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, चंदन, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया.

और वो रेल का किस्सा

रेलगाड़ी
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रेलगाड़ी

उन्होंने बैंक ऑफ मैसूर खुलवाया और इससे मिलने वाले पैसे का उपयोग उद्योग-धंधों को बढ़ाने में किया गया. 1918 में वो दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए.

उनसे जुड़ा एक और क़िस्सा काफ़ी मशहूर है. ब्रिटिश भारत में एक रेलगाड़ी चली जा रही थी जिसमें ज़्यादातर अंग्रेज़ सवार थे. एक डिब्बे में एक भारतीय मुसाफिर गंभीर मुद्रा में बैठा था.

सांवले रंग और मंझले कद का वो मुसाफ़िर सादे कपड़ों में थे और वहां बैठे अंग्रेज़ उन्हें मूर्ख और अनपढ़ समझकर मज़ाक उड़ा रहे थे. पर वो किसी पर ध्यान नहीं दे रहे थे.

लेकिन अचानक उस व्यक्ति ने उठकर गाड़ी की जंज़ीर खींच दी. तेज़ रफ्तार दौड़ती ट्रेन कुछ ही पलों में रुक गए. सभी यात्री चेन खींचने वालों को भला-बुरा कहने लगे. थोड़ी देर में गार्ड आ गया और सवाल किया कि जंज़ीर किसने खींची.

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, 'मैंने.' वजह पूछी तो उन्होंने बताया, ''मेरा अंदाज़ा है कि यहां से लगभग कुछ दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है.'

गार्ड ने पूछा, 'आपको कैसे पता चला?' वो बोले, 'गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आया है और आवाज़ से मुझे खतरे का आभास हो रहा है.'

गार्ड उन्हें लेकर जब कुछ दूर पहुंचा तो देखकर दंग रह गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं और सब नट-बोल्ट अलग बिखरे पड़े हैं.

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