30 साल पहले जब पहली हार पर रो पड़े थे शत्रुघ्न सिन्हा
नई दिल्ली। सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है.... मशहूर अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा के दिल में जज्बातों का एक ऐसा ही समंदर मचल रहा है। करीब 30 साल पहले राजनीति के गलियारे में दाखिल होने के वक्त वे एक गहरे कश्मकश से गुजरे थे। आज उनके मन में गुस्सा है लेकिन उस वक्त उनकी आंखों में आंसू छलक गये थे। दर्द तब भी था आज भी है। उनका सियासी किरदार अब बदलने वाला है। भाजपा के बिहारी बाबू अब कांग्रेस के होने वाले हैं। कांग्रेस में शामिल होने के बाद वे पटना साहिब से चुनाव लड़ेंगे। ये राजनीति भी अजीब शै है। बिल्कुल मौसम के मिजाज की तरह। पल-पल रंग बदलने वाली।

30 साल पहले का याद आया मंजर
शत्रुघ्न सिन्हा रहने वाले तो पटना के हैं लेकिन उनकी राजनीति की शुरुआत दिल्ली में हुई थी। उन्हें बेमन से राजनीति में दाखिल होना पड़ा था। इसकी वजह थे भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी। 1991 के लोकसभा चुनाव में लाल कृष्ण आडवाणी ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था। नयी दिल्ली और गांधीनगर से। दोनों सीटों पर वे जीते। लेकिन नयी दिल्ली सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार और चर्चित फिल्म स्टार राजेश खन्ना ने आडवाणी को पानी पिला दिया था। एक बार तो लगा कि आडवाणी हारने वाले हैं। लेकिन गिरते पड़ते आडवाणी किसी तरह करीब सौलह सौ वोटों से जीत गये। राजनीति के एक नौसिखिए ने भाजपा के बरगद को हिला दिया था। आडवाणी जीत कर भी डर गये। दिल्ली ने दिल तोड़ दिया था। जब एक सीट से इस्तीफा देने का वक्त आया तो उन्होंने दिल्ली छोड़ दी। फिर उपचुनाव की नौबत आयी। अब भाजपा ने इस सीट पर वैसे मजबूत प्रत्याशी की तलाश शुरू की जो राजेश खन्ना का मुकाबला कर सके। भाजपा की तलाश शत्रुघ्न सिन्हा पर खत्म हुई।

बेमन से आये थे राजनीति में
कामयाब अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा राजनीति में तो नहीं थे लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की बहुत इज्जत करते थे। वे अटल-आडवाणी के भाषणों के कद्रदान थे। भाजपा के नेताओं ने जब शत्रुघ्न सिन्हा से चुनाव के लिए सम्पर्क किया तो उन्होंने इंकार कर दिया। वे राजेश खन्ना के कद और रुतबे से वाकिफ थे। राजेश खन्ना से उनकी दोस्ती तो नहीं थी लेकिन हमपेशा होने की वजह से लिहाज जरूर करते थे। वे राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी जीवनी में तफ्सील से इस बात का जिक्र किया है। एक दिन लालकृष्ण आडवाणी ने शत्रुघ्न सिन्हा को फोन किया। आडवाणी चाहते थे कि उनकी इस सीट पर भाजपा की जीत किसी तरह सुनिश्चित हो जाए। आडवाणी ने शत्रुघ्न सिन्हा को दिल्ली उपचुनाव लड़ने का न्यौता दिया। वे आडवाणी की बात नहीं टाल पाये।

आडवाणी के कहने पर लड़ा था पहला चुनाव
1991 में नयी दिल्ली लोकसभा सीट पर राजेश खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा में मुकाबला हुआ। राजेश खन्ना का स्टरडम ढलान पर था, लेकिन लोगों के दिलों में उनकी सुनहरी यादें बसी हुईं थीं। शत्रुघ्न सिन्हा गुजरे जमाने के इस सुपर स्टार का मुकाबला नहीं कर पाये। राजेश खन्ना ने शत्रुघ्न सिन्हा को करीब 28 हजार वोटों से हरा दिया। इस हार से शत्रुघ्न सिन्हा विचलित हो गये थे। जिसका डर था वही बात हो गयी। शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी जीवनी में लिखा है कि ये हार उनके जीवन की सबसे दुखदायी घटना है।

चुनाव में हारने के बाद रोये थे बिहारी बाबू
दिल्ली उपचुनाव में हार से शत्रुघ्न सिन्हा इतना भावुक हो गये कि रोने लगे थे। वे उपचुनाव से अपना राजनीति सफर शुरू नहीं करना चाहते थे। सबसे अधिक मलाल राजेश खन्ना को चुनौती देने पर था। इसके लिए उन्होंने राजेश खन्ना से माफी तक मांगी थी। शत्रुघ्न सिन्हा लालकृष्ण आडवाणी को गाइड और गुरु मानते थे। लेकिन आडवाणी के रवैये से भी तकलीफ हुई थी। आडवाणी इस चुनाव में प्रचार के लिए एक दिन भी नहीं आये थे। बाद में आडवाणी और शत्रुघ्न सिन्हा बहुत नजदीक हुए। आडवाणी की पहल पर ही शत्रुघ्न सिन्हा को पटना साहिब से टिकट मिला था। आडवाणी की बदौलत उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।

भाजपा से कांग्रेस की तरफ
भाजपा से नकारे जाने के बाद अब शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस में जाने वाले हैं। 28 मार्च को वे कांग्रेस ज्वाइन करेंगे। शत्रुघ्न सिन्हा पहले राजद में जाना चाहते थे। इसके लिए वे तेजस्वी और लालू की तारीफें करते थे। लालू प्रसाद के घर भी जाते थे। पिछले 2 मार्च को वे लालू से मिलने के लिए रांची गये थे। वे पटना साहिब सीट पर महागठबंधन की उम्मीदवारी चाहते थे। बात बन भी गयी थी। लेकिन इस बीच जातीय अंकगणित ने उनका समीकरण बिगाड़ दिया। शत्रुघ्न सिन्हा को समझाया गया कि एक सवर्ण उम्मीदवार के पक्ष में पिछड़े मतों की गोलबंदी मुश्किल होगी। राजद का प्रत्याशी बनने से ऊंची जाति के लोग भी शत्रुघ्न सिन्हा से किनारा कर सकते थे। इस लिए बेहतर होगा कि वे राजद की बजाय कांग्रेस का उम्मीदवार बनें। जाति को साधे बिना चुनावी राह कठिन होती इस लिए अब बिहारी बाबू कांग्रेस का हाथ थामेंगे।
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