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त्रिपुरा में फिर खिला कमल, बीजेपी के जीत दोहराने की वजह क्या रही?

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत
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त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत

त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी फिर एक बार सरकार बनाने जा रही है.

60 सदस्यों वाली त्रिपुरा विधानसभा में किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए कम से कम 31 सीटों की ज़रूरत है.

गुरुवार को हुई मतगणना के बाद भारतीय जनता पार्टी 32 सीटें जीत कर सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के रूप में उभरी. हालांकि, भाजपा का इस बार का प्रदर्शन साल 2018 के प्रदर्शन के मुक़ाबले का नहीं रहा जब पार्टी ने 36 सीटें जीती थीं.

2018 विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी भाजपा ने इंडिजेनस पीपल्स फ़्रंट ऑफ़ त्रिपुरा (आईपीएफ़टी) के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था. जहां 2018 में आईपीएफ़टी ने 8 सीटें जीती थीं, वहीं इस बार ये पार्टी मात्र एक सीट ही जीत सकी है. इस एक सीट को मिला कर भाजपा गठबंधन की कुल 33 सीटें हो गई हैं जो सरकार बनाने के लिए काफ़ी हैं.

सीटें घटने के साथ भाजपा के वोट-शेयर में भी कमी आई है. पिछले चुनाव में भाजपा का वोट-शेयर क़रीब 44 फ़ीसद रहा था. इस बार वो घट कर 39 फ़ीसदी रह गया है.

BJP
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क्या रहीं भाजपा के जीतने की वजहें?

त्रिपुरा की राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि भाजपा की जीत के पीछे एक बड़ी वजह पिछले पांच साल में तेज़ी से विकास कार्यों का होना है.

अगरतला में पीटीआई के वरिष्ठ पत्रकार जयंता भट्टाचार्य कहते हैं, "नए रेल लिंक बने, नई सड़कें और राष्ट्रीय राजमार्ग बने. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बहुत से लोगों को घर मिले. सामाजिक पेंशनों को बढ़ाया गया. शौचालय बनाए गए. बहुत सी कल्याणकारी योजनाएं चलाई गईं. इस सब का भाजपा की जीत में एक बड़ा योगदान रहा है."

अगरतला में द इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार देबराज देब भी मानते हैं कि केंद्र सरकार की विकास से जुड़ी प्रमुख योजनाओं का भाजपा की जीत में एक बड़ा हाथ रहा है. साथ ही वे कहते हैं कि कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स आने की वजह से भी भाजपा को फ़ायदा हुआ.

बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देबराज देब फेनी नदी पर बने भारत-बांग्ला मैत्री ब्रिज और दक्षिण त्रिपुरा के बांग्लादेश से लगते छोर पर सबरूम में बनाए जा रहे इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट का ज़िक्र करते हैं. साथ ही वे अगरतला और बांग्लादेश के अखौरा के बीच शुरू होने जा रहे रेल लिंक प्रोजेक्ट को भी गिनाते हैं.

ये भी पढ़ें:- त्रिपुरा और नगालैंड में बीजेपी की बन रही है सरकार, क्या है इसके राजनीतिक मायने

https://twitter.com/BBCHindi/status/1631309246217310209

देबराज देब कहते हैं कि इन सब इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की वजह से त्रिपुरा को एक बिज़नेस हब बनाने की कोशिश की जा रही है. "ये भी कहा जा रहा है कि आने वाले समय में त्रिपुरा गुवाहाटी के बाद दक्षिण पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार बन सकता है."

वे यह भी कहते हैं कि 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद से ही त्रिपुरा में कनेक्टिविटी के क्षेत्र में काफ़ी बदलाव आए हैं, चाहे वो ब्रॉडगेज रेल कनेक्टिविटी की बात हो या त्रिपुरा में नवीनतम सुविधाओं से लैस त्रिपुरा के नए एयरपोर्ट टर्मिनल की.

देब कहते हैं, "घर, पानी, कनेक्टिविटी, व्यापार, रोज़गार जैसे मुद्दों पर काफ़ी काम हुआ है बीजेपी के शासन में. बीजेपी का भी मानना है कि इन मुद्दों पर काम करने का फल उसे मिला है."

Congress, Left, कांग्रेस, लेफ़्ट
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Congress, Left, कांग्रेस, लेफ़्ट

'लेफ़्ट और कांग्रेस की केमिस्ट्री नहीं चली'

इस बार के चुनावों में भाजपा का सीधा मुक़ाबला लेफ़्ट और कांग्रेस के गठबंधन से था.

पिछले चुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई थी. इस बार पार्टी को तीन सीटों पर जीत मिली है.

लेकिन सीपीएम की सीटों की संख्या पिछले चुनावों में जीती 16 सीटों से घट कर इस बार 11 सीटों पर आ गई.

जानकारों का कहना है कि त्रिपुरा की राजनीति के इतिहास में जाएं तो ये साफ़ है कि लेफ़्ट और कांग्रेस के बीच एक लंबे अरसे तक तनाव और हिंसा का माहौल रहा है. दोनों ही पार्टियां अतीत में एक दूसरे पर हिंसा, राजनीतिक अपराध और हत्या के आरोप लगाती रही हैं.

देबराज देब कहते हैं, "उन हिंसक घटनाओं की यादें जनता के ज़हन में अब भी ज़िंदा हैं और इन दो प्रतिद्वंद्वियों के ठीक चुनाव से पहले एक साथ आ जाने के बाद जो दोनों पार्टियों को एक-दूसरे के वोट ट्रांसफ़र होने की उम्मीद थी, वो शायद नहीं हुआ."

जानकारों की मानें तो कांग्रेस को शायद लेफ़्ट के साथ गठबंधन करने का थोड़ा फ़ायदा हुआ, लेकिन लेफ़्ट को इस गठबंधन से कोई ख़ास लाभ नहीं मिला.

देबराज देब कहते हैं कि लेफ़्ट और कांग्रेस की केमिस्ट्री के न चलने की वजह से भाजपा का जीतना और आसान हो गया.

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https://twitter.com/ANI/status/1631286760742453248

टिपरा मोथा का उदय

त्रिपुरा के पूर्व शाही परिवार के वंशज प्रद्योत देबबर्मा के नेतृत्व में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही टिपरा मोथा पार्टी ने इस बार के चुनावों में 13 सीटें जीत कर एक शानदार शुरुआत की है.

जनजातीय लोगों के हितों और अधिकारों की रक्षा को मुद्दा बनाने वाली टिपरा मोथा अतीत में 'ग्रेटर टिपरालैंड' की बात भी करती रही है.

टिपरा मोथा के प्रदर्शन के बारे में जयंता भट्टाचार्य कहते हैं, "लोगों को ये भी लगा कि अगर उन्हें अपने लिए एक अलग राज्य मिल जाए तो उनकी बहुत-सी दिक़्क़तें दूर हो सकती हैं और आकांक्षाएं पूरी हो सकती हैं. इसी वजह से ये पार्टी इतनी सीटें जीत पाई है."

उनका मानना है कि टिपरा मोथा पार्टी के चुनावी मैदान में आने से सबसे ज़्यादा नुक़सान लेफ़्ट को हुआ है. वे कहते हैं, "टिपरा मोथा ने सुरक्षित जनजातीय इलाक़ों के बाहर भी उम्मीदवार खड़े किए थे और ऐसे कुछ इलाक़ों में बहुत से जनजातीय लोग जो पारम्परिक तौर से सीपीएम के समर्थक थे, वो टिपरा मोथा की तरफ़ चले गए. ऐसे में नुक़सान सीपीएम का हुआ."

देबराज देब भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. वे कहते हैं कि ऐसा लगता है कि लेफ़्ट और कांग्रेस के गठबंधन को मिलने वाले जनजातीय वोट टिपरा मोथा की तरफ़ आए हैं. "इस से भी बीजेपी को जीत हासिल करने में आसानी हुई है."

जयंता भट्टाचार्य के मुताबिक़, टिपरा मोथा के उदय का नुक़सान भाजपा गठबंधन में शामिल आईपीएफ़टी पार्टी को भी उठाना पड़ा.

वे कहते हैं, "आईपीएफ़टी और टिपरा मोथा की मांगें लगभग एक जैसी हैं. तो आईपीएफ़टी के ज़्यादातर नेता और कार्यकर्त्ता टिपरा मोथा की तरफ़ चले गए. आईपीएफ़टी के ख़राब प्रदर्शन की यही वजह रही है."

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https://twitter.com/ANI/status/1631331272810463233

क्या भाजपा बढ़ाएगी टिपरा मोथा की तरफ़ दोस्ती का हाथ?

भाजपा गठबंधन के पास 33 सीटें हैं और एक बड़ी चर्चा इस बात को लेकर भी हो रही है कि क्या भाजपा टिपरा मोथा से गठबंधन करने के बारे में सोच सकती है.

कुछ जानकारों का मानना है कि टिपरा मोथा को साथ मिला लेने से भाजपा गठबंधन की 46 सीटें हो जाएँगी जो पार्टी के लिए एक सुविधाजनक स्थिति होगी.

चुनाव से पहले भी ये चर्चा गर्म थी कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां टिपरा मोथा के साथ गठबंधन करने की कोशिश कर रही थीं. लेकिन टिपरा मोथा की एक अलग राज्य की मांग दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों को नामंज़ूर थी और कोई गठबंधन नहीं हो सका.

इस बार के चुनाव में भाजपा गठबंधन में शामिल आईपीएफ़टी के ख़राब प्रदर्शन के बाद फिर से कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा फिर एक बार टिपरा मोथा की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ा सकती है.

इस बीच ये ख़बरें भी आ रही हैं कि भाजपा की तरफ़ से ये संकेत दिया गया है कि वो अलग राज्य की मांग के अलावा टिपरा मोथा की बाकी सभी मांगों को मानने की लिए तैयार है.

जयंता भट्टाचार्य कहते हैं कि उन्हें भाजपा और टिपरा मोथा के एक साथ आने की सम्भावना नहीं दिखती क्योंकि भाजपा को बहुमत मिल गया है.

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