छेल्लो शो: भारत की ओर से ऑस्कर में भेजी गई फ़िल्म की कहानी क्या है

डायरेक्टर पान नलिन की गुजराती फ़िल्म 'छेल्लो शो' को भारत की ओर से 95वें ऑस्कर्स के लिए आधिकारिक रूप से भेजा गया है. ये एंट्री भारत की ओर से बेस्ट इंटरनेशनल फ़ीचर फ़िल्म कैटेगरी में की गई है.

what story of chello show

मंगलवार को फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के महासचिव सुपर्ण सेन ने इसका आधिकारिक एलान किया. जाने-माने कन्नड़ फ़िल्म डायरेक्टर टीएस नागाभरना की अध्यक्षता वाली ज्यूरी ने 'छेल्लो शो' फ़िल्म का चयन किया.

'छेल्लो शो' का वर्ल्ड प्रीमियर न्यूयॉर्क में होने वाले ट्रिबैका फ़िल्म फ़ेस्टिवल में किया गया. भारत में ये फ़िल्म 14 अक्टूबर को रिलीज़ की जाएगी.

अपनी फ़िल्म को आधिकारिक रूप से ऑस्कर्स में भेजे जाने को लेकर पान नलिन ने ट्वीट किया, "आज की रात ख़ास है! फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया और ज्यूरी का आभार. 'छेल्लो शो' फ़िल्म में यकीन करने के लिए शुक्रिया. मैं अब फिर सांस ले सकता हूँ और मान सकता हूं कि सिनेमा मनोरंजन और प्रेरित करता है. "

सिनेमा से प्यार की कहानी


छेल्लो गुजराती शब्द है जिसका अर्थ होता है आख़िरी. छेल्लो शो का मतलब है आखिरी शो.

ये कहानी है एक नौ साल के बच्चे की जिसका नाम समय है. समय सिनेमा की जादुई दुनिया के प्रति आकर्षित होता है. सौराष्ट्र के चलाला गांव में बुनी गई इस कहानी में समय अपने पिता की चाय की दुकान पर उनके साथ काम करता है, ये चाय की दुकान रेलवे स्टेशन पर है. ये वो स्टेशन है जहां इक्का-दुक्का ट्रेन ही रुकती है, लिहाज़ा परिवार आर्थिक तंगी से जूझता है.

समय का मन पढ़ाई में नहीं लगता. वह अपने परिवार के साथ एक बार फ़िल्म देखने जाता है और यहीं फ़िल्म थिएटर की ओर उसकी रुचि बढ़ती है.

यहां उसकी मुलाक़ात प्रोजेक्टर ऑपरेटर फ़ैज़ल से होती है. समय की मां अच्छा-खाना बनाती है और समय अपना खाना फ़ैज़ल को खिलाता है जिसके बदले में वह समय को प्रोजेक्टर वाले कमरे से फ़िल्में देखने देता है. ये प्रोजेक्टर का कमरा समय का पहला सिनेमा स्कूल बन जाता है.

https://www.youtube.com/watch?v=_tDrxxjumYA

समय के पिता (दीपेन रावल) चाहते हैं कि उनका बेटा 'आदर्श' बने और पढ़ाई पर ध्यान देकर परिवार की आर्थिक तंगी दूर करे.

लेकिन नौ साल का समय स्कूल छोड़ कर प्रोजेक्टर कमरे से सिनेमा देखता है और अपने सिनेमा के प्यार और लगाव के कारण वह देसी जुगाड़ से एक प्रोजेक्टर बनाता है.

इस फ़िल्म के ज़रिए सिनेमा की दुनिया के बदलते परिदृश्य को दिखाया गया है. कैसे भारत में सिनेमा सेल्युलॉयड यानी पारंपरिक रील से डिजिटल की ओर बढ़ चुका है और कैसे देश से सिंगल स्क्रीन थियेटर ख़त्म हो रहे हैं और उनकी जगह मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल ने ले ली है.

फ़िल्म के डायरेक्टर नलिन के मुताबिक़ छेल्लो शो 'सेमी-ऑटोबायोग्राफ़िकल फ़िल्म' है जिसका मतलब है कि ये फ़िल्म कुछ हद तक उनके जीवन की कहानी पर आधारित है.

छेल्लो शो की तुलना 1998 में आई इटैलियन फिल्म 'सिनेमा पैराडिसो' से की जा रही है जिसमें आठ साल का बच्चा सेलवाटोर अपना सारा वक्त सिनेमा पैराडिसो नाम के थिएटर में बिताता है और अल्फ्रेडो नाम का प्रोजेक्टर ऑपरेटर उसे ऑपरेटर बूथ से फ़िल्में दिखाता है. इसके बदले सेलवाटोर ऑपरेटर की छोटे-छोटे कामों में मदद करता है. मसलन- रील बदलना, प्रोजेक्टर चलाना.


कुछ ज़रूरी तथ्य

  • गुजराती फ़िल्म 'छेल्लो शो' को भारत ने अपनी आधिकारिक एंट्री के तौर पर 95वें ऑस्कर्स के लिए के लिए नॉमिनेट किया है
  • डायरेक्टर पान नलिन की ये फ़िल्म समय सिनेमा की जादुई दुनिया के प्रति एक बच्चे के आकर्षण की कहानी है
  • कई फ़िल्म पत्रकार एसएस राजामौली की पीरियड ड्रामा 'आरआरआर' को ना भेजे जाने पर फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया की आलोचना कर रहे हैं
  • छेल्लो शो 'सेमी-ऑटोबायोग्राफ़िकल फ़िल्म' है

कौन हैं डायरेक्टर पान नलिन


पान नलिन अवॉर्ड-विनिंग फ़िल्मों के डायरेक्टर के तौर पर जाने जाते हैं. उन्होंने समसारा, वैली ऑफ़ फ़्लावर, एंग्री इंडियन गॉडेस और आयुर्वेद: आर्ट ऑफ़ बीइंग जैसी फिल्में बनाई हैं.

पान नलिन ने सिनेमा की ट्रेनिंग नहीं ली. उन्होंने ये कला ख़ुद से सीखी. उन्होंने अहमदाबाद स्थित नेशनल स्कूल ऑफ़ डिज़ाइन से पढ़ाई की है.

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में पान ने कहा- " ये फ़िल्म भारत की आत्मा को सेलिब्रेट करती है. ये कहानी एक लड़के की है जो सिनेमा की दुनिया में कुछ बड़ा करना चाहता है और कुछ भी उसे रोक नहीं सकता. इस फ़िल्म के ज़रिए संदेश है कि- आप अपने सपनों का पीछा करें और कामयाबी आपको मिल कर रहेगी. अहम बात ये है कि कहानी का नैरेटिव बेहद साधारण और ऑर्गेनिक तरीके से आगे बढ़ता है."

पान नलिन बताते हैं कि इस फ़िल्म को बनाने में साढ़े तीन साल का समय लगा.

'आरआरआर' को लेकर ट्विटर पर ख़ूब चर्चा


ट्विटर पर कई फिल्म समीक्षक और यूज़र्स इस बात पर हैरानी जता रहे हैं कि इस साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली एसएस राजामौली की पीरियड ड्रामा फ़िल्म 'आरआरआर' को भारत की ओर से आधिकारिक एंट्री के तौर पर क्यों नहीं भेजा गया.

कहा ये भी जा रहा है कि इस फ़िल्म ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेहतरीन व्यापार किया था. ज़बर्दस्त वीएफ़एक्स और भारी-भरकम फ़ाइट सीक्वेंस, शानदार दृश्यों ने इसे लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय बनाया था.

पत्रकार असीम छाबड़ा ने ट्वीट किया, "फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया बड़ी अजीबोगरीब संस्था है. साल 2013 में जब कई विदेशी समीक्षकों ने कहा 'लंचबॉक्स' फ़िल्म को ऑस्कर्स में भारत की इंट्री होना चाहिए तो इसे अनदेखा कर दिया गया. इसी तरह 'द डिसाइपल' फ़िल्म जिसने विदेशों में सराहना बटोरी उसे भी इन लोगों ने अनदेखा कर दिया, अब 'आरआरआर' को अमेरिका में मिली लोकप्रियता को इन लोगों ने अनदेखा कर दिया है."

https://twitter.com/chhabs/status/1572214891519545347

फ़िल्म पत्रकार रोहित खिलनानी ने ट्वीट किया, "आरआरआर के लिए ऑस्कर्स में बेहतरीन मौका था, लेकिन भारत ने इसमें चूक कर दी."

https://twitter.com/rohitkhilnani/status/1572211307767828481?ref_src=twsrc^tfw|twcamp^tweetembed|twterm^1572211307767828481|twgr^35296983759b7acbe0697f89945067f26a2cb484|twcon^s1_&ref_url=https://scroll.in/reel/1033289/a-missed-opportunity-social-media-reacts-to-chhello-show-being-chosen-as-indias-oscar-entry

फ़िल्म पत्रकार नम्रता जोशी लिखती हैं, " ये आरआरआर की आर्टिस्टिक ख़ूबियों या कमियों की तरफ़दारी नहीं है, लेकिन मैं सहमत हूं कि इस फ़िल्म की विदेशों में खूब चर्चा है. टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में कई लोग आरआरआर के बारे में बात कर रहे थे. ये एक बड़ी चूक है "

https://twitter.com/Namrata_Joshi/status/1572281695864496135

इंटरनेटमेंट वेबसाइट पिंकविला के हिमेश लिखते हैं, "आरआरआर की लोकप्रियता को देखते हुए वास्तव में हमारे पास ऑस्कर्स में कुछ बड़ा हासिल करने का मौका था. ये दिल तोड़ने वाला है कि एक फ़िल्म जिसे दुनिया भर में सराहा गया वो कुछ ज्यूरी सदस्यों की ओर से पहचानी नहीं जा सकी क्योंकि उन्होंने आर्ट सिनेमा को पसंद किया हैं.''

https://twitter.com/HimeshMankad/status/1572204388214800384

"ऐसा लगता है कि हमारी ज्यूरी ऐसी फ़िल्म नॉमिनेट करने में शर्मिंदगी महसूस करती है जो 'कॉमर्शियल' और 'बॉक्स ऑफ़िस फ्रेंडली' हो. क्राफ्ट कितना बेहतर है इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. साल 2015 में हम 'बाहुबली' और 'बजरंगी भाईजान' के ज़रिए मौका गंवा चुके हैं, साल 2016 में 'दंगल' के साथ भी यही हुआ और अब साल 2022 में 'आरआरआर' के साथ यही हो रहा है. इन सारी फ़िल्मों को दुनियाभर में सराहा गया था. "

(कॉपी- कीर्ति दुबे)

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