'लोन राइट ऑफ़' क्या आम लोगों के पैसे की लूट है?
*** के सैंकड़ों/हज़ारों करोड़ रुपये बट्टे खाते में गए.
ऐसी ख़बरें अक्सर अख़बार, टीवी, ऑनलाइन पोर्टल और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बनती रही हैं.
*** देखकर कहीं आप ये तो नहीं सोचने लगे कि यहाँ कोई शब्द भूलवश छूट गया है. नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. आप इन तीन स्टार्स की जगह किसी भी बैंक (सरकारी हो या प्राइवेट) का नाम भरकर सर्च इंजन पर डालिए, आपको नतीजा मिल ही जाएगा.
बट्टे खाते में गई रकम (राइट ऑफ़) पिछले दिनों एक बार फिर चर्चा में आ गई. जब सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई एक जानकारी के मुताबिक केनरा बैंक ने बताया कि पिछले 11 साल के दौरान उसने 1.29 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ राइट ऑफ़ किए हैं.
(हालाँकि राइट ऑफ़ की ये रकम हर तीसरे महीने सार्वजनिक होती है, जब शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध बैंक अपने तिमाही नतीजे घोषित करते हैं. इन्हीं नतीजों में उन्हें अपने शेयरधारकों को ये जानकारी भी देनी होती है कि बैंक ने कितनी राशि के कर्ज़ राइट ऑफ़ किए हैं.)
केनरा बैंक की इस ख़बर के सामने आने के बाद विपक्ष के कई नेताओं ने सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया. वकील प्रशांत भूषण, मार्क्सवादी नेता सीताराम येचुरी समेत कई नेताओं ने सोशल मीडिया पर सरकार को घेरा और कहा कि सरकारी बैंक लोन राइट ऑफ़ कर लोगों के पैसे को लूट रहे हैं.
तो क्या लोन राइट ऑफ़ को लेकर विपक्ष के दावे सही हैं या फिर सरकार जान-बूझकर और तकनीकी शब्दावली का इस्तेमाल कर इतनी बड़ी रकम को छिपा रही है?
{image-पिछले पाँच साल में सरकारी बैंकों की बट्टे खाते में गई रकम. . . hindi.oneindia.com}
टेक्निकल राइट ऑफ़ और कर्ज़माफ़ी की इस गुत्थी को सुलझाने के लिए पहले बैंकिंग सिस्टम को समझते हैं. सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि लोन की बैंकों के लिए अहमियत क्या है?
दरअसल, बैंकिंग कारोबार ग्राहकों की रकम को जमा करने से अधिक उन्हें उधार यानी कर्ज़ देने पर आधारित है. बैंक के लिए ये दोनों करने ज़रूरी होते हैं. बैंक या वित्तीय संस्थानों के लिए लोन एक एसेट (संपत्ति) हैं, क्योंकि ये बैंक को आय देते हैं. बैंक जो लोन ग्राहकों को बतौर कर्ज़ देते हैं, उसे ब्याज समेत वसूलते हैं.
दूसरी तरफ़ ग्राहकों का जमा पैसा (डिपॉज़िट्स) बैंक की लाइबिलिटी यानी देनदारी है. इसी रकम का इस्तेमाल बैंक कर्ज़ देने में करते हैं, लेकिन उन्हें इसे (डिपॉज़िट्स को) ग्राहक को वापस चुकाना होता है.
राइट ऑफ़ क्या है?
जो कर्जदार (बकायेदार) सक्षम होने के बावजूद जानबूझकर अपना लोन नहीं चुकाते हैं. उन्हें विलफुल डिफॉल्टर कहा जाता है. जब इन विलफुल डिफॉल्टर से कर्ज वापसी की उम्मीदें पूरी तरह से खत्म हो जाती हैं. तब बैंक इन लोगों को दिए गए कर्ज को डूबा हुआ मानकर बट्टे खाते में डाल देती है यानी राइट ऑफ कर देती है.
लेकिन, लोन राइट ऑफ करने का ये मतलब नहीं होता है कि यह कर्ज़माफ़ी है. बैंक केवल अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा रखने के लिए ऐसा करते हैं. इसकी भी एक प्रक्रिया है.
{image-जानबूझकर कर्ज़ न चुकाने वालों की तादाद. . . hindi.oneindia.com}
आरबीआई (RBI) के नियमानुसार, बैंक पहले लोन को नॉन परफॉर्मिंग एसेट (NPA) करार देते हैं और, जब इसकी वसूली नहीं हो पाती है तब इसे राइट ऑफ़ किया जाता है. वहीं, सरकार ने ऐसे भगोड़े आर्थिक अपराधियों से निपटने के लिए कानून भी बनाया है. जिसके तहत भगोड़े कारोबारियों को देश में वापस लाने की कोशिश की जाती है. और, कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए उसकी चल-अचल संपत्तियों को जब्त कर कर्ज वसूला जाता है.
क्या होता है एनपीए?
एनपीए समझने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि बैंक काम कैसे करते हैं. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. मसलन बैंक में अगर 100 रुपये जमा हैं तो उसमें से साढ़े 4 रुपये (CRR अभी 4.5 प्रतिशत है) रिज़र्व बैंक के पास रखा जाता है, 18 रुपये (अभी एसएलआर 18 प्रतिशत है) बॉन्ड्स या गोल्ड के रूप में रखना होता है.
बाकी बचे हुए साढ़े 77 रुपयों को बैंक कर्ज़ के रूप में दे सकता है. इनसे मिले ब्याज से वो अपने ग्राहकों को उनके जमा पर ब्याज का भुगतान करता है और बचा हुआ हिस्सा बैंक का मुनाफ़ा होता है.
रिज़र्व बैंक के अनुसार बैंकों को अगर किसी परिसंपत्ति (एसेट्स) यानी कर्ज़ से ब्याज आय मिलनी बंद हो जाती है तो उसे एनपीए माना जाता है.
बैंक ने जो धनराशि उधार दी है, उसके मूलधन या ब्याज की किश्त अगर 90 दिनों तक वापस नहीं मिलती तो बैंकों को उस लोन को एनपीए में डालना होगा.
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एनपीए होने के क्या हैं नियम
कोई लोन खाता निकट भविष्य में एनपीए बन सकता है या नहीं, इसकी पहचान के लिए रिज़र्व बैंक ने नियम बनाए हैं. इसके तहत बैंकों को उनके लोन खातों को स्पेशल मेंशन अकाउंट (एसएमए) के तौर पर चिन्हित करना होता है.
किसी लोन खाते को एनपीए घोषित करने के बाद बैंक को उस एनपीए खाते का तीन श्रेणियों - 'सब स्टैंडर्ड एसेट्स', 'डाउटफुल एसेट्स' और 'लॉस एसेट्स' के रूप में बाँटना पड़ता है.
जब कोई लोन खाता एक साल या इससे कम अवधि तक एनपीए की श्रेणी में रहता है तो उसे 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' कहा जाता है, एक साल तक 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' की श्रेणी में रहता है तो उसे 'डाउटफुल असेट्स' कहा जाता है. जब बैंक यह मान लेता है कि कर्ज़ अब वसूल नहीं हो सकता तो उसे 'लॉस असेट्स' की श्रेणी में डाल दिया जाता है.
{image-भारत के सबसे बड़े बकायादार. . . hindi.oneindia.com}
बैंकिंग एक्सपर्ट काजल जैन कहती हैं, "रिजर्व बैंक ने फ़रवरी में एनपीए नियम कड़े करते हुए लगभग आधा दर्जन नियम खत्म कर दिए थे. अब किसी कर्ज़ डिफॉल्ट के मामले में बैंकों को 180 दिन के भीतर उसका समाधान निकालना अनिवार्य कर दिया गया है. ऐसा नहीं होने की स्थिति में उस खाते को दिवालिया प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाना होगा."
काजल कहती हैं, "नए नियम के तहत 2,000 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा के लोन डिफॉल्ट के मामलों में बैंक अधिकारियों को 180 दिन के भीतर समाधान यानी प्रोविजनिंग की योजना तैयार करनी होगी. ऐसा नहीं होने पर उसे दिवालिया प्रक्रिया में ले जाना होगा."
अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, "कुछ हद तक ये सही है कि बैंकों में डिफॉल्ट के मामले बढ़ रहे हैं. लेकिन अब बैंकों को उसकी प्रोविजनिंग यानी समाधान के लिए सिर्फ़ छह महीने दिए गए हैं, इसलिए बैंकों को इन एनपीए को घाटे के रूप में दिखाना ही होगा. इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि बैंकों का ये कर्ज़ डूब गया है और अब वसूल नहीं होगा."
क्या होती है कर्ज़माफ़ी?
अगर कोई व्यक्ति बैंकों से लिया गया लोन नहीं चुका पाता है. और, लोन चुका पाने में असक्षम होता है. तो, ऐसे लोगों के ऋण सरकार की ओर से माफ कर दिया जाता है. लेकिन, इस कर्ज़माफ़ी (Waive Off) के दायरे में सभी लोग नहीं आते हैं. इस तरह की कर्ज़माफ़ी आमतौर पर किसानों की की जाती है. वो भी चुनावों से पहले बाकायदा इसके लिए घोषणा की जाती है.
आसान शब्दों में कहा जाए, तो किसानों को खराब फसल, बेमौसम बरसात या सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले आर्थिक संकट को खत्म करने के लिए कर्ज़माफ़ी का ऐलान किया जाता है. कर्ज़माफ़ी की इस योजना में किसी बड़ी कारोबारी कंपनी का लोन माफ़ नहीं किया जाता है.
आर्थिक मामलों के जानकार सुदीप बंद्योपाध्याय बताते हैं कि बैंक या वित्तीय संस्थान कर्ज़ को राइट ऑफ़ करने के बजाय किसी सरकारी कर्ज़माफ़ी योजना को तरजीह देंगे.
सुदीप कहते हैं, "देखा जाए तो बैंकों के लिए कर्ज़ को राइट ऑफ़ करने से बेहतर है कर्ज़माफ़ी. इसकी वजह ये है कि बैंक को कर्ज़ की अपनी पूरी रकम सरकार से वापस मिल जाती है और कर्ज़दार (अधिकतर मामलों में ग़रीब किसान) को भी कर्ज़ के बोझ से मुक्ति मिल जाती है."
सुदीप कहते हैं, "अगर सरकार कहती है कि वो किसानों का 1000 रुपये माफ़ कर रही है तो इसका मतलब ये है कि बैंक को ये 1000 रुपये सरकार को देने होंगे, जबकि राइट ऑफ़ प्रक्रिया में बैंकों को बैड लोन की प्रोविजनिंग करनी होती है और ज़ाहिर है इससे उनके मुनाफ़े पर असर पड़ता है."
राइटऑफ़ और वेवऑफ़ की कहानी में ज़्यादातर आंकड़ों की बाज़ीगरी है.
शायद इसीलिए कहा जाता है... आंकड़े झूठ नहीं बोलते, लेकिन वो हमेशा पूरा सच भी बयाँ नहीं करते.
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