ममता ने बंगाल में 'आफत' में कैसे खोज लिया अवसर? भाजपा की करारी हार की 5 बड़ी वजहें
Bengal BJP loss reason in Hindi: पश्चिम बंगाल में इस बार लोकसभा चुनावों के जो परिणाम आए हैं, उसका अंदाजा 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी के चुनाव रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर भी नहीं लगा पाए। मतगणना से पहले उनको भी लग रहा था कि इस बार भाजपा वहां 'खेला' कर सकती है!
लेकिन, 4 जून, 2024 को पश्चिम बंगाल के जो चुनाव परिणाम आए तो टीएमसी की न सिर्फ सीटें 22 से बढ़कर 29 हो गईं, बल्कि उसका वोट शेयर भी 43.7% से बढ़कर 45.76% हो गया। वहीं, बीजेपी की सीटें सिर्फ 18 से घटकर 12 ही नहीं रह गई, बल्कि वोट शेयर भी 40.6% से कम होकर 38.73% रह गया है।

पिछली बार जीती हुई सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन फीका
अगर बंगाल के क्षेत्रवार नतीजों का मोटे तौर पर विश्लेषण करें तो इस चुनाव में आए परिणाम की एक झलक मिल सकती है। जैसे झारग्राम, बांकुरा, बिष्णपुर और पुरुलिया आदिवासी-बहुल सीटें हैं। 2019 में ये सारी बीजेपी को मिली थी। इस बार झारग्राम और बांकुरा पर टीएमसी ने कब्जा कर लिया है और बिष्णुपुर के साथ ही पुरुलिया में भाजपा की जीत का अंतर पिछली बार के मुकाबले बहुत ही घट गया है।
सीएए ने भाजपा से ज्यादा टीएमसी को फायदा पहुंचाया
इसी तरह से उत्तर बंगाल की 8 लोकसभा सीटों में से बीजेपी पिछली बार 7 जीत गई थी। लेकिन, इस बार टीएमसी पार्टी के गढ़ में ही हल्ला बोलने में सफल हो गई है। यहां कूचबिहार में केंद्रीय गृहराज्य निसिथ प्रमाणिक चुनाव हार गए हैं। जबकि, लग रहा था कि सीएए लागू होने की वजह से कम से कम मतुआ और राजबंशी बेल्ट में तो भाजपा जरूर और भी ज्यादा मजूबत होगी।
इसी तरह से बीजेपी आसनसोल, बर्दमान-दुर्गापुर, हुगली, मेदिनीपुर और बैरकपुर जैसी पिछली बार जीती हुई सारी सीटें हार गई है। बर्दमान-दुर्गापुर में तो पार्टी के दिग्गज और प्रदेश में भाजपा को बुलंदियों पर पहुंचाने वाले दिलीप घोष भी टीएमसी के बाहरी उम्मीदवार कीर्ति आजाद से चुनाव हार गए।
बंगाल में क्यों हारी बीजेपी?
वनइंडिया ने बंगाल के इस बार के चुनाव परिणाम को लेकर कोलकाता में वरिष्ठ पत्रकार जॉयदीप दासगुप्ता से खास बात की है। उन्होंने वहां की जमीनी हालात को लेकर हमसे जो कुछ साझा किया है, उससे प्रदेश में बीजेपी की नाकाम रणनीति और ममता बनर्जी की चुनावी बाजीगरी के बारे बहुत कुछ पता चल सकता है।
भाजपा का नरेटिव उलटा पड़ा, टीएमसी का काम कर गया
जॉयदीप का कहना है कि 'तृणमूल चीफ मतदाताओं को यह समझाने में सफल हुई हैं कि बंगाली अस्मिता की रक्षा वही करेंगी, चाहे करप्शन कितना भी बड़ा मुद्दा क्यों न हो? उन्होंने बीजेपी और मोदी को पूरी तरह से बाहरी के रूप में स्थापित कर दिया।' उनका कहना है कि 'बीजेपी का नरेटिव उलटा पड़ा और ममता का नरेटिव लोगों को समझा दिया गया।'
टीएमसी और ममता-विरोधी वोट बंट गया और ममता का एजेंडा चल गया
बंगाल में ममता बनर्जी ने इस बार बहुत ही सूझबूझ के साथ अपनी रणनीति बनाई थी। दासगुप्ता का कहना है कि ममता ने इंडिया ब्लॉक में रहकर भी कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट को खुद से दूर रखा। इसका परिणाम ये हुआ कि पिछली बार उनकी सरकार के खिलाफ जो एंटी-इंकंबेंसी वोट बीजेपी के पक्ष में चले गए थे, इस बार वह भाजपा और कांग्रेस-लेफ्ट में बंट गया।
यही नहीं, उन्होंने सीएए और आरक्षण के मुद्दे पर लोगों को जो-जो समझाया लोगों ने उसपर आंख मूंदकर यकीन किया। जैसे-सीएए का आवेदन करने से उन्हें मिलने वाली सारी सुविधाएं खत्म हो सकती हैं। ओबीसी सर्टिफिकेट पर हाई कोर्ट के फैसले को भी वह बीजेपी पर थोपने में सफल रहीं। इस तरह से उन्होंने मुस्लिम वोटरों को पूरी तरह से टीएमसी के पक्ष में गोलबंद कर लिया।
संदेशखाली मुद्दे को भुनाने में भी नाकाम रही बीजेपी
इस बार संदेशखाली में महिलाओं के साथ टीएमसी नेता के अत्याचार और यौन उत्पीड़न के मामले पर खूब बवाल हुआ। लेकिन, एक स्टिंग ऑपरेशन ने ममता बनर्जी का काम आसान कर दिया। वह वोटरों को यह समझाने में सफल रहीं कि जितने भी आरोप लगाए गए हैं, वह साजिश का हिस्सा हैं। नतीजा ये हुआ कि बीजेपी ने जिस पीड़ित महिला रेखा पात्रा को बशीरहाट से टिकट दिया, वो भी चुनाव हार गईं।
लक्ष्मी भंडार योजना
पश्चिम बंगाल सरकार राज्य में सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1,000 रुपए और अनुसूचित जाति- जनजातियों को 1,200 रुपए देती है। महिलाओं की ज्यादा वोटिंग को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। यह टीएमसी का इतना बड़ा हथियार साबित हुआ है कि संदेशखाली के मुद्दे की खिल्ली उड़ाने में भी इसकी बहुत बड़ी भूमिका मानी जा रही है।
यही नहीं, ममता लगातार केंद्र पर आरोप लगाती रहीं कि वह मनरेगा का पैसा रोके हुए है। लेकिन, मतदाताओं पर उनकी ऐसी पकड़ है कि वह जो भी बताती गईं, उसी को लोग सच मानते चले गए। आजकल बंगाल में सोशल मीडिया पर ऐसे मीम्स बहुत वायरल हैं,जैसे- 'शिक्षा की जगह भिक्षा'।
बंगाल में बीजेपी की रणनीति पूरी तरह से फेल
बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीएमसी को घेरने के लिए जो भी हमले किए, ममता बनर्जी उसे अपने वोट में बदलने में कामयाब दिखी हैं। चाहे, सीएए का मसला हो या मुस्लिम आरक्षण का। इसके अलावा भाजपा को हराने में पार्टी की अंदरूनी लड़ाई ने बड़ी भूमिका अदा की है। उम्मीदवारों को वैसी सीटें दी गईं, जिससे वे जुड़े ही नहीं थे। प्रत्याशियों की घोषणा में भी काफी देरी की गई।
जैसे पार्टी के दिग्गज नेता अब सवाल उठा रहे हैं कि उम्मीदवारों के सीटों के आवंटन में बहुत ज्यादा लापरवाही की गई है। आरएसएस बैकग्राउंड वाले दिलीप घोष जैसे दिग्गज नेता खुद को उपेक्षित बता रहे हैं। पार्टी में टीएमसी से आए नेताओं के वर्चस्व से भी कैडरों का मनोबल गिरा हुआ है।












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