Wayanad Bypoll: कांग्रेस के गढ़ में सत्यन मोकेरी, नव्या हरिदास क्यों बन सकते हैं प्रियंका गांधी के लिए चुनौती?
Wayanad Lok Sabha Byelection: गांधी-नेहरू परिवार की एक और सदस्य प्रियंका गांधी वाड्रा ने बुधवार को औपचारिक तौर पर चुनावी राजनीति में एंट्री ले ली है। प्रियंका ने केरल की वायनाड लोकसभा सीट से कांग्रेस की ओर से नामांकन दाखिल किया है। यह सीट उनके भाई और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के इस्तीफे की वजह से खाली हुई है। लेकिन, कांग्रेस की गढ़ बन चुकी वायनाड सीट राहुल की तरह ही उनकी बहन के लिए भी आसान होगी, यह कहना फिलहाल जल्दबाजी है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस पार्टी अब केरल की वायनाड सीट को गांधी परिवार के सदस्यों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित मान चुकी है। इसलिए प्रियंका गांधी की चुनावी राजनीति की शुरुआत यहीं से करवाई जा रही है। लेकिन, लगता है कि यहां से बीजेपी ने नव्या हरिदास और सीपीआई ने सत्यन मोकेरी को टिकट देकर उनकी चुनौती बढ़ा दी है।

वायनाड भू-स्खलन के बाद हो रहे हैं उपचुनाव
पिछले लोकसभा चुनाव और 13 नवंबर को होने जा रहे वायनाड लोकसभा के उपचुनाव के बीच वायनाड में आए भयानक भू-स्खलन ने एक बहुत बड़ी लकीर खींच रखी है। इस आपदा में 400 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और उसकी खौफनाक यादें, वहां के लोगों के मन से अभी दूर नहीं हुई हैं।
वायनाड के मतदाताओं ने यहां से राहुल गांधी को भारी मतों से जिताकर बड़ी उम्मीदों के साथ संसद भेजा था, यह तथ्य भी नजरअंदाज करने लायक नहीं है।
प्रियंका की वायनाड में जीत का मतलब, गांधी परिवार से तीन सांसद!
52 वर्षीय प्रियंका गांधी के लिए इस चुनाव का मतलब है, इस जीत के साथ संसद में उनके परिवार के सदस्यों की संख्या तीन हो जाना। उनकी मां अब राज्यसभा में दाखिल हो चुकी हैं। भाई राहुल गांधी यूपी की रायबरेली सीट का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और उनकी छोड़ी हुई सीट के माध्यम से प्रियंका निचले सदन में प्रवेश करना चाह रही हैं।
35 साल से कर रही हैं चुनाव प्रचार, पहली बार अपने लिए मांग रही हैं वोट
बुधवार को नामांकन के लिए वायनाड पहुंचीं प्रियंका ने खुद कहा है,'जब मैं 17 साल की थी, तब मैंने 1989 में पहली बार मेरे पिता के लिए चुनाव प्रचार किया था। अब 35 साल हो चुके हैं, अलग-अलग चुनावों में मैंने अपनी मां के लिए, मेरे भाई के लिए और अन्य कई सहयोगियों के लिए प्रचार किया।'
गांधी परिवार का नया गढ़ बनकर उभरा है वायनाड
हालांकि, राजनीति में इनकी औपचारिक एंट्री 2019 में हुई थी, लेकिन उनके चुनाव लड़ने की अटकलें दशकों से चलती रही हैं। अलबत्ता, पहले गांधी परिवार के किसी सदस्य की चुनाव लड़ने की चर्चा होती थी तो जुबान पर सबसे पहले अमेठी और रायबरेली का नाम आता था। लेकिन, अब वायनाड भी उनके लिए बहुत ज्यादा सुरक्षित सीट बन चुकी है।
नव्या हरिदास और सत्यन मोकेरी की उम्मीदवारी ने दिलचस्प बनाया मुकाबला
पिछले लोकसभा चुनावों में वायनाड सीट पर राहुल गांधी ने सीपीआई की दिग्गज नेता एनी राजा को 3,64,422 वोटों से हराया था। तब इस सीट पर बीजेपी के के सुरेंद्रन तीसरे नंबर पर रहे थे। लेकिन, बीजेपी की नव्या हरिदास और सीपीआई के दिग्गज सत्यन मोकेरी की उम्मीदवारी से यहां का मुकाबला त्रिकोणीय ही नहीं काफी दिलचस्प हो गया है।
बीजेपी की नव्या हरिदास कौन हैं?
वायनाड सीट से भाजपा प्रत्याशी नव्या हरिदास एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, लेकिन राजनीति में वह अब एक्सीडेंटल पॉलिटिशियन के नाम से चर्चित हो चुकी हैं। राजनीति में आने से पहले सिंगापुर और नीदरलैंड में काम कर चुकीं नव्या जमीनी सियासत से शुरुआत करके यहां तक पहुंची हैं।
प्रियंका को वायनाड में एक शिक्षित नेता से मिल रहा है टक्कर!
कोझिकोड निगम में दो बार की पार्षद रह चुकीं बीजेपी प्रत्याशी इस समय केरल बीजेपी की महिला मोर्चा की प्रदेश महासचिव हैं। इंडियन एक्सप्रेस से उन्होंने कहा है कि 2015 में वह छुट्टियों में बच्चों के साथ कोझिकोड आई थीं और तभी एक्सीडेंटल पॉलिटिशियन बन गईं।
उनके मुताबिक, 'चुनाव का समय था और बीजेपी ने टिकट के लिए मुझसे संपर्क किया, क्योंकि मेरे परिवार का बैकग्राउंड संघ परिवार से जुड़ा था। निगम में मुझे सामान्य सीट से उतारा गया। रात के रात मैं उम्मीदवार बन गई थी।' फिर वह कभी विदेश नहीं लौटीं और एक के बाद एक दो चुनाव जीत गईं।
2021 के चुनाव में बीजेपी ने उन्हें कोझिकोड दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से आजमाया, जिसमें वह तीसरे नंबर पर रहीं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी से भाजपा का वोट शेयर काफी बढ़ गया। आज की तारीख में नव्या जमीन से जुड़ी नेता हैं और कांग्रेस पर आरोप लगा रही हैं कि वायनाड त्रासदी में उसने यहां के लोगों के लिए कोई खास काम नहीं किया। वो कहती हैं, 'गांधी परिवार के लिए वायनाड मात्र एक दूसरी सीट है।'
सीपीआई के सत्यन मोकेरी को भी हल्के में लेना सही नहीं है!
केरल की राजनीति में सत्यन मोकेरी किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। केरल विधानसभा में उनकी पहचान 'दहाड़ने वाले शेर' की रही है और वह लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के एक मुखर चेहरा हैं। राजनीति में उनकी शुरुआत ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) से रही है, जहां वह सचिव की भूमिका निभा चुके हैं।
मोकेरी 1987 से लेकर 2001 तक केरल की नादापुरम विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और ऑल इंडिया किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव और सीपीआई के नेशनल कंट्रोल कमीशन के सदस्य के पदों पर भी रह चुके हैं। कृषि से जुड़े विषयों में वह काफी मुखर रहे हैं और इससे जुड़े कई संगठनों के लिए भी काम कर चुके हैं।
मोकेरी को उम्मीद है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, जिसमें कांग्रेस के गांधी परिवार की सदस्य का बाजी पलटना भी असंभव नहीं है, जिसके लिए वह इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक हार का भी हवाला देते हैं।












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