विजय दिवस: हार रहा था पाकिस्तान और मिर्ची लग रही थी अमेरिका को
नई दिल्ली, 16 दिसंबर। विजय दिवस (16 दिसंबर 1971) भारत के शौर्य का प्रतीक है। इस दिन पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों ने भारत के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। इस विजय ने भारत को दुनिया में एक शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। दुनिया ने देखा कि लोकतंत्र का सच्चा संरक्षक अमेरिका या ब्रिटेन नहीं बल्कि भारत है। जब पकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में लोकतंत्र और मानवता की बर्बर हत्या कर रहा था तब अमेरिका और ब्रिटेन ने उसे एक बार भी रोकने की कोशिश नहीं की। ऐसी स्थिति में भारत ने अकेल दम पर पूर्वी पाकिस्तान में लोकतंत्र की रक्षा की।

हैरत की बात ये है कि जब पाकिस्तान हार रहा था तब तिलमिलाहट अमेरिका को हो रही थी। अमेरिका, पाकिस्तान को बचाने के लिए भारत पर युद्ध विराम के लिए दबाव बना रहा था। अमेरिकी दवाब से तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा उत्पन्न हो गया था। लेकिन भारत अमेरिकी दबाव के सामने नहीं झुका। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटा कर ही दम लिया।

युद्ध की पृष्ठभूमि
1971 के युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी। उसने 3 दिसम्बर 1971 को भारत के 11 एयरबेस पर अचानक हमला कर दिया था। हालांकि युद्ध की परिस्थितियां फरवरी 1971 में ही तैयार होने लगी थीं। पाकिस्तान में दिसम्बर 1970 में आम चुनाव हुआ था। पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में रहने वाले और अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान को बहुमत मिला था। 313 सदस्यों वाली नेशनल असेम्बली में अवामी लीग को 167 सीटें मिलीं थीं। लेकिन पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल यहिया खां और दूसरे नम्बर पर रहने वाली पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (88) के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो शेख मुजीब को सत्ता सौंपना नहीं चाहते थे। इस खींचतान में राजनीतिक संकट बढ़ता गया। आखिरकार नेशनल असेम्बली की बैठक 3 मार्च 1971 को मुकर्रर हुई। लेकिन इससे पहले 15 फरवरी को ही भुट्टे ने घोषणा कर दी कि उनका दल नवनिर्वाचित संसद की बैठक में भाग नहीं लेगा। यहिया खां को बहाना मिल गया। उन्होंने नेशनल असेम्बली को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। तब शेख मुजीब समझ गये कि सेना और इस्लामाबाद में बैठे नेता उन्हें सत्ता नहीं सौपने वाले। इसके खिलाफ उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में आंदोलन छेड़ दिया। आंदोलन शुरू में अहिसंक था। लेकिन पाकिस्तानी सेना के दमन के कारण यह हिंसक हो गया। फिर बांग्लादेश की आजादी के लिए मुक्ति वाहिनी का गठन हुआ। शरणार्थी समस्या से जूझ रहे भारत ने मुक्ति वाहिनी को सहयोग और समर्थन दिया। लेकिन इसके बाद भी भारत और पाकिस्तान के बीच प्रत्यक्ष युद्ध की शुरुआत नहीं हुई थी।

भारत पाकिस्तान में युद्ध की शुरुआत
1971 में भारत पाकिस्तान के बीच घोषित युद्ध 3 दिसम्बर 1971 से शुरू हुआ। 3 दिसम्बर की शाम करीब साढ़े पांच बजे पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने उत्तर पश्चिमी भारत के 11 एयरबेस पर अचानक हमला कर दिया। इसमें गुजरात का भुज एयरबेस भी शामिल था। (इसी विषय पर फिल्म 'भुज' बनी है)। भारत ने इस आक्रमण का बदला लेने के लिए ऑपरेशन त्रिशुल लॉन्च किया। पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना को पंगु करने के लिए एयरबेस को निशाना बनाया था ताकि उसकी पैदल सेना पश्चिम के रास्ते भारत में प्रवेश कर जाए। भारतीय सैन्य रणनीतिकारों ने पाया कि अभी पाकिस्तान का सारा ध्यान वायुसेना और पैदल सेना के मोर्चे पर लगा हुआ है। नौसेना को लेकर वह लापरवाह है। तब ऑपरेशन त्रिशुल के तहत भारत ने 4 दिसम्बर की रात पाकिस्तान के कराची नौसैनिक अड्डे पर हमला कर दिया। भारत ने पहली बार एंटी शिप मिजाइल का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के तीन जहाजों खैबर, चैलेंजर और मुहाफिज को ध्वस्त कर डूबो दिया। कराची तेल डिपो पूरी तरह तबाह हो गया। वहां ऐसी आग लगी कि सात दिनों तक बुझायी न जा सकी। भारत ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए जल, थल और नभ से एक साथ आक्रमण बोल दिया। 9 दिसम्बर तक भारतीय सेना ने चिटगांव, चांग्ला और मांग्ला बंदरगाह को पूरी तरह घेर लिया था। पूर्वी पाकिस्तान में कहीं से कोई मदद नहीं पहुंच सकती थी। पाकिस्तान की स्थिति लगातार कमजोर हो रही थी। तब पाकिस्तान ने अपने मित्र अमेरिका से मदद मांगी।

अमेरिका ने की पाकिस्तान की तरफदारी
भारत उस समय दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहा था। एक तो युद्ध के मैदान में और दूसरे संयुक्त राष्ट्र से मंच पर। अमेरिका खुल कर पाकिस्तान का पक्ष ले रहा था। अमेरिका को डर था कि अगर भारत मजबूत हुआ तो उसकी दक्षिण एशिया और पश्चिम की विदेश नीति असफल हो जाएगी। पाकिस्तान को हार की तरफ बढ़ते देख कर अमेरिका तिलमिला रहा था। 12 दिसम्बर 1971 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलायी गयी थी। अमेरिका भारत पर युद्ध विराम के लिए लगातार दबाव बनाये हुए था। वह सुरक्षा परिषद की बैठक में दो बार युद्ध विराम के लिए प्रस्ताव ला चुका था। ऐसी विषम परिस्थिति में भारत का परम मित्र सोवियत संघ ढाल बन कर खड़ा हो गया। सोवियत संघ ने तीसरी बार वीटो का प्रयोग किया जिससे 12 दिसम्बर को लाया गया युद्ध विराम का प्रस्ताव निरस्त हो गया। अब भारत जल्द से जल्द ढाका पर कब्जा करना चाहता था ताकि अमेरिका को हस्तक्षेप का मौका न मिले। लेकिन अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन पाकिस्तान को बचाने पर तुले हुए थे।

सोवियत संघ ने भारत से मित्रता निभायी
तब अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपने सातवें जंगी बेडे को हिंद महासागर में भेज दिया। सातवां बेड़ा मल्लका जलसंधि से बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करने वाला था। तब एक फिर सोवियत संघ ने भारत से अपनी मित्रता निभायी। उसने भी अपना एक विध्वंसक युद्धपोत हिंद महासागर में भेज। सोवियत युद्धपोत सातवें बेड़े की निगरानी करता रहा। उस समय अमेरिका वियतनाम युद्ध में फंसा हुआ था। सोवियत संघ के दखल के बाद वह डर गया। एक और युद्ध की आग में वह नहीं जलना चाहता था। अमेरिका का सातवां बेड़ा चिटगांव से करीब एक हजार मील दूर समुद्र में शांत खड़ा रहा। उसके आसपास सोवियत पनडुब्बियां और युद्धपोत मंडरा रहे थे। अमेरिका चाह कर भी पाकिस्तान की मदद नहीं कर पा रहा था।

वो एयर स्ट्राइक जिसने विजय सुनिश्चित की
इस बीच 14 दिसम्बर 1971 को सेना के पूर्वी कमान की इंटेलिजेंस यूनिट ने एक बड़ी सूचना इंटरसेप्ट की। इसके जरिये मालूम हुआ कि ढाका के गवर्नर हाउस (गवर्नमेंट हाउस) में पाकिस्तान के बड़े सैन्य अफसरों की बैठक होने वाली है। तब भारतीय सेना ने योजना बनायी कि अगर गवर्नर हाउस पर हवाई हमला कर के पाकिस्तानी सैन्य अफसरों को गिरफ्त में लिया जाए तो उन पर सरेंडर करने के लिए दबाव बनाया जा सकता है। 14 दिसम्बर को 12 बजे दिन से ये बैठक शुरू होनेववाली थी। हवाई हमला के लिए भारतीय विमानों को गुवाहाटी से ढाका के लिए उड़ान भरनी थी। सिर्फ 24 मिनट में एयर स्ट्राइक को अंजाम देना था। एयर फोर्स अफसरों को गवर्नर हाउस की लोकेशन भी नहीं मालूम थी। एक पुराने नक्शे के आधार पर हवा में ही टारगेट को चिह्नित करना था।

ढाका के गवर्नर हाउस पर हमला
भारतीय जांबाजों ने बुद्धिमानी का परिचय दिया। समय रहते टारगेट की पहचान कर ली। पहले चरण के हमले में एक मिग विमान से 16 रॉकेट दागे गये। गवर्नर हाउस (गवर्नमेंट हाउस) में जैसे जलजला आ गया। पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी गिरते पड़ते जान बचाने के लिए वहां से भगाने लगे। चार मिग विमानों ने गवर्नर हाउस पर कुल 128 रॉकेट दागे। इसके बाद दो और भारतीय विमान हमला करने के लिए पहुंच गये। 45 मिनट के अंदर तीन हमले हुए। गवर्नर हाउस की मुख्य छत पूरी तरह उड़ गयी। इस हमले से पाकिस्तानी सैनिक अफसर भयभीत हो गये। पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर ए एम मलिक ने इस्तीफा कर दिया। दो दिन बाद ही (16 दिसम्बर 1971) भारत के केवल तीन हजार जांबाजों ने पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को सरेंडर के लिए मजबूर कर दिया। पाकिस्तानी सेना के सरेंडर करते ही अमेरिका का सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी से हट गया।












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