राम रहीम को 20 साल की सजा मिलने के बाद पीड़िता की तरफ से एक चिट्ठी
इस बीच पीड़िता की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार श्रुति अग्रवाल ने एक चिट्ठी लिखी है जो उसके संघर्ष की जीत को सही मायनों में अभिवयक्त करती है।
नई दिल्ली। 15 साल की लंबी लड़ाई के बाद बलात्कारी बाबा राम रहीम को आखिर 20 साल की सजा सुना दी गई। पीड़िता ने हिम्मत दिखाई और उसकी एक गुमनाम चिट्ठी ने सबसे पहले इस वहशी बाबा की पोल खोली। अब बाबा अपने पापों के लिए 20 साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहेगा। इस बीच पीड़िता की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार श्रुति अग्रवाल ने एक चिट्ठी लिखी है जो उसके संघर्ष की जीत को सही मायनों में अभिवयक्त करती है।

मैंने इन पंद्रह साल नर्क भुगता है। हर पल-हर क्षण। मैं अपनी अस्मत से खेलने वाले से लड़ रही थी। भाई खो चुकी थी, समाज दुत्कार चुका था। मैं बस लड़ रही थी। पत्थर की अहिल्या की भांति ..पाषाण बन मैं सिर्फ लड़ रही थी। सांसें क्या मैं ले रही थी, मुस्करा रही थी, नहीं। मेरी 15 साल की लड़ाई के बाद इस बलात्कारी बाबा को मिली तो केवल 20 साल की सजा...मैं तो द्रोपदी की तरह उसके खून से अपने केश धोती। तब ही अट्टाहास करती। मान-मर्दन होता, मेरी इज्जत का मर्दन करने वाले का तब मैं हंसती-मुस्कुराती।
मेरी जगह खुद को रखकर देखिए, सोचिए, समझिए। 15 साल पहले एक व्यक्ति जिसे मैंने अराध्य माना था मेरी जिंदगी का सबसे काला अध्याय लिखता है। इस अध्याय को पिताजी की माफी कहता है। मेरा मन मुझे आत्महत्या करने को उकसाता है, लेकिन मस्तिष्क इन विचारों को धिक्कारता है और मुझे कांटों पर चल इंसाफ छीनने, हक पाने के लिए उकसाता है। मैं अपने दमित हुए-कुचले मन-मस्तिष्क को जिंदा करती हूं। आत्मा में आत्मसम्मान के प्राण फूंकती हूं और लड़ने के लिए उठ खड़ी होती हूं। कुछ योद्धा मेरी ढ़ाल बनते हैं लेकिन....। संघर्ष के इन 15 सालों में मैं रोज राम-रहीम का महीमामंडन होते देखती हूं। वो खुद को हीरो बताता है। तीन फिल्में लेकर आता है, उसके भक्तों की संख्या रक्तबीज की तरह बढ़ती जा रही थी...मैं इन रक्त बीजों का रक्तपान करना चाहती थी। काली की तरह हुंकार लगाना चाहती थी....लेकिन राम-रहीम को बड़े कद्दावर नेताओं का साथ मिल रहा था। वो शक्तिशाली हो रहा था...लेकिन मैं दुर्बल नहीं हुई।
उसने हम लड़कियों को अबला माना मैं आ-बला बनी और उसके पीछे लगी रही। वो रोज अट्टाहास करता रहा, मैं रोज अपने सामर्थ्य को जमा कर मजबूत होती गई। आज सुना मैंने वो अदालत में घुटने के बल बैठा रो रहा था। रहम की भीख मांग रहा था। उसकी आंखों के सामने रामपाल और आशाराम के दुर्दिन नाच रहे होंगे। क्या आपको पता है उसे इस स्थिति में लाने के लिए मैं कभी घुटनों के बल बैठी नहीं, रोई नहीं। भाई गया तब भी नहीं...अदालत में लोगों की निगाहों ने पीछा किया तब भी नहीं। हाँ मैं रोई थी, उस दिन जिस दिन गुफा में मेरे अराध्य ने मेरे साथ अपना मुंह काला किया था। खुद को मेरी नजरों से गिराया था।
मैं गुरमीत को मिलने वाली 20 साल की सजा से खुश नहीं...उसे ताउम्र जेल की सींखचों के पीछे सड़ना था...लेकिन-लेकिन मैं खुश हूं गुरमीत को घुटनों पर बैठा देख, मैं खुश हूं गुरमीत को आंसू बहाता देख...मैं खुश हूं खुद को खुदा समझने वाले इस शख्स को भरी अदालत में नंगा देख...हाँ मैं अट्टाहास कर रही हूं....क्योंकि मेरा मुजरिम घुटनों पर बैठा है। मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हुआ...बस इतना याद रखना...मेरी लड़ाई में अंधभक्त बने मूर्खों, बाबा के लिए मौत का तांड़व करने वाले जाहिलों...आपके घर में भी बेटियां हैं। आपकी अंधभक्ति कहीं उन्हें भी अहिल्या ना बना दें और अहिल्या कब द्रोपदी बन महाभारत रच दें...आप सोच भी ना पाएंगें।












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