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वैलेंटाइन डे स्पेशल: 'मेरी पत्नी ही मेरा पहिया है'

"मैं कभी व्हील चेयर का इस्तेमाल नहीं करता, मेरी पत्नी ही मेरा पहिया है."

30 साल के अशरफ़ रज़ा और 25 साल की पिंकी आज अपना पांचवा वैलेंटाइन डे मना रहे हैं. उनकी शादी को साढ़े तीन साल हो गए हैं.

अशरफ और पिंकी की स्टोरी कोई आम लव स्टोरी नहीं है. अशरफ़ विकलांग हैं और अपने पैरों पर चल नहीं सकते. जबकि पिंकी एक सामान्य लड़की हैं और नौकरीपेशा हैं.

दोनों का धर्म भी अलग-अलग है. अशरफ़ मुस्लिम और पिंकी एक हिंदू लड़की हैं.

लेकिन दोनों के बीच शारीरिक और धार्मिक अंतर कभी नहीं आता. दोनों एक दूसरे का पूरा ख्याल रखते हैं.

पिंकी कहती हैं, "अशरफ़ की सोच और आत्मविश्वास किसी भी सामान्य लड़के से ज़्यादा है. वो मेरा सपोर्ट सिस्टम हैं. मैं कई बार कमज़ोर हो जाती हूं, लेकिन वो मेरा आत्मबल बढ़ाते हैं."

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अशरफ रज़ा
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अशरफ रज़ा

वहीं पीएचडी कर रहे अशरफ़ कहते हैं, "मैंने हमेशा सोचा कि भले ही पैरों से मैं फीज़िकली चैलेंज्ड हूं लेकिन दिमाग से नहीं."

दिल्ली में 10X10 के इनके आशियाने में कोई धार्मिक प्रतीक नज़र नहीं आता. उनका मानना है कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है.

पिंकी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "हम दोनों के बीच कभी हिंदू-मुस्लिम धर्म की बात नहीं आती. इन्हें जो सही लगता है ये वो करते हैं, मुझे जो सही लगता है वो मैं करती हूं. कोई किसी पर धर्म के नाम पर दबाव नहीं बनाता. हम दोनों एक दूसरे के त्यौहार मिलकर मनाते हैं. मैं इनके रोज़े रखती हूं और ये मेरे त्यौहार अच्छे से मनाते हैं."

वैलेंटाइन डे की तैयारी

बचपन का प्यार

अशरफ़ और पिंकी का रिश्ता भले ही पांच साल का है, लेकिन दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए प्यार बचपन से था.

बिहार के रहने वाले अशरफ़ के अंकल-आंटी पिंकी के पड़ोसी थे. अशरफ़ अक्सर अपने अंकल-आंटी के यहां आते जाते रहते थे. अशरफ़ उस वक्त ग्रेजुएशन कर रहे थे और पिंकी छठी क्लास में पढ़ती थीं.

दोनों की मुलाकात हुई और दोनों अच्छे दोस्त बन गए.

पिंकी बताती हैं, "एक दिन इन्होंने अपना फ़ोन नंबर दिया और हंसते हुए कहा कि मेरा नंबर रख लो, एक दिन जब मैं बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा और तब तुम्हें मेरा नंबर लेने के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ेगा."

फिर दोनों के बीच रोज़ाना बात होने लगी और दोनों एक दूसरे से अपनी सारी बाते साझा करने लगे. ये दोस्ती कब प्यार में बदल गई दोनों को पता ही नहीं चला.

अशरफ कहते हैं, "मुझे पिंकी की सोच अच्छी लगती थी. इसका भी मेरी तरह धर्म के प्रति ज्यादा झुकाव नहीं था. मुझे लगा कि हम दोनों कि सोच मिलती है इसलिए हम भविष्य साथ बिता सकते हैं."

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अशरफ रज़ा
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अशरफ रज़ा

स्कूटी पर प्यार का सफ़र

शुरू में पिंकी के सामने कुछ दुविधाएं थीं. उन्हें लगता था कि जब वो साथ चलते हैं तो लोग उन्हें अजीब तरह से देखते हैं.

वो कहती हैं, "मुझे साथ चलने में अजीब लगता था. जब हम साथ चलते थे तो लोग हमें देखते थे. तब मैंने इन्हें स्कूटी लेने को कहा. इनके स्कूटी लेने के बाद हम आसानी से मिल पाते थे.''

''अगर कोई हमें अजीब तरह से देखता था तो हम वहां से हट जाते थे. स्कूटी का एक और फ़ायदा था, बात करते वक्त मैं खड़ी रहती थी और ये स्कूटी पर बैठ कर आराम से बात कर पाते थे. हम मिलने लगे और मेरे मन के सारे डर खत्म होते गए."

जब घर वालों को पता चला

पिंकी के घर वालों ने उनकी शादी के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया था, लेकिन पिंकी फैसला कर चुकी थीं कि अगर शादी करेंगी तो सिर्फ अशरफ से ही नहीं तो नहीं करेंगी.

इसके बाद दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली.

पिंकी कहती हैं, "शादी के दो-तीन महीने बाद घर वाले मान गए. अब रिश्ते नॉर्मल हैं और दोनों के ही घर वाले एक दूसरे के यहां आते जाते हैं."

इतने में ही अशरफ़ कहते हैं कि हम दिल्ली में रहते हैं इसलिए शादी करना आसान था. इस तरह की शादी को गांव में शायद स्वीकार नहीं किया जाता.

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अशरफ रज़ा
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अशरफ रज़ा

धर्म से बड़ी है इंसानियत

अशरफ़ और पिंकी इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं.

अशरफ कहते हैं, "जहां प्यार है, मोहब्बत है वहीं सब कुछ है. वहीं इबादत भी है. धर्म, मज़हब, जाति या ऑनर के नाम पर कुछ भी करना ग़लत है."

इतने में पिंकी कहती हैं कि धर्म के नाम पर सिर्फ बहस, लड़ाई या माहौल ख़राब किया जा सकता है. अगर आप में इंसानियत है तो आप अच्छे पड़ोसी, अच्छे दोस्त, बहुत अच्छे पति-पत्नी या कुछ भी अच्छा रिश्ता बना सकते हो.

दोनों अपने खुशहाल जीवन की वजह आपसी तालमेल को बताते हैं. वे कहते हैं,

"हमारे लिए प्यार का मतलब 'आपसी समझ' और धर्म का मतलब 'इंसानियत' है."

ख़ुद से प्यार करना तो नहीं भूल गए?

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