Uttarakhand: क्या ममता बनर्जी के कारण बीजपी ने लिया तीरथ सिंह रावत से इस्तीफा ? जानिए
नई दिल्ली, 6 जुलाई: भाजपा के विरोधियों का दावा है कि पार्टी ने उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का इस्तीफा आनन-फानन में इसलिए लिया, क्योंकि वह ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहने देना चाहती। सुनने में अजीब लगता है कि उत्तराखंड के सीएम बदलने से बंगाल में तीसरी बार दो-तिहाई बहुमत से विधानसभा चुनाव में जीतकर आई तृणमूल की नेता के मुख्यमंत्री बने रहने से क्या लेना-देना है। आइए समझते हैं कि इन आरोपों में कितना दम है ? और सही संवैधानिक स्थिति क्या है?

तीरथ के इस्तीफे का ममता कनेक्शन ?
पिछले हफ्ते दिल्ली में जब उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत भाजपा के नेताओं से मिलने के बाद अपने इस्तीफे का ऐलान किया, तो उन्होंने यही कहा कि वह प्रदेश में 'संवैधानिक संकट' को टालने के लिए ऐसा कर रहे हैं। क्योंकि, उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने में अब एक साल से भी कम बचे हैं, ऐसे में 'नियमानुसार' वहां उपचुनाव नहीं करवाए जा सकते। अब विपक्ष के नेताओं का दावा है कि यह भाजपा का एक राजनीतिक हथकंडा है, ताकि बंगाल में ममता बनर्जी को सीएम की कुर्सी से हटाया जा सके। मसलन, कांग्रेस एमएलए और उत्तराखंड विधानसभा में विपक्ष के उपनेता करण माहरा का आरोप है कि तीरथ सिंह को 'बलि का बकरा' बनाया गया, ताकि 'यह सुनिश्चित हो जाए कि ममता न चुनी जाएं।' उनका कहना है कि 'निशाना रावत नहीं......ममता बनर्जी हैं।' उन्होंने रेडिफ डॉट कॉम से ये बात कही है।
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तीरथ सिंह रावत ने गंवाया चुनाव का मौका ?
उत्तराखंड कांग्रेस के उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना दो कदम आगे बढ़कर आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि बीजेपी निश्चित कर चुकी है कि 'उत्तराखंड में उपचुनाव न होने दे, जिससे कि ममता बनर्जी के उपचुनाव को रोकने के लिए चुनाव आयोग पर दबाव डाल सके।' उत्तराखंड में दो विधानसभा सीट खाली है- कुमाऊं में हलद्वानी और गढ़वाल में गंगोत्री। अपनs मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए रावत को 6 महीने के अंदर उपचुनाव जीतकर आने का मौका था। वो अभी लोकसभा के सांसद हैं। यह भी सही है कि जब भाजपा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह उन्हें बागडोर सौंपी तब उसे उनके 6 महीने के अंदर विधानसभा में पहुंचने के विषय में भी सोच लेना चाहिए था। लेकिन, पार्टी इसके लिए कोरोना महामारी पर ठीकरा फोड़ना चाहती है। जो भी हो उसे इस नाम पर 6 महीने के अंदर तीसरी बार मुख्यमंत्री बदलना पड़ा है। लेकिन, जहां तक विपक्ष के आरोपों का सवाल है तो उसमें तथ्य से ज्यादा राजनीति नजर आ रही है।

संवैधानिक संकट की बात पहले कांग्रेस ने ही उठाई थी
उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत के सीएम रहते संवैधानिक संकट आने वाला है, यह चर्चा सबसे पहले कांग्रेस ने ही शुरू की थी। पिछले 20 जून को पार्टी ने ही कहा था कि विधानसभा चुनाव में एक साल बाकी है, इसलिए तीरथ सिंह रावत उपचुनाव नहीं लड़ पाएंगे। कांग्रेस नेता और प्रदेश के पूर्व मंत्री नवप्रभात ने तब सबसे पहले संवैधानिक संकट की बात उठाते हुए दावा किया था, 'उत्तराखंड में एक संवैधानिक संकट निश्चित लग रहा है। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत एमएलए नहीं हैं। इस पद पर बने रहने के लिए उन्हें 6 महीने के अंदर विधानसभा का चुनाव जीत कर आना है, जो कि 9 सितंबर को पूरा हो रहा है। लेकिन, जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 151ए के तहत अगर आम चुनाव होने में यदि सिर्फ एक साल बाकी है तो उपचुनाव नहीं करवाए जा सकते।' गौरतलब है कि राज्य विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मार्च, 2022 में खत्म हो रहा है।

ममता और तीरथ सिंह रावत की स्थिति अलग है
इस मामले में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत का कहना है कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 स्पष्ट करता है कि यदि किसी सीट का कार्यकाल एक साल से ज्यादा बचा हुआ है तो चुनाव आयोग को उपचुनाव करवाना होगा। 'वो इस कानून से बच नहीं सकते।' यानी तीरथ सिंह रावत के मामले में कांग्रेस नेता नवप्रभावत का दावा बिल्कुल सटीक था और रावत ने भी उसी का हवाला देकर इस्तीफा दिया है। जबकि, ममता के बारे में रावत का कहना है कि, 'ममता बनर्जी के मामले में उन्हें शपथग्रहण से 6 महीने के भीतर चुनाव जीतकर आना है। इस हिसाब से उनके पास 5 नवबंर तक चुनाव जीतने का वक्त है।' उन्होंने यह भी कहा है कि '6 महीने के अंदर ही चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग बाध्य नहीं है। अगर कोरोना से हालात बिगड़े तो वह इसे रोक भी सकता है।' उनका कहना है कि 'क्योंकि भारतीय चुनाव आयोग ने कहा है कि सितंबर के अंत तक वो चुनाव नहीं कराएगा, वह अक्टूबर में करवा सकता है, जिससे उनके पास पर्याप्त समय बचेगा। लेकिन, आखिरी फैसला चुनाव आयोग पर निर्भर है।' उत्तराखंड में पैदा हो रही संवैधानिक संकट पर जब वनइंडिया ने पटना हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील आदित्यनाथ झा से बात की तो उन्होंने भी कहा कि "जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 151ए के अनुसार यदि विधानसभा का कार्यकाल एक साल से कम बचा है तो उपचुनाव नहीं करवाए जा सकते।" यानी तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे को ममता बनर्जी से जोड़ना सियासी ज्यादा है और इसका कानून से कोई लेना-देना नहीं लग रहा है।
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