धुल गए दागियों के दाग, सजा के बावजूद नहीं जाएंगी कुर्सी, कैबिनेट की मंजूरी
नयी दिल्ली। राजनीति बिना दाग ने नहीं की जा सकती है। सियासी दांव-पेंच में आरोप तो लगते ही है। कई बार आरोपों की गंभीरता ज्यादा होती है। हमारे सियासी मैदान में कई ऐसे खिलाड़ी है जो किसी ना किसी आरोपों के घेरे में है। दागी नेताओं की तादात हर पार्टी में अौसतन ज्यादा ही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कि दोषी नेता चुनाव नहीं लड़ पाएंगे या फिर उनकी कुर्सी छिन जाएंगी सरकार से बर्दाश्त नहीं हो रहा था। इसलिए कैबिनेट ने एक अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही पलट दिया।
दागी नेताओं की सदस्यता पर अब कोई आंच नहीं आएगी। दागियों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रही यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया है। सरकार ने अध्यादेश लाकर दोषी करार सांसदों-विधायकों को कानूनी कवच दे दिया।

कैबिनेट के इस फैसले से ना केवल अब सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों को चुनाव लड़ने का अधिकार मिल जाएंगा , बल्कि उनकी सदस्यता भी बनी रहेगी। कैबिनेट द्वारा मंजूर की गई अध्यादेश के मुताबिक दोषी सांसदों-विधायकों को अंतिम फैसला आने तक वेतन-भत्ता हासिल करने और सदन में मतदान करने का अधिकार नहीं होगा।
कैबिनेट के इस फैसले पर एक सवाल सबके मन में उठ रहा है कि यूपीए सरकार ने ये अध्यादेश लाने का फैसला तब किया है जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राज्यसभा सांसद रशीद मसूद और यूपीए के सहयोगी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की सदस्यता पर खतरा मंडरा रहा है।
कैबिनेट के इस आदेश के मुताबिक निचली अदालत से सजा होने के 90 दिनों के अंदर अगर ऊपरी अदालत मामले की सुनवाई की अपील स्वीकार कर लेती है तो ऐसी स्थिति में दागियों की सदस्यता बरकरार रहेगी। साथ ही अगर उन्हें उच्च अदालतों से अगर सजा मिलती है तो उनकी सदस्यता पर खतरा मंडरा सकता है।












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