त्रिपुरा में वामपंथ का किला फ़तह कर पाएंगे मोदी?
त्रिपुरा में चुनाव बाद हुए सर्वेक्षणों में अनुमान लगाया जा रहा है कि इस राज्य में वामपंथ का किला ढह रहा है और बीजेपी गठबंधन यहां सरकार बनाने जा रही है.
हालांकि अतीत में हुए ऐसे सर्वेक्षणों के हश्र को देखते हुए इन पर ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता है.
जिस तरह से एग्ज़िट पोल में ये कहा जा रहा है कि बीजेपी सबका सफ़ाया कर देगी, अगर ऐसा नहीं हुआ तो इस बार एग्ज़िट पोल का ही सफाया कर देना चाहिए.
वैसे त्रिपुरा में कांटे की टक्कर के आसार हैं. त्रिपुरा में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत राज्य में आईपीएफ़टी से उनका चुनावी गठबंधन है.
ये पार्टी त्रिपुरा के जनजातीय लोगों का प्रतिनिधित्व करती है. आईपीएफ़टी त्रिपुरा का बंटवारा कर जनजातीय लोगों के लिए अलग राज्य की मांग करती रही है.
बीजेपी-आईपीएफ़टी गठबंधन
बीजेपी आईपीएफ़टी के एजेंडे पर कुछ नहीं कहती है. त्रिपुरा विधानसभा में 20 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं.
उम्मीद की जा रही है कि बीजेपी और आईपीएफ़टी का गठबंधन इन 20 सीटों पर अच्छे नतीज़े दे सकता है.
इन 20 सीटों में आईपीएफ़टी नौ सीटों पर और बीजेपी 11 सीटों चुनाव लड़ी है.
ये माना जा रहा है कि अगर 20 सीटों में बीजेपी-आईपीएफ़टी गठबंधन 15-16 सीटें जीत ले और 10-12 सीटें दूसरे इलाकों से मिल जाएं तो त्रिपुरा का सियासी समीकरण बदल सकत है.
सीपीएम के ख़िलाफ़
आईपीएफ़टी त्रिपुरा के बंटवारे और बंगालियों को निकाले जाने की बात करती है.
बीजेपी के आईपीएफ़टी से गठबंधन का शहरों में शायद उतना असर न हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बंगालियों को जनजातीय लोगों के हमले झेलने पड़ते हैं.
ग्रामीण इलाके के बंगालियों को अगर ये लगने लगा कि बीजेपी ने उस पार्टी के साथ गठबंधन किया जो उनपर हमले करती रही है, जो अलग त्रिपुरालैंड की मांग करती हैं और उन्हें त्रिपुरा से निकालने की धमकी देती है तो फिर, शायद इन बंगालियों का वोट केवल इसी एक फ़ैक्टर पर वाम मोर्चे के साथ जा सकता है. सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण होने की भी संभावना जताई जा रही है.
सत्ता विरोधी रुझान
लेकिन लोग कह रहे हैं कि शहरी क्षेत्रों में तस्वीर अलग है, वहां सीपीएम के ख़िलाफ़ सत्ताविरोधी रुझान देखा जा रहा है क्योंकि विकास के एजेंडे पर सीपीएम कमज़ोर रही है.
बुनियादी ढांचे के मामले में त्रिपुरा में काम हुआ है, लेकिन जॉब क्रिएट नहीं हो पाई, चेन्नई और बंबई के बाद त्रिपुरा आईटी गेटवे बन तो गया, लेकिन इसके बावजूद वहां आईटी इंडस्ट्री खड़ी नहीं हो पाई.
ये वो मुद्दे हैं जो माणिक सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी रुझान को मजबूती देते हैं.
त्रिपुरा में कांटे की टक्कर की संभावना इसलिए भी है कि बीजेपी-आईपीएफ़टी गठबंधन ग्रामीण इलाकों की 20 सीटों में 15-16 सीटें और शहरी इलाकों की 15-20 सीटों में आधी भी जीत लेगी तो वाम मोर्चे के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है.
सर्वेक्षण के अनुमान
ये शायद होने वाला भी है. लेकिन ये कहना कि त्रिपुरा से वाममोर्चे का पूरी तरह से सफ़ाया हो जाएगा, इस समय दूर की कौड़ी लगता है.
ये सही है उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों की तुलना में नगालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों में एग्ज़िट पोल्स के सही होने की संभावना ज़्यादा रहती है क्योंकि छोटे राज्यों में छोटे सैंपल्स से भी सही रुझान बताए जा सकते हैं.
लेकिन एग्ज़िट पोल करने वाली एजेंसियां के काम करने का तरीका शहरी और ग्रामीण इलाकों को लेकर भेदभाव वाला होता है.
इसलिए इस बात की संभावना है कि सर्वेक्षणों में त्रिपुरा के ग्रामीण इलाकों के बंगाली लोगों की राय को दरकिनार कर दिया गया हो.
माणिर सरकार कहां चूक रहे हैं
त्रिपुरा मुख्य रूप से एक बंगाली बहुल राज्य है. यहां 72 फ़ीसदी आबादी बंगालियों की है. लेकिन इसके बावजूद त्रिपुरा पश्चिम बंगाल से अलग है.
त्रिपुरा में बंगालियों का बहुमत होने के बावजूद ये एक जनजातीय राज्य रहा है जहां आज बंगालियों का दबदबा है. त्रिपुरा में जनजातीयों का मुद्दा हमेशा से एक फ़ैक्टर रहा है.
राज्य की एक तिहाई सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 28 फ़ीसदी जनजातीय आबादी है. मुझे लगता है कि राज्य में तीन चीज़ें सीपीएम के ख़िलाफ़ गई हैं.
पहला ये कि माणिक सरकार जॉब क्रिएशन में नाकाम रहे. दूसरा, वे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं कर पाए.
और तीसरा, त्रिपुरा की नौजवान पीढ़ी को ये लगता है कि माणिक सरकार को स्मार्टफोन तक इस्तेमाल करना नहीं आता और उन्होंने राज्य की आईटी की संभावनाओं को महत्व ही नहीं दिया.
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