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त्रिपुरा: बीजेपी के जश्न में गठबंधन के 'काले बादल'

त्रिपुरा: बीजेपी के जश्न में गठबंधन के 'काले बादल'

त्रिपुरा में वामपंथ का 25 साल पुराना किला ढहाने का जश्न भारतीय जनता पार्टी के खेमों में मनाया जा रहा है.

8 मार्च को बिप्लब देब के शपथ ग्रहण की तैयारियां चल रही हैं. लेकिन भाजपा के उत्साह में अब ग्रहण के आसार नज़र आ रहे हैं.

पार्टी के सूत्रों का कहना है कि 8 मार्च को शपथ ग्रहण पूरा हो पाएगा या नहीं, इस पर अभी असमंजस बना हुआ है.

भाजपा के इन मंसूबों पर पानी फेरने का काम क्षेत्रीय दल इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) कर रही है. आईपीएफटी ने भारतीय जनता पार्टी के आलाकमान को अपनी मांगों से चौंका दिया है.

आईपीएफटी के नेता ने सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी के सीएम होने की दावेदारी पेश की है.

ऐसे में अचानक जश्न में डूबी भाजपा को आईपीएफटी की इस मांग से ज़ोरदार झटका लगा है.

पार्टी अब ताजा हालात के आधार पर अपनी रणनीति बनाने में जुट गई है. हालांकि संगठन के बड़े नेता इससे परेशान है और उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से इस पर फ़ैसला लेने का अनुरोध किया है.

सावधानी बरत रही है भाजपा

मगर भाजपा के बड़े कार्यकर्ताओं से बात करने पर पता चला कि शपथ ग्रहण समारोह पर ग्रहण लग चुका है. हालांकि भाजपा इस पर बहुत ही सावधान बरत रही है.

त्रिपुरा में पार्टी के प्रभारी इस बीबीसी से कहते हैं कि शपथ ग्रहण समारोह टल भी सकता है क्योकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास उस दिन समारोह में शामिल होने का समय नहीं है.

मगर राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आईपीएफटी के साथ भाजपा का गठबंधन अस्वभाविक था और चुनाव के बाद तो ऐसा होना ही था.

आईपीएफटी के अध्यक्ष एन सी देब बर्मा ने बिना भाजपा से बात किए खुद ही घोषणा कर दी कि त्रिपुरा का अगला मुख्यमंत्री आदिवासी होना चाहिए.

देब बर्मा के इस बयान से भाजपा बैकफुट पर आ गई है. हालांकि संगठन के लोग देब बर्मा को मनाने की कोशिश में लगे हुए हैं. मगर देब बर्मा अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं.

'अकेले श्रेय न ले बीजेपी'

देब बर्मा का कहना है कि भाजपा और गठबंधन को जीत सिर्फ आईपीएफटी के भरोसे मिली है और भाजपा अकेले इसका श्रय न ले.

बीबीसी संवाददाता से बात करते हुए त्रिपुरा में भाजपा के प्रभारी सुनील देवधर ने ये तो स्पष्ट कर दिया है कि आईपीएफटी की अलग त्रिपुरालैंड की मांग भाजपा बिलकुल नहीं स्वीकार नहीं है.

आगे वे कहते हैं कि देब बर्मा के बयान के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है.

जहाँ प्रदेश अध्यक्ष बिप्लब देब को भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में सामने करने का फैसला लिया है लेकिन आईएफटी को ये स्वीकार्य नहीं है.

पूरे चुनावी अभियान में आईपीएफटी ने स्पष्ट कर दिया था कि वो आदिवासियों के लिए अलग प्रदेश की मांग को लेकर चुनाव में उतरे हैं. इस मांग को चुनाव के बाद भाजपा ने ख़ारिज कर दिया है, जिसने दोनों घटक दलों के बीच मनमुटाव पैदा कर दिया है.

बीजेपी कर रही है डैमेज कंट्रोल!

हालांकि भाजपा के वरिष्ठ अधिकारी डैमेज कंट्रोल में लगे हैं.

मगर देब बर्मा के रवैये से लगता है कि आदिवासी मुख्यमंत्री के अलावा उनके संगठन को कुछ और स्वीकार्य नहीं है. ऐसे में बिप्लब देब के मुख्यमंत्री बनने पर असमंजस बन गया है. सोमवार को त्रिपुरा की सड़कों पर भाजपा के विजय जुलूस नदारद रहे जिससे साफ़ समझ आने लगा है कि दाल में कुछ काला ज़रूर है.

कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष तापस डे अगरतला में पत्रकारों से कहते हैं कि उनकी पार्टी को पहले ही लग रहा था कि भाजपा और आईपीएफटी का गठजोड़ अस्वभाविक है जो ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है.

अब निगाहें भाजपा के कोर मैनजेमेंट ग्रुप पर टिकी हैं कि वो इस समस्या का समाधान कैसे करते हैं.

हालांकि देबे बर्मा के कड़े सुर से लग रहा है कि गठबंधन में मुश्किलें आने वाली हैं. कुछ जानकारों को लगता है कि अगर देब बर्मा अपने ज़िद पर अड़े रहे तो कोई हैरानी नहीं होगी कि त्रिपुरा में फिर चुनाव करने पड़ जाएं.

हालांकि ऐसा कहना काफी जल्दबाजी होगी. क्योंकि भाजपा का ब्रिसिस मैनेजमेंट ग्रुप हर तरह से मामले को सुलटाना चाहता है. मगर वो ये भी कहता है कि आईपीएफटी की अलग राज्य की मांग स्वीकार्य नहीं है.

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