Tipu Sultan Jayanti: ताजमहल के बाद अब टीपू सुल्तान पर हो रही है राजनीति
tipu sultan, taj mahal, anant hegde, bjp, politics, टीपू सुल्तान, ताजमहल, अनंत हेगड़े
नई दिल्ली। कभी बाबर, कभी औरंगजेब; कभी शाहजहां, कभी टीपू सुल्तान...इनसे जुड़े प्रतीकों-स्मृतियों को ज़िन्दा क्यों रहने दिया जाए, इनकी जयंती क्यों मनायी जाए, इनके नामों पर सड़कें क्यों रहें, ताजमहल जैसे कब्र को, जो अपशकुन है, क्यों धरोहर माना जाए- ऐसे सवालों का उठना और उस पर प्रतिक्रियाएं जारी हैं। यह वक्त के हिसाब से कभी सुस्त और कभी तेज हो जाती है। एक मौसम चल रहा है। फ़िजां में मुग़लों और उनके स्मृति चिन्हों को उखाड़ फेंकने की ज़रूरत बतायी जा रही है क्योंकि वे 'हिन्दू विरोधी' थे, क्या सच में ये बातें सही हैं।

केन्द्रीय मंत्री न होते तो हेगड़े को क्या मिलता न्योता?
अगर अनन्त कुमार हेगड़े केन्द्रीय कौशल मंत्री नहीं होते, तो उन्हें न्योता ही क्यों दिया जाता। मंत्री हैं तो क्या उन्हें ये तय करने का अधिकार है कि कौन उन्हें न्योता दे और कौन न दे? हां, न्योते में शरीक होने या नहीं होने को लेकर उनका अधिकार कोई नहीं छीन सकता। मगर, मौन होकर वे न्योता ठुकरा भी दें तो मकसद कहां पूरा होता है! मकसद है धार्मिक आधार पर सियासत, जिसके किसी एक ध्रुव से वे खुद को जोड़े भी रखना चाहते हैं। राजनीतिक विरोधी उनके इस मकसद का खुलासा कर रहे हैं, लेकिन उनकी भी कोई क्यों सुने? वे खुद भी इसे एक ‘अवसर' के तौर पर पाकर खुश हैं और उनकी भी कोशिश इस किस्म के विवाद को हवा देते रहने की है।

‘धर्मनिरपेक्षता’ पर हमला हो गया है प्रिय विषय
यूपी में ताजमहल ‘गद्दारों का स्मारक' हो गया, तो कब्र के रूप में अपशकुन भी। करीब 400 साल बाद ताजमहल की ये ‘विशेषताएं' उन लोगों को नज़र आ रही हैं जो सत्ताधारी दल से जुड़े हैं और जिनका प्रिय विषय देश की ‘धर्मनिरपेक्षता' रही है। ये लोग धर्मनिरपेक्षता की खिल्ली उड़ाते हुए हिन्दुत्व की पैरवी करते हैं। धर्मनिरपेक्षता में खोट है, यह अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण है। उनकी मानें तो हिन्दुत्व ही धर्मनिरपेक्षता है, यही अल्पसंख्यकों के लिए जरूरी है। इसलिए जब-जब देश चुनाव मोड में आता है, मुगलों पर आक्रमण शुरू हो जाते हैं। दुर्भाग्य से यह देश एक बार फिर अगले फरवरी तक चुनाव मोड में ही रहने वाला है। इसलिए ऐसी राजनीतिक और विवादास्पद फ़िजां के लिए कमर कसकर देश खुद को तैयार कर ले, इसी में सबकी भलाई है।

सवाल सही-गलत का नहीं, मुद्दों के इस्तेमाल का है
जब से केन्द्र में एनडीए सरकार आयी है खास किस्म का मुद्दा ही चल रहा है। लव जेहाद से लोकसभा चुनाव के दौरान फ़िजां तैयार हुई थी, जिसके बाद बीफ विवाद, कब्रिस्तान-श्मशान विवाद, हिन्दुओं से जनसंख्या बढ़ाने की अपील, पाकिस्तान से संबंध रखने, नहीं रखने की बहस, 56 इंच का सीना, सर्जिकल स्ट्राइक, कश्मीरी हिन्दुओं के पुनर्वास का सवाल, आतंकवाद और इस्लाम को पर्याय बताना, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के नाम पर इस्लाम पर आरोप मढ़ना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण क्यों दी जाए..वगैर-वगैरह मसले उठते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ये मुद्दे बिल्कुल ही गलत हैं। सही-गलत अपनी जगह पर हैं। मगर, असल मसला ये है कि ये सभी मुद्दे धार्मिक उन्माद को पैदा करने के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।

केवल इतिहास का स्याह पक्ष ही क्यों देखें?
जिस दावे के साथ टीपू सुल्तान को हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाला या ऐसा नहीं करने वाला बताया जाता है, उस दावे के पीछे तर्क या आधार नये नहीं हैं। टीपू सुल्तान या उनके पिता हैदर अली का साम्राज्य हिन्दू मराठों और निज़ाम के साथ दोस्ती-दुश्मनी का इतिहास रहा है। अंग्रेजों की नज़र में ताकतवर टीपू सुल्तान सबसे बड़ा शत्रु था, तो उनसे निपटने के लिए उन्होंने निजाम और मराठे दोनों को पटाया। जब ताकतवर हो गये, तो टीपू सुल्तान को नेस्तनाबूत कर दिया। इसके उलट अंतिम रूप से पराजित होने से पहले टीपू सुल्तान ने न मराठों को बख्शा, न निज़ाम और दूसरे राजाओं को। पराजित सैनिकों का धर्मपरिवर्तन कराने, पराजित समुदाय की कन्याओं से मुस्लिम युवकों का विवाह कराने जैसे उदाहरण भी मिलते हैं। इसे पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। हर घटना का स्याह पक्ष होता है। केवल स्याह पक्ष को याद कर अगर उस घटना के सबूत ही मिटा दिए जाएंगे, तो गौरव के सबूत भी क्या बचेंगे या बच पाएंगे?- सबसे बड़ा सवाल यही है।

अंग्रेजों को हम धार्मिक चश्मे से नहीं देखते
अंग्रेजों को ईसाई के रूप में देखने की आदत हमने नहीं डाली है तो इसकी वजह ये है कि वर्तमान समय में ईसाईयों की संख्या इतनी नहीं है कि उनसे स्पर्धा की जाए। सच ये है कि अंग्रेजों ने अपने वर्चस्व के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाया, एक का दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया, सांप्रादियकता को मजबूत किया और सबका मकसद अपने शासन को मजबूत करना था और अपने धर्म ईसाईयत को बढ़ावा देना था। मगर, हम कभी यह मांग करते नहीं दिखते कि कनॉट प्लेस का नाम बदल दें या विक्टोरिया महल या पार्क का नाम बदल दें। हम उन्हें अंग्रेजों के अत्याचार की निशानी बताते भी नहीं सुने जाते। वजह ये है कि ऐसा करें या कहें, तो भी फर्क किसे पड़ता है? फर्क तो खुद पर ही पड़ेगा। जो मिटाना है, जो गिराना है गिरा लें। अंग्रेजों का क्या होना-जाना।

क्षुद्रबुद्धि से स्पर्धा क्या जरूरी है?
जैसे ही कोई सिरफिरा ताजमहल को अत्याचार की निशानी बताता है, उसकी क्षुद्रबुद्धि से स्पर्धा करने की होड़ लग जाती है। देश के बहुत सारे लोग खुद को मुगलों से जोड़ने लगते हैं। उनकी विरासत को अपना और केवल अपना मानने लगते हैं। बस यही भेद पैदा करना इस क्षुद्र और स्वार्थबुद्धि का मकसद होता है और दोनों ही पक्ष के लोग ऐसे विवादों की सुलगती आंच में अपनी सियासत की रोटी सेंक लेते हैं।
बिना उत्तेजित हुए उत्तेजक परिस्थितियों का सामना करना हमें अंग्रेजों से सीखना होगा। अगर हमने ये बात अंग्रेजों के जमाने में ही सीख ली होती तो, ‘फूट-डालो शासन करो' की नीति ही सफल नहीं होती। अब अंग्रेजों के जाने के बाद भी अगर हम उन्हीं उत्तेजक परिस्थितियों का सामना करने को विवश हैं तो समझिए कि अंग्रेज जरूर चले गये हैं लेकिन राज करने वालों की खासियत के रूप में अंग्रेज़ियत अभी ज़िन्दा है।












Click it and Unblock the Notifications