तेलंगाना चुनाव में रोड रोलर और चपाती रोलर की क्यों है चर्चा? जिसपर BRS को थी आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी भारत राष्ट्र समिति (BRS) की उस याचिका को सुनने से इनकार कर दिया, जिसमें उसने कुछ दलों को आवंटित की गई चुनाव चिन्हों पर आपत्ति जताई थी।
बीआरएस का चुनाव निशान 'कार' है। उसे 'युग तुलसी पार्टी' के चुनाव चिन्ह 'रोड रोलर' और एलायंस ऑफ डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स पार्टी के चुनाव निशान 'चपाती रोलर' (चकला-बेलन) को लेकर आपत्ति थी।

मतदाता काफी समझदार हैं कहकर SC ने खारिज की याचिका
अदालत में बीआरएस की दलील थी कि ईवीएम पर चिपके हुए बैलेट में ये दोनों ही चुनाव चिन्ह उसके चुनाव निशान यानी 'कार' के समान ही नजर आएंगे, जिससे वोटर उलझन में पड़ जाएंगे। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर याचिका को खारिज कर दिया कि मतदाता काफी समझदार है और वह रोड रोलर और कार में फर्क कर सकता है।
चुनाव आयोग से भी बीआरएस ने की थी शिकायत
इससे पहले नवंबर 2022 में भी मुनुगोडे उपचुनाव से पहले बीआरएस ने चुनाव आयोग से इसी तरह की शिकायत की थी। सत्ताधारी दल को कुछ नई राजनीतिक पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को आवंटित किए गए कैमरा, चकला-बेलन, टेलीविजन, रोड रोलर, जहाज, सिलाई मशीन और यहां तक कि साबुनदादी को लेकर भी चिंता थी, जो उसके मुताबिक उसके 'कार' चुनाव चिन्ह से मिलते-जुलते लगते हैं।
तेलंगाना हाई कोर्ट में भी पहुंचा था मामला
बीआरएस ने तब चुनाव आयोग को निर्देश देने के लिए तेलंगाना हाई कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन, तब हाई कोर्ट ने उपचुनाव की जारी प्रक्रिया के दौरान आयोग के कार्यों में किसी भी तरह से दखल देने से मना कर दिया था।
बीआरएस के मुताबिक कई सीटों में मिली इस वजह से हार
बीआरएस नेता रावुला श्रीधर रेड्डी के मुताबिक पार्टी के पास इस मुद्दे पर चिंतित होने की वजहें हैं। उन्होंने कहा, 'वोटरों के बीच भ्रम की वजह से हमने पहले कई चुनाव क्षेत्रों में वोट गंवाए हैं....'। पार्टी का कहना है कि इस वजह से पहले उसके कम से कम 4 उम्मीदवार या तो हार चुके हैं या फिर उनकी जीत का अंतर बहुत कम रहा है।
वोटरों की उलझन ने हराया-बीआरएस
बीआरएस नेता इसके लिए 2014 के लोकसभा चुनावों में नगरकुरनूल लोकसभा सीट से पार्टी उम्मीदवार मंदा जगन्नाधम की हार का उदाहरण देते हैं। पार्टी की दलील है कि एक निर्दलीय उम्मीदवार को ऑटो-रिक्शा चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया था, जिसे 50,000 से ज्याद वोट मिले। पार्टी के मुताबिक यह वोटरों के कंफ्यूजन की वजह से ही हुआ।
पार्टी के पास एक और दलील 2020 में हुए दुब्बाका उपचुनाव का है। यहां बीजेपी 1,400 वोटों से जीती थी। जबकि, एक निर्दलीय को 3,700 से ज्यादा वोट मिले थे। उसका चुनाव चिन्ह चकला-बेलन था। यही वजह है कि भारत राष्ट्र समिति इस बार 'युग तुलसी पार्टी' को 'रोड रोलर' और एलायंस ऑफ डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स पार्टी को 'चकला-बेलन' चुनाव आवंटित होने से चिंता सता रही है।
'युग तुलसी पार्टी' की स्थापना 2016 में कोलिसेट्टी शिव कुमार ने की थी। इनका हैदराबाद के बाहरी इलाके में गौ महा क्षेत्रम नाम का एक विशाल गौशाला है। इनकी पार्टी भी मुनुगोडे उपचुनाव में उतरी थी और 1,880 वोट मिले थे। तब भी बीआरएस ने इसे रोड-रोलर दिए जाने का विरोध किया था।
वहीं एलायंस ऑफ डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स पार्टी की स्थापना इसी सार सुप्रीम कोर्ट के वकील ई शेशागिरी राव गौड़ ने की है। वे पहले आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में सरकारी वकील रह चुके हैं।












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