लक्ष्य 272 : भाजपा के लिए आसान नहीं, तो मोदी के लिए मुश्किल भी नहीं
अहमदाबाद। भारतीय जनता पार्टी ने आखिर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर ही दिया और इसके साथ ही लक्ष्य 272 का पूरा जिम्मा नरेन्द्र मोदी पर आ गया है। लोकसभा चुनाव 2014 में मोदी की लोकप्रियता भुनाने के लिए पार्टी ने लालकृष्ण आडवाणी जैसे बुजुर्ग और कद्दावर नेता की नाराजगी को नजरअंदाज भी अगर किया है, तो उसके पीछे सबसे बड़ा कारण नरेन्द्र मोदी में व्याप्त लक्ष्य 272 पूर्ण करने की संभावना ही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही आता है कि मोदी इस लक्ष्य को हासिल कैसे करेंगे? वैसे राजनीतिक विश्लेषकों और धुरंधर पण्डितों की मानें, तो मोदी और भाजपा के लिए यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं है, लेकिन नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली और चुनावी रणनीति के जानने वालों की मानें, तो मोदी के लिए यह मुश्किल भी नहीं है। जो लोग राष्ट्रीय राजनीति और चुनावी रणनीति के पुराने आँकड़ों को खंगालते हुए मोदी के लक्ष्य 272 को असंभव मानते हैं, शायद उन्हें नहीं मालूम कि मोदी ने गुजरात में तीन बार विधानसभा चुनाव अगर जीते हैं, तो उसमें मोदी की वही सर्वसमावेशी आभा का ही कमाल था, जिसमें धर्म-जाति-आरक्षण जैसी ओछी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं रहती। गुजरात में यह मोदी की आभा ही थी कि न पटेलवाद काम कर पाया और न ही अल्पसंख्यकवाद। रही बात हिन्दुत्व की, तो भी पिछले दो चुनावों में कहीं हावी नहीं था। अगर कुछ हावी था, तो वह था मोदीवाद और उनका विकासवाद तथा उसका जबर्दश्त प्रभाव।
लक्ष्य 272 यदि भाजपा के दृष्टिकोण से सोचें, एक पार्टी के दृष्टिकोण से सोचें, तो शायद आसान नहीं है, क्योंकि भाजपा के इस लक्ष्य के आड़े कांग्रेस सहित सैकड़ों विरोधी पार्टियाँ, विरोधी मत और विरोधी मुद्दे खड़े हो सकते हैं। एक पार्टी के दृष्टिकोण से भाजपा यदि गठबंधन करने की कोशिश करे, तो भी कभी उसके कथित छिपे एजेंडे या फिर विचारधारा और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों पर कई प्रकार की बाधाएँ खड़ी हो सकती हैं। इसीलिए लक्ष्य 272 भाजपा के लिए आसानी से आसान नहीं लगता।
परंतु यदि इसी लक्ष्य 272 को नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्तित्व के दृष्टिकोण से सोचें, तो यह मुश्किल नहीं लगता। सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि मोदी इस समय देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। देश की अधिकांश जनता उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है और इसमें कोई दोराय नहीं कि लोकप्रियता की यही आंधी मोदी के लिए लक्ष्य 272 की मुश्किलें धीरे-धीरे कम करती जाएगी। जिस मोदी के नाम से एनडीए के कुनबे में 24 दलों की संख्या घट कर 2 पर सिमट चुकी है, उसी मोदी के नाम पर एनडीए की सुराही छलक भी सकती है।
वैसे मोदी की फितरत एकला चलो रे... की रही है, परंतु अक्सर उनकी इस फितरत के मायने गलत निकाल लिए जाते हैं। एकला चलो रे... की यह फितरत अब भी मोदी लागू करेंगे और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मिली जिम्मेदारी को अकेले दम पर उठाएँगे। हालाँकि इस प्रकार एकला चलो रे... से तात्पर्य ये नहीं है कि वे किसी को साथ लेकर नहीं चलेंगे। निश्चित तौर पर मोदी की रणनीति एनडीओ को एक नया रूप देने की होगी और उनकी लोकप्रियता, उनकी आभा तथा उनकी कार्यशैली के नाम पर लोग जुटेंगे उनके साथ।
आइए तसवीरों के साथ देखते हैं कि आखिर कैसे पार पाड़ेगा लक्ष्य 272 :

व्यक्तिकेन्द्री चुनाव से फायदा
राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का आगमन धमाकेदार हो चुका है। लक्ष्य 272 पर यदि गौर किया जाए, तो देश में ऐसी 300 लोकसभा सीटें तो हैं ही, जहाँ भाजपा कभी न कभी जीती जरूर है। इसका मतलब है कि भाजपा का प्रभाव 300 लोकसभा सीटों पर ऑलरेडी है। अब जबकि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं, तो निश्चित रूप से यह प्रभाव बढ़ेगा ही। 1990 के दशक में भाजपा को मिली जीत का आधार अटल बिहारी वाजपेयी बनाम अन्य थे। यानी चुनावों का मुद्दा व्यक्तिकेंद्रित था। 2004 के चुनाव स्पष्ट तौर पर राज्यों के समूहों के चुनाव के तौर पर हुए। राज्यों में अलग-अलग जगह जीती पार्टियों ने मिलकर यूपीए की सरकार बनाई थी। 2009 में भाजपा के पास तो न तो नए विचार थे और न ही दमदार नेतृत्व। ऐसे में देश का सबसे ताकतवर नेता यदि व्यक्तिकेंद्रित चुनाव लड़े तो भाजपा के लिए बात बन सकती है। चूंकि सामने वाला पक्ष व्यक्तिकेंद्रित नहीं है, इस वजह से भाजपा को फायदा होने के पूरे आसार है। 2014 के चुनाव ऐतिहासिक हैं। भाजपा अभूतपूर्व वोट प्रतिशत हासिल कर सकती है।

उत्तर प्रदेश बनेगा मुकुट
देश के चार महत्वपूर्ण राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में मिलाकर 210 सीटें हैं। 2009 में भाजपा को इनमें से सिर्फ 31 सीटें ही मिली थी, लेकिन अब चूँकि मोदी मैदान में हैं और इन राज्यों में मोदी का प्रभाव भी है। स्पष्ट है कि यहाँ मोदी का करिश्मा सिर चढ़ कर बोलेगा और अगर ऐसा हुआ, तो पार्टी को यहाँ कम से कम 100 सीटें पाने से कोई नहीं रोक सकता। उत्तरप्रदेश में 80 सीटें हैं। इनमें से ज्यादातर सीटें राम जन्मभूमि आंदोलन और वाजपेयी के दौर में भाजपा का गढ़ हुआ करती थी। एक दशक के बाद भाजपा एक बार फिर यहां मजबूत दिख रही है। कार्यकर्ता उत्साहित है। मोदी ने अपने सिपहसालार अमित शाह को यहां का प्रभारी बनवाया है। पार्टी पूरा जोर लगा दे और पुराने गढ़ों को फिर हासिल करे तो न्यूनतम 45 सीटें आसानी से वह जीत सकती है।

राज भी मानें तो बन जाए बात
इसी तरह 48 सीटों वाले महाराष्ट्र में पार्टी कम से कम 20 सीटों पर जीत हासिल कर सकती है। सहयोगी दल शिवसेना और उद्धव ठाकरे के मोदी को समर्थन से भाजपा-शिवसेना गठबंधन और मजबूत होगा। एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे और राज ठाकरे। यदि नरेन्द्र मोदी राज-उद्धव को फिर से एक कर दें, तो कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को आसानी से पटखनी दी जा सकती है।

बिहार में एसिड टेस्ट
बिहार में नरेन्द्र मोदी के लिए एसिड टेस्ट होगा। यही वह राज्य है, जहाँ मोदी के नाम पर भाजपा ने सत्रह साल पुराने गठबंन को दाव पर लगा दिया। भाजपा यदि जद-यू के साथ होती तो उसकी स्थिति मजबूत रहती, लेकिन अकेले लडऩे से भी बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होगा, क्योंकि बिहार में भी मोदी की लोकप्रियता चरम पर है। इतना ही नहीं वहाँ ज्यादातर हवा यह बनी हुई है कि नीतिश कुमार ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक वोट हथियाने के गलत इरादे से ही मोदी का विरोध किया। पिछले चुनावो में भाजपा ने 15 सीटों पर चुनाव लड़कर 13 जीतें थी। एक बहुत ही कम अंतर से हारी, जबकि दो अन्य लालू प्रसाद और मीरा कुमार जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में हारी थी। अन्य गणित बताते हैं कि भाजपा अकेले दम पर कम से कम 25 सीटें इस राज्य में जीत सकती हैं।

हैदराबादी गढ़ में सरदारी सेंध
दक्षिण भारतीय राज्य आंध्रप्रदेश में भाजपा की कोई सीट गढ़ नहीं है, लेकिन तेलंगाना आंदोलन को सपोर्ट और मोदी की हैदराबाद रैली को लक्षण माना जाए तो पार्टी यहां भी कुछ न कुछ हासिल करेगी। वैसे भी जब चुनाव व्यक्तिकेन्द्री होते हैं, तो किसी एक पक्ष को फायदा होता ही है। वाजपेयी के नाम पर तो पार्टी को यहां भी फायदा हुआ था। अगर नरेन्द्र मोदी की बात की जाए, तो हैदराबाद में जिस प्रकार टिकट लेकर भी लोग मोदी की रैली में उमड़े, उससे लगता है कि यहाँ भाजपा को कम से कम एक या दो सीटें और अधिकतम पाँच सीटें तक हासिल हो सकती है। साथ ही मोदी यदि कांग्रेस विरोधी खेमे खासकर चंद्रबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी को एनडीए में शामिल करवा लेते हैं, तो फिर 42 सीटों वाले आंध्र प्रदेश में बल्ले-बल्ले हो सकती है।

गढ़ बचाना भी चुनौती
राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में भाजपा-कांग्रेस में सीधा मुकाबला है। इन राज्यों की कुल 138 सीटों में से भाजपा 120 सीटें तक हासिल कर सकती हैं। सीधी सी बात है कि इन राज्यों में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा के दो-तीन प्रतिशत वोट बढऩे का भी व्यापक असर दिखाई देगा। अगर एक-एक करके विश्लेषण करें, तो राजस्थान में हर पाँच साल में सत्ता परिवर्तन का दौर रहता आया है। यहाँ इसी साल के अंत में विधानसभा चनाव हैं और वहाँ वसुंधरा राजे सिंधिया और भाजपा के पक्ष में माहौल है। उसमें यदि मोदी का तड़का लग गया है। ऐसे में विधानसभा चुनाव तो भाजपा जीतेगी ही, साथ ही मोदी के नाम पर लोकसभा चुनाव में भी बम्बर सफलता पा सकती है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान तथा रमन सिंह की सरकारों के पक्ष में माहौल दिखता है और वहाँ भी मोदी की लोकप्रियता का तड़का काम कर सकता है, तो कर्नाटक में खोई हुई साख पाना चुनौती हो सकती है। झारखंड में उठापटक का दौर मोदी के नाम पर स्थिर हो सकता है।

नए दोस्त बनाने की कुव्वत की जरूरत
अब बात करते हैं उन राज्यों की, जहाँ मोदी को भाजपा के पुराने दोस्तों के साथ गठजोड़ को मजबूती देनी होगी। इनमें तमिलनाडु, पंजाब, ओडिशा, हरियाणा, असम और पूर्वोत्तर के सात राज्य हैं, जहाँ 118 सीटें हैं। मोदी की तमिलनाडु में जयललिता और असम में पी. संगमा के साथ अच्छी बनती है, तो ओडिशा में भी नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजेडी से गठबंधन संभव है। भाजपा इन राज्यों में 20-25 सीटें हासिल कर सकती है।

छोटों का सहारा
अब बात छोटे राज्यों की। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और गोवा के साथ ही छह केंद्रशासित प्रदेशों में पार्टी को 10 से ज्यादा सीटें मिल गई तो पार्टी आसानी से 272 का आंकड़ा पार क सकती है। इसमें भी उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा में तो भाजपा मुख्य दल है।

ममता से ममता
पश्चिम बंगाल और केरल में भाजपा का नामलेवा नहीं है, लेकिन मोदी ने जिस प्रकार पिछले दिनों कोलकाता में रैली के दौरान तृणमूल कांग्रेस की नेता व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तारीफ करते हुए वाम दलों को निशाने पर लिया था, उससे लगता है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए या यूँ कहें कि मोदी के लिए कुछ संभावनाएँ जरूर बनेंगी। ममता पहले भी एनडीए के साथ काम कर चुकी हैं। उसके बाद वे यूपीए में चली गईं, लेकिन यूपीए से उनकी दोस्ती ताजा-ताजा टूटी है और ऐसे में उनके दोबारा यूपीए से जुड़ने की संभावना कम ही है। ऐसे में पश्चिम बंगाल में ममता की ममता पाने में मोदी सफल रहे, तो वे प्रधानमंत्री पद की कुर्सी और मजबूत कर सकते हैं।












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