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Supreme Court Verdict: इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़, जानिए क्या है पूरा मामला?

Supreme Court Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (15 अप्रैल) को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर नाराज़गी जताई, जिसमें बलात्कार पीड़िता के बारे में कहा गया था कि 'उसने खुद ही मुसीबत को बुलावा दिया।' न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों को 'अत्यंत असंवेदनशील' बताया।

Supreme Court Verdict

जानिए क्या है पूरा मामला?

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार सिंह ने पिछले महीने एक बलात्कार के आरोपी को जमानत देते हुए टिप्पणी की थी कि, 'पीड़िता ने नशे की हालत में आरोपी के घर जाने की सहमति देकर खुद मुसीबत को न्योता दिया। पीड़िता एक एमए की छात्रा है और इसलिए वह अपने कृत्य की नैतिकता और गंभीरता को समझने में सक्षम थी।'

सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

वहीं हाईकोर्ट के फैसले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हाँ, जमानत दी जा सकती है... लेकिन यह कहना कि उसने खुद मुसीबत को बुलाया इस तरह की बातें न्यायाधीशों को बहुत सोच-समझकर कहनी चाहिए। एक छोटी सी टिप्पणी भी बहुत बड़ा असर डाल सकती है।'

हाईकोर्ट पर गंभीर आरोप

इस मामले को नागरिक समाज संगठन 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस' और पीड़िता की मां द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिका में यह भी बताया गया कि हाईकोर्ट ने पीड़िता की मां का नाम आदेश में उजागर कर दिया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों में ऐसा नाम प्रकाशित करने पर रोक है।

पहले भी इलाहाबाद HC के आदेश पर SC ने लगाई थी रोक

इससे पहले, 26 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अन्य आदेश पर भी रोक लगाई थी, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की छाती पकड़ना और पजामे की डोरी खींचना बलात्कार की कोशिश के दायरे में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने इसे "पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण" बताया था।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब भी मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "सामान्यतः हम इस स्तर पर रोक नहीं लगाते, लेकिन इस मामले में पैरा 21, 24 और 26 में की गई टिप्पणियाँ कानून के किसी भी सिद्धांत से मेल नहीं खातीं, इसलिए हम उन टिप्पणियों पर रोक लगाने को बाध्य हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और हाईकोर्ट में पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा है। जब तक अगला आदेश नहीं आता, हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों का उपयोग कोई भी आरोपी किसी न्यायिक कार्यवाही में राहत के लिए नहीं कर सकेगा।

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