Supreme Court में अपील- इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जब्ती और जांच मामले में गाइडलाइन तय हो, सरकार पर 25 हजार जुर्माना
Supreme Court Fines Centre : सरकार पर कानून का डंडा चला है। याचिका का जवाब दाखिल नहीं करने पर केंद्र को जुर्माना भरना होगा। Supreme Court Fines Centre the wire digital evidence case
Supreme Court Fines Centre : सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खोज और जांच एजेंसियों द्वारा जब्ती पर दिशा-निर्देश तैयार करने के मामले में सुस्ती दिखाने वाली सरकार पर सख्ती दिखाई है। केंद्र सरकार पर ₹ 25,000 का जुर्माना लगाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक शिक्षाविदों के एक समूह की याचिका के संबंध में केंद्र सरकार निर्धारित समय अवधि के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने में विफल रही। गत अगस्त में, अदालत ने सरकारी हलफनामे पर असंतोष व्यक्त किया था। देश की सबसे बड़ी अदालत ने निर्देश दिया था कि सरकार छह सप्ताह के भीतर एक और हलफनामा दाखिल करे। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को अवधि पूरी होने के बावजूद जवाब न दाखिल करने पर सरकार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का और समय दिया।

गौरतलब है कि डिजिटल समाचार माध्यम- द वायर के संपादकों की तलाशी के दौरान दिल्ली पुलिस ने हाल ही में फोन, कंप्यूटर और आईपैड के समेत कई और सामान बरामद कर जब्त किए थे। पुलिस की कार्रवाई के बाद न्यूज पोर्टल के अधिकारियों उपकरणों के "हैश वैल्यू" और क्लोन की मांग की थी। यह भी अपील की गई है कि जब्त उपकरणों की प्रतियां तटस्थ स्थान पर रखी जाएं।
फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। कोर्ट ने इसे भी पहले वाली याचिका के साथ टैग किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मौजूदा नियम डिजिटल उपकरणों को खोजने या जब्त करने के लिए पुलिस की शक्ति को विनियमित नहीं करते हैं। रेगुलेशन के अभाव में कथित रूप से संदिग्ध प्रथाओं की शुरुआत हुई है।
बता दें कि दो याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। विशेषज्ञों का विचार है कि डिजिटल उपकरणों की जब्ती की प्रक्रिया में अधिक सुरक्षा उपाय होने चाहिए। मौजूदा प्रक्रिया के बारे में बताते हुए, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के प्रमुख रह चुके नवनीत राजन वासन ने कहा कि स्टैंडअलोन डिजिटल उपकरणों को दो स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में जब्त कर लिया गया। निर्धारित कवायद के बाद सील कर दिया गया, ताकि परिवहन के दौरान उन्हें नुकसान न हो। जब्ती और सील किए जाने के बाद उपकरणों को फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में भेज दिया जाता है। इसमें जांच के उद्देश्य और विश्लेषण के लिए उपयोग की जाने वाली डिवाइस की मिरर इमेज बनाने का अनुरोध किया जाता है। नवनीत पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो के पूर्व महानिदेशक भी रह चुके हैं।
तकनीकी मामलों के जानकारों के मुताबिक मिरर इमेज स्टैंडर्ड कॉपी बनाने वाले टूल का उपयोग करके तैयार किया जाता है। डेटा के साथ छेड़छाड़ न हो, ये सुनिश्चित करने के लिए "राइट-प्रोटेक्टर" संलग्न किया जाता है। डिवाइस की कॉपी बनाने की प्रक्रिया शुरू होने से पहले, फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) डिवाइस में निहित डेटा की प्रामाणिकता साबित करने के लिए "हैश वैल्यू" पैदा किया जाता है। डिवाइस जब्त किए जाने के बाद डेटा के साथ छेड़छाड़ के किसी भी आशंका और आरोप से बचने के लिए इसे अदालत के समक्ष पेश किया जा सकता है।
रिटायर्ड अधिकारी वासन बताते हैं कि डिवाइस की सीरीज सुनिश्चित करने के लिए हर सावधानी बरती जानी चाहिए। जब तक सबूतों को जब्त करने और सील करने और FSL को ट्रांसमिशन के दौरान निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता है, तब तक डेटा के साथ छेड़छाड़ की गुंजाइश बनी रहती है। उन्होंने बताया कि डिजिटल साक्ष्य की खोज / जब्ती के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ के पास विस्तृत मानक संचालन प्रक्रियाएं ( SOP)हैं।
दी हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, "किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की जब्ती के समय, डिजिटल दस्तावेज़ का हैश मूल्य आरोपी को प्रदान नहीं किया जाता है। सबूत की प्रामाणिकता सत्यापित करने के लिए बाद में केवल अदालत को हैश मूल्य प्रदान किया जाता है। नाम न छापने का अनुरोध करते हुए इस अधिकारी ने रिपोर्ट में कहा, "अदालतें इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य स्वीकार करती हैं। पुलिस को जांच के हिस्से के रूप में इसे जब्त कर सबूत के रूप में पेश करने का अधिकार भी है। अनुसंधान अधिकारी (Investigating Officer) सबूत को संरक्षित करता है। भविष्य में इस्तेमाल के लिए केवल प्रासंगिक सूचनाएं निकाली जाती हैं।
दी वायर के मामले के संदर्भ में दी हिंदू की रिपोर्ट में एक अधिकारी ने कहा, अनुसंधान अधिकारी साक्ष्य अधिनियम के 65 बी के तहत एक प्रमाण पत्र तैयार करता है। इसके तहत सभी सामग्रियों का संरक्षण किया जाता है। चार्जशीट के हिस्से के रूप में "हैश वैल्यू" अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने कहा, "किसी भी निजी सामग्री को या तो भविष्य की जांच के उद्देश्यों के लिए संग्रहित किया जाता है या प्रोटोकॉल के अनुसार छह महीने के भीतर नष्ट कर दिया जाता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा ने कहा कि अगर डिवाइस को तुरंत सील नहीं किया जाता है तो इसका साक्ष्य मूल्य अपनी पवित्रता खो देता है। ऐसे में यह जरूरी है कि प्राथमिक साक्ष्य को नष्ट या सबूत के साथ छेड़छाड़ न की जाए। ऐसा सुनिश्चित करने के लिए एक फोरेंसिक रिपोर्ट होनी चाहिए कि कहीं कोई छेड़छाड़, संपादन, आवाज या वीडियो रिकॉर्डिंग को नष्ट तो नहीं किया गया है। उन्होंने सुझाव दिया और कहा, डिवाइस की क्लोन कॉपी तुरंत प्राप्त करना मुश्किल है, क्योंकि जिस व्यक्ति से डिवाइस जब्त किया गया है उसके मन में आशंका होती है कि छेड़छाड़ की संभावना है। ऐसे में क्लोन कॉपी तुरंत देने के लिए कदम जब्ती के समय उठाया जाना चाहिए, न कि चार्जशीट दाखिल करने के चरण में। कानून का आदेश भी ऐसा ही है।
लूथरा ने बताया कि डिजिटल सबूत एक अभियुक्त के अपराध को स्थापित करने में सबसे पक्का और सबसे अच्छा सबूत है, लेकिन इसे नष्ट करना, छेड़छाड़ करना या बदलना भी उतना ही आसान है। अगर हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि एक निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से दोषी नहीं ठहराया जाए, तो ऐसे में यह अनिवार्य है कि सबूत से छेड़छाड़ की कोई आशंका या खतरा नहीं रहे।












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