जब इंदिरा गांधी ने मिजोरम में विद्रोहियों पर कराई थी एयर स्ट्राइक
नई दिल्ली, 28 जुलाई। आज से 54 साल पहले ऐसा क्या हुआ था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय वायुसेना को मिजोरम पर बमबारी का आदेश दिया था ? भारत के इतिहास में यह पहली घटना है जब वायुसेना ने अपने ही देश के किसी भूभाग पर जोरदार हवाई हमला बोला था।

यह एक ऐसा फैसला था जिससे पूरे देश में हलचल मच गयी थी। उस समय मिजोरम असम का एक जिला था। तब असम के मुख्यमंत्री थे विमला प्रसाद चालिहा। इंदिरा गांधी की कैबिनेट में गुलजारी लाल नंदा गृहमंत्री थे। आज मिजोरम, असम के साथ हिंसक संघर्ष के कारण चर्चा में है। 1966 में मिजोरम क्यों चर्चा में आया था, इसकी भी एक रक्तरंजित कहानी है।

हवाई हमले की पृष्ठभूमि
मिजोरम पहले असम का एक जिला था। ईसाई बहुल मिजोरम के लोग असम का हिस्सा बनने से खुश नहीं थे। 1959 में मिजोरम में भयंकर अकाल पड़ा था। उस साल मिजोरम में 48 साल बाद बांस के फूल खिले थे। बांस के फूल चूहों को बेहद पसंद हैं। इसलिए उस साल मिजोरम में चूहों का आंतक ऐसा बढ़ गया कि लोगों के घर अनाज से खाली हो गये। यहां तक कि गोदाम भी खाली पड़ गये। दूसरी तरफ अकाल की विकट स्थिति का फायदा उठा कर भ्रष्ट अधिकारी और व्यापारी अनाज की कालाबजारी करने लगे। मिजोरम के लोग भूख से भुखमरी का शिकार होने लगे। तब असम सरकार के एक सेवनिवृत मुलाजिम लालडेंगा ने भुखमरी से मुक्ति दिलाने के लिए नेशनल मिजो फेमिन (अकाल) फ्रंट नामक संगठन बनाया। अकाल ने मिजो लोगों के मन में दूरी पैदा कर दी। उन्हें लगने लग कि असम या केन्द्र सरकार ने उनकी ईमानदारी से मदद नहीं की। फिर ये नेशनल मिजो फेमिन फ्रंट, मिजो नेशनल फ्रंट बन गय। धीरे धीरे मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का आंदोलन भारत विरोधी बन गया।

भारत के खिलाफ विद्रोह
1963 के आसपास एमएनएफ में अतिवादी गुट हावी हो गया। इस गुट के नेता कहने लगे कि अगर मिजोरम को भारत से आजाद करना है तो हिंसक लड़ाई लड़नी होगी। इसके लिए मिजो नेशनल आर्मी का गठन किया गया। मिजो नेशनल आर्मी को तैयार करने में तब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) मदद करने लगा। वह मिजो विद्रोहियों को ट्रेनिंग और हथियार देने लगा। (मालूम हो कि मिजोरम की एक लंबी सीमा बांग्लादेश के साथ लगती है।) विद्रोहियों को ट्रेनिंग दिलाने के लिए एमएनएफ के नेता लालडेंगा ने कई बार पूर्वी पाकिस्तान की यात्रा की। बाद में लालडेंगा और उनके सहयोगी को भारत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में असम सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। 1964 में जब इन दोनों नेताओं ने फिर ऐसा नहीं करने का लिखित आश्वासन दिया तब उन्हें रिहा कर दिया गया। लेकिन एमएनएफ अपने वायदे पर कायम नहीं रहा और दो साल बाद ही उसने भारत के खिलाफ विद्रोह कर दिया।

मिजो विद्रोहियों ने जब आजादी की घोषणा कर दी
28 फरवरी 1966 को मिजो विद्रोहियों की अलग-अलग टुकड़ियों ने आइजोल, लुंगलेई और चम्फाई स्थित असम राइफल्स के कैम्प पर हमला कर दिया। उसके अलावा उन्होंने बीएसएफ के चावंग्ते समेत करीब छह पोस्टों को भी निशाना बनाया। इस हमले के लिए असम राइफल्स और बीएसएफ के जवान तैयार नहीं थे। असम राइफल्स के जवानों ने भी जावाबी फायरिंग की। लेकिन मिजो विद्रोहियों ने छापामार रणनीति अपनाते हुए असम राइफल्स के आइजोल कैंप को चारों तरफ से घेर लिया। आधुनिक हथियारों से लैस करीब एक हजार मिजो विद्रोहियों ने तीन दिन तक घेरा डाले रखा। इसके चलते असम राइफल्स कैंप तक रशद का पहुंचना बंद हो गया। खाने पीने की जरूरी चीजों की आपूर्ति ठप हो गयी। मिजो विद्रोहियों ने 1 मार्च को मिजोरम के मुख्यालय आइजोल पर कब्जा कर लिया। एमएनएफ के नेता लालडेंगा ने 1 मार्च 1966 को मिजोरम की आजादी की घोषणा कर दी। मिजो विद्रोहियों ने एलान किया कि अब मिजोरम भारत के अवैध कब्जे से मुक्त हो गया। मिजो विद्रोहियों और भारतीय सुरक्षाबलों में भयंकर गोलीबारी होती रही। कई लाशें गिरीं।

मिजो विद्रोहियों का अत्य़ाचार
असम के मुख्यमंत्री विमला प्रसाद चालिहा ने 1 मार्च 1966 को बताया कि मिजो विद्रोहियों ने आइजोल के ट्रेजरी और लुंगलेई इलाके में हमला कर दिया है। उस समय संसद का सत्र चल रहा था। इतनी बड़ी घटना से देश में हंगामा मचना लाजिमी था। जब संसद में मामला उठा तो तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने कहा था कि आइजोल, लुंगलेई समेत छह जगहों पर मिजो अलगवादियों ने विद्रोह कर दिया है जिनकी कुल संख्या 800 से 1000 के बीच है। मिजो विद्रोहियों की घेराबंदी से भारतीय सुरक्षा बलों के जवान तीन दिन से भूखे थे। कोलासिब में करीब 250 सरकारी अधिकरियों, पुलिस कर्मियों और निर्माण कार्य में लगे लोगों को बंधक बन लिया गया था। उन्हें भी भूखा-प्यासा रखा गया था। तब केन्द्र सरकार ने सेना को हेलीकॉप्टर से रशद पहुंचाने का आदेश दिया। दो हेलीक़ॉप्टर खाने पीने की चीजें लेकर मिजोरम पहुंचे लेकिन विद्रोहियों के लगातार फायरिंग के चलते वे लैंड नहीं कर पाये। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विद्रोहियों से निबटने के लिए एयर स्ट्राइक का फैसला लिया।

हवाई हमले के बाद मुक्त हुआ था मिजोरम
4 मार्च 1966 को भारतीय वायु सेना के जेट लड़ाकू विमानों ने मिजो विद्रोहियों के टारगेट पर बमबारी शुरू कर दी। सबसे पहले आइजोल की घेराबंदी पर हमला किया गया। मिजो विद्रोहियों ने तब हमले से बचने के लिए आरोप लगाया कि बमबारी में कई नागरिक मारे गये हैं। इसके अगले दिन भारतीय लड़ाकू विमानों ने और जोरदार हमला बोला। करीब छह घंटे तक एयर स्ट्राइक जारी रही। भयंकर तबाही हुई। कई घर जमींदोज हो गये। इस हमले से मिजो विद्रोहियों के पांव उखड़ने लगे। तब मिजोरम में यह बात कही जाती थी कि भारतीय वायुसेना की बमबारी करने वाले विमानों में राजेश पायलट और सुरेश कलमाडी पायलट के रूप में तैनात थे। (बाद में दोनों कांग्रेस के नेता हुए) वायु सेना के हमले बढ़ते गये। 25 मार्च 1966 तक मिजोरम के सभी प्रमुख इलाके विद्रोहियों के कब्जे से मुक्त करा लिया गया। मिजोरम के मौजूदा मुख्यमंत्री जोरामथांगा ने एक बार कहा था कि वे इसलिए मिजो विद्रोही बने थे क्यों कि भारतीय फौज ने 1966 में मिजोरम पर बमबारी की थी।
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