चीन के जासूसी जहाज को श्रीलंका ने दी अनुमति, जानिए क्यों भारत के लिए है ये बड़ा झटका

नई दिल्ली, 14 अगस्त। पिछले कुछ समय से श्रीलंका आर्थिक संकट से गुजर रहा है। देश में खाने-पीने की चीजों से लेकर पेट्रोल-डीजल तक की भारी किल्लत देखने को मिल रही थी। यहां तक कि देश में अराजकता के बीच यहां के नेताओं ने पड़ोसी देश भारत से मदद की अपील तक की थी। जिसके बाद भारत ने हर संभव मदद का हाथ बढ़ाया। श्रीलंका को जरूरी सामान से लेकर आर्थिक मदद तक मुहैया कराई। लेकिन इन सब के बाद भी श्रीलंका ने जिस तरह से चीन की जासूसी जहाज को अपने देश में आने की अनुमति दी वह भारत के लिए एक बड़ा झटका है।

भरोसा देने के बाद पलटा चीन

भरोसा देने के बाद पलटा चीन

गौर करने वाली बात है कि श्रीलंका भारत को लगातार इस बात का भरोसा देता रहा कि वह इस विवादित जहाज को अपनी समुद्री सीमा में आने नहीं देगा। लेकिन आखिरी समय पर चीन के इस जहाज को श्रीलंका ने अपने देश में आने की अनुमति दे दी। इस मुद्दे पर दुनियाभर की नजर थी, भारत लगातार श्रीलंका पर दबाव बना रहा था कि वह इस जहाज को आने की अनुमति ना दें। वहीं दूसरी तरफ चीन भी इस जहाज को लेकर लगातार श्रीलंका पर दबाव बना रहा था।

श्रीलंका से रिश्तों में आ सकती है खटास

श्रीलंका से रिश्तों में आ सकती है खटास

श्रीलंका ने कई बार यह दावा किया कि वह चीन के इस सैन्य जहाज को अपने देश में आने नहीं देगा। लेकिन यहां दिलचस्प बात यह है कि चीन के इस जहाज ने अपना रूट कभी नहीं बदला। अब आखिरकार चीन के इस जहाज को ऐन समय पर जिस तरह से श्रीलंका ने अनुमति दी है उसके बाद भारत इसको लेकर जरूर नाराज होगा। माना जा रहा है कि इस घटना का भारत और श्रीलंका के रिश्तों पर भी काफी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

एक हफ्ते हंबनटोटा पर रहेगा चीन का जहाज

एक हफ्ते हंबनटोटा पर रहेगा चीन का जहाज

भारत का कहना है कि हम चीन के इस जहाज पर भारत का कहना है कि हम इसपर नजर बनाए रहेंगे। बता दें कि चीन का यह जहाज श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर 16 अगस्त से 22 अगस्त तक रहेगा। गौर करने वाली बात है कि जब चीन ने कहा कि उनका यूआन वैंग 5 सैन्य जहाज श्रीलंका में जाएगा, जिसका भारत ने विरोध किया। चीन के इस जहाज का श्रीलंका ने विरोध किया और कहा कि हम आपको इसकी अनुमति नहीं दे सकते हैं।

वन चायना पॉलिसी का विरोध

वन चायना पॉलिसी का विरोध

चीन ने इसके बाद लगातार श्रीलंका पर अपना दबाव बनाकर रखा और यह जहाज लगातार श्रीलंका की ओर बढ़ता रहा, जिसके बाद भारत को नजरअंदाज करके श्रीलंका ने आखिरी समय पर चीन के इस जासूसी सैन्य जहाज को अनुमति दे दी। गौर करने वाली बात है कि ताइवान को लेकर जब भी किसी देश ने कोई बयान दिया तो उसने वन चायना पॉलिसी की बात कही। चीन की वन चायना पॉलिसी के अनुसार दुनिया में एक ही चीन है वह है वन चायना, वह पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चायना, ये लोग रिपब्लिक ऑफ ताइवान को नहीं मानते हैं। जबकि भारत ने चीन की वन चायना पॉलिसी की नीति को इनकार कर दिया। वहीं अमेरिका चीन की वन चायना पॉलिसी का समर्थन करता है।

दलाई लामा की लद्दाख यात्रा

दलाई लामा की लद्दाख यात्रा

हाल ही में दलाई लामा लद्दाख की यात्रा पर गए थे। कुछ समय पहले चीन दलाई लामा को लेकर विरोध दर्ज करता रहता था उसका कहना था कि वह तिब्बत तो तोड़ना चाहते हैं। जबकि दलाई लामा चाहते हैं कि तिब्बत की पहचान बरकरार रहे। ऐसे में जिस तरह से हाल ही में दलाई लामा लद्दाख की यात्रा पर गए थे उसका चीन ने विरोध किया था। दलाई लामा को तिब्बत में यहां के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया था।

भारत की नीति में बदलाव

भारत की नीति में बदलाव

कुछ दिन पहले लिथुएनिया के दो सांसद भारत आए थे, इन लोगों ने भारत में ताइवान की वकालत की थी। इन दोनों सांसदों ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की थी। दोनों की भारत यात्रा इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन ने लिथुएनिया पर पाबंदी लगा दी थी। दरअसल हाल ही में यहां के उप मंत्री ने ताइवान का दौरा किया था। एस्टोनिया, लिथुएनिया ताइवान का समर्थन कर रहे हैं। दलाई लामा की लद्दाख यात्रा, वन चायना पॉलिसी और लिथुएनिया का साथ देना, ये तीनों ही भारत की चीन को लेकर नीति में बड़े बदलाव को दिखाते हैं।

दुनिया की नजर थी इसपर

दुनिया की नजर थी इसपर

जिस तरह से भारत चीन को लेकर अपनी कूटनीतिक रणनीति में बदलाव कर रहा है, ऐसे में दुनियाभर की नजर श्रीलंका में चीन के जासूसी जहाज पर थी। लोगों की इस बात पर नजर थी कि क्या श्रीलंका इसे अपने यहां आने से मना कर देगा, हालांकि पहले चीन ने इससे इनकार कर दिया था। लेकिन आखिरी समय पर इसकी अनुमति देकर श्रीलंका ने भारत को एक बड़ा झटका जरूर दिया है।

चीन की धमकी

चीन की धमकी

रिपोर्ट के अनुसार चीन ने श्रीलंका को बड़ी चेतावनी दी थी कि उनका यह कदम उन्हें बड़ा आर्थिक नुकसान पहुंचाएगा। श्रीलंका ने चीन से कई बिलियन डॉलर का कर्ज ले रखा है। महेंद्र राजपक्षे के समय के कार्यकाल में अलग-अलग शर्तों पर चीन से श्रीलंका से उधार लिया था, लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि कितनी सख्त शर्तों पर यह कर्ज दिया गया है। लेकिन माना जा रहा है कि यह शर्तें काफी कठिन है, जिसकी वजह से श्रीलंका पर चीन ने यह दबाव बनाया।

क्यों यह खतरे की घंटी है

क्यों यह खतरे की घंटी है

वहीं भारत ने भी श्रीलंका को कई बिलियन डॉलर की मदद दी, भारत ने चिंता भी जाहिर की, बावजूद इसके श्रीलंका ने चीन के जहाज को अपने देश में आने की अनुमति दी। यानि साफ है कि भारत की तुलना में चीन का दबाव श्रीलंका पर ज्यादा काम आया। इस पूरे घटनाक्रम से इस बात की भी आशंका उभरकर सामने आई है कि अगर भविष्य में भारत और चीन के बीच युद्ध की स्थिति पैदा होती है तो चीन के दबाव में श्रीलंका अपने हंबनटोटा बंदरगाह को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की अनुमति दे देगा। एक्सपर्ट की मानें तो भारत ने लाइन ऑफ क्रेडिट, ईंधन समेत कई तरह की मदद श्रीलंका को मुहैया कराई। बावजूद इसके श्रीलंका भारत के पक्ष में कदम नहीं उठा रहा है। ऐसे में साफ तौर पर श्रीलंका के साथ भारत के संबंधों को फिर से नई दिशा देने का समय आ गया है।

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