सपा-बसपा के साथ हुई सीक्रेट डील के हिसाब से यूपी में लड़ेगी कांग्रेस!
नई दिल्ली। सपा-बसपा के बीच 2019 लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन का ऐलान करते वक्त भले ही मायावती का रुख थोड़ा आक्रामक दिखा। कांग्रेस के लिए अखिलेश यादव और मायावती ने केवल दो सीटें छोड़ीं- रायबरेली और अमेठी, लेकिन सपा-बसपा का रुख कांग्रेस के प्रति काफी 'मुलायम' दिख रहा है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही यूपी के महागठबंधन में कांग्रेस को जगह न मिली हो, लेकिन सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच 'टैक्टिकल एलायंस' जरूर बना रहेगा। इस अघोषित गठबंधन के बल पर सपा-बसपा उन सीटों पर कांग्रेस को मदद पहुंचाएंगी, जहां पर बीजेपी का सीधा वोट कटता दिख रहा हो। सूत्रों के मुताबिक, सपा-बसपा कम से कम उन 6 सीटों पर कांग्रेस के प्रति नरम रुख अपनाएंगी, जिन पर 2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी रही थी। हालांकि, कांग्रेस ने सपा-बसपा के महागठबंधन में जगह न मिलने पर सभी 80 सीटों पर अलग लड़ने का ऐलान किया है, लेकिन सच यही है कि सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच सीक्रेट डील हुई है, जिसके तहत ही प्रत्याशी उतारे जाएंगे।

यूपी की 8 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को लाभ पहुंचाएंगी सपा-बसपा
सीधे शब्दों में कहें तो यह गठबंधन कुछ-कुछ फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव जैसा होगा, जहां पर सपा-बसपा-आरलडी गठबंधन था और कांग्रेस ने बीजेपी के वोट कटुआ की भूमिका निभाई थी। अब कुछ वैसा ही काम 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए बसपा-सपा करने जा रहे हैं। इन छह सीटों में सहारनपुर, कानपुर और गाज़ियाबाद अहम सीटें भी शामिल हैं। ध्यान रहे कि सपा-बसपा ने रायबरेली और अमेठी सीट पर पहले से प्रत्याशी न उतारने का फैसला किया है, मतलब कुल मिलाकर 8 सीटें ऐसी हैं, जहां पर सपा-बसपा सीधे तौर पर कांग्रेस को लाभ पहुंचाने जा रही

कांग्रेस के अलग लड़ने सपा-बसपा होंगी मजबूत, बीजेपी होगी और कमजोर
शनिवार को महागठबंधन का ऐलान करते वक्त मायावती ने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस के साथ सपा-बसपा दोनों पहले गठबंधन कर चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन समस्या है कि कांग्रेस का वोट उन्हें ट्रांसफर नहीं होता। स्पष्ट है कि कांग्रेस के साथ लड़ने से सपा-बसपा को कोई लाभ नहीं मिलता दिखता रहा था, लेकिन कांग्रेस के अलग लड़ने से सपा-बसपा को फायदा होगा, जबकि बीजेपी की समस्या और बढ़ जाएगी। इस तर्क के पीछे ठोस वजह यह है कि कांग्रेस का यूपी के ब्राह्मणों पर आज भी खास प्रभाव है। यह वोट बीजेपी और कांग्रेस के बीच बंटता रहा है। उदाहरण के तौर पर गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव की बात करते हैं। गोरखपुर उपचुनाव में सपा-बसपा-आरएलडी साथ आए थे। कांग्रेस भी बीजेपी के खिलाफ इस महागठबंधन में शामिल थी, लेकिन उसने प्रत्याशी उतारा था। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस प्रत्याशी डॉक्टर सुरहीता करीम ने 18,858 वोट काट लिए। मतलब उन्हें इतने वोट मिले। अब इसका असर क्या हुआ, ये समझें। बीजेपी प्रत्याशी गोरखपुर में सपा के प्रवीण कुमार निषाद से 21881 वोटों से हारे। मतलब अगर कांग्रेस सपा-बसपा-आरएलडी के साथ आकर प्रत्याशी न उतारती तो कांग्रेस प्रत्याशी को मिले साढ़े हजार वोट बीजेपी को चले जाते। इसी प्रकार से कांग्रेस ने फूलपुर उपचुनाव में भी प्रत्याशी उतारा और वहां भी वोट काट लिए। अब 2019 में भी सपा-बसपा को कांग्रेस के अलग लड़ने से इसी प्रकार का फायदा हो सकता है।

सपा-बसपा के साथ है कांग्रेस की सीक्रेट डील, इसे टैक्टिकल अलायंस कहते हैं
न्यूज 18 की रिपोर्ट कहती है कि सपा-बसपा जिस प्रकार से कांग्रेस की मजबूत स्थिति वाली सीटों पर कमजोर उम्मीदवार उतारेंगी, ठीक उसी प्रकार से 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस भी उन सीटों पर कमजोर उम्मीदवार उतारेगी, जहां सपा-बसपा मजबूत नजर आ रही होंगी। अब भी अगर कोई यह समझ रहा है कि कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन में शामिल नहीं है, तो यह भ्रमजाल है, क्योंकि कांग्रेस का सपा-बसपा के साथ टैक्टिकल अलायंस है। यह एक सीक्रेट डील है, जो कि बीजेपी को काफी मुसीबत में डाल सकती है।












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