मोहब्बत में हत्या कैसे की जा सकती है?
दिल्ली की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना के पीछे एक ऐसी कहानी है, जो ये दिखाती है जुनून कैसे एक मोहब्बत के रिश्ते को बर्बाद करता है। अगर ये हद से आगे बढ़ जाए तो यही जुनून हिंसक भी हो जाता है।
यह दिल दहलाने वाली ख़बर है. बतौर समाज हमारे हिंसक, अमानवीय और कायर होने की भी ख़बर है.
दिल्ली के एक इलाक़े में एक नौजवान ने नाबालिग़ लड़की की हत्या कर दी. हत्या कैमरे में क़ैद है. उसमें साफ़ दिख रहा है, वह नौजवान कितना बेख़ौफ़ है. किस तरह वह लड़की को मार रहा है.
एक तरफ़ यह सब हो रहा है और दूसरी तरफ़ लोग आराम से आ-जा रहे हैं. कोई रोक नहीं रहा. कोई पुलिस को भी ख़बर नहीं करता. पुलिस को भी काफ़ी देर बाद ख़बर होती है. लड़की अब इस दुनिया में नहीं है.
ऐसा बताया जा रहा है कि दोनों के बीच 'मोहब्बत का रिश्ता' था. यह घटना 'जुनून' में हुई. तो क्या 'मोहब्बत के रिश्ते' में बर्बरता हो सकती है? मोहब्बत का 'जुनून' हिंसक हो सकता है?
इस बीच, हम चर्चा क्या कर रहे हैं? हम मारने के बर्बर तरीक़े और मारने वाले के धर्म पर चर्चा कर रहे हैं. मगर इस चर्चा में जो चीज़ नज़रअंदाज़ की जा रही है, वह है लड़कों का ऐसा व्यवहार.
क्या कोई दिल पर हाथ रख कर कह सकता है कि लड़कों का ऐसा व्यवहार फलाँ धर्म के मानने वालों में नहीं मिलता? जवाब लड़कों से नहीं, लड़कियों और स्त्रियों से पूछा जाना चाहिए.
इसलिए बेहतर हो, हम वह बात करें जो हमें ऐसी हिंसा की जड़ तक पहुँचने में मदद करे.
मोहब्बत है या दबंग मर्दानगी
लड़कों या पुरुषों में यह हौसला कहाँ से आता है कि वे जिसे चाहने की बात करते हैं या जिसके साथ दिन-रात रहते हैं या साथ रहने की क़समें खाते हैं, उसकी हत्या कर दें?
इस हौसले का एक स्रोत है- धौंसवाली दबंग ज़हरीली मर्दानगी. यह मर्दानगी सब चीज़ पर क़ाबू करना चाहती है. इंसान और इंसान की ज़िंदगी पर भी क़ाबू चाहती है.
वह लड़कियों को जायदाद की तरह अपने क़ब्ज़े में रखना चाहती है. वह उन्हें अपने इशारे पर नचाना चाहती है. ऐसी मर्दानगी के लिए किसी और की ख़्वाहिश या लड़की की आज़ाद शख़्सियत मायने नहीं रखती है.
वह दिखता तो जुनूनी है, लेकिन वह शीरीं का फ़रहाद और लैला का मजनूं नहीं बन पाता. वह 'कबीर सिंह' बनता है.
इसलिए ऐसे हिंसक जुनूनी को मजनूं या रोमियो भी कहना, इन दोनों प्रेमियों की बेइज़्ज़ती है. कहना ही तो ऐसे हिंसक जुनूनी लोगों को कबीर सिंह कहा जा सकता है.
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हिंसक लड़कों के बीच घिरा समाज
मगर लड़के या मर्द भी क्या करें? उनकी परेशानी भी समझने की ज़रूरत है. लड़कों के पास किसी भी परेशानी या समस्या का हल निकालने का अहिंसक रास्ता नहीं है. दबंग मर्दानगी ने उन्हें अहिंसक संचार नहीं सिखाया है.
वे संवाद का एक ही तरीक़ा जानते हैं- हिंसा. हिंसा चाहे बात से हो या जिस्मानी हमले से. वैसे, यह कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि दबंग मर्दानगी के साँचे ने उन्हें एक ही तरीका सिखाया- हिंसा. 'न' नहीं सुनना है.
अपने मन के ख़िलाफ़ कोई बात बर्दाश्त नहीं करनी है. जवाब, हिंसा से देना है. इसका नतीजा है कि वे ख़ुद हिंसक हो रहे हैं. अमानवीय हो रहे हैं. इसका असर उन पर और उनके साथ रहने वालों पर पड़ रहा है. लेकिन क्या किसी को मारना, मर्दानगी है?
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ज़हरीले मर्दों की पहचान
ऐसे ज़हरीले लड़के या मर्दों के कुछ लक्षण हैं. वे बार-बार मोहब्बत की दुहाई देते हैं. मगर उनकी मोहब्बत किसी को आज़ाद नहीं करती बल्कि ग़ुलाम बनाती है. वे 'न' नहीं सुनते.
वे लड़कियों को किसी और से बात करते या नज़दीक होते देखना पसंद नहीं करते. वे मोहब्बत के दिखावे में आने-जाने, बात करने, फ़ोन, सोशल मीडिया सब पर काबू करना चाहते हैं. वे आक्रामक होते हैं. ग़ुस्से पर काबू नहीं रख पाते. वे मोहब्बत भी दिखाते हैं और डराते भी हैं.
अपनी ज़िद में वे किसी की नहीं सुनते. दूसरे की भावानाओं की क़द्र नहीं करते. उनके लिए स्त्री के शरीर का इस्तेमाल ज़्यादा ज़रूरी होता है. वे शरीर से 'प्रेम' करते हैं. उस पर अपनी जीत हासिल करना चाहते हैं.
'न' की इज़्ज़त करना सीखना होगा
मोहब्बत दो या दो से ज़्यादा लोगों की रज़ामंदी का नाम है. चाहत एकतरफ़ा हो सकती है. जिस तरह हमें किसी को चाहने का मन कर सकता है. उसी तरह किसी को हमें न चाहने का भी मन कर सकता है.
इकतरफ़ा चाहत को प्रेम या मोहब्बत नहीं कहा जा सकता. इतनी मामूली सी बात हमें क्यों नहीं समझ में आती है. किसी के 'न' की इज़्ज़त करना ही मोहब्बत की पहली सीढ़ी है. मोहब्बत में सम-भाव है. एकतरफ़ा चाहत या लगाव में सम-भाव नहीं है.
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हिंसा का बढ़ता दायरा
यही नहीं, लड़कों में हिंसा की कल्पना जितनी भयानक और ख़तरनाक है, वह पूरे समाज के लिए बड़ा ख़तरा बन गया है. लड़कियों की ज़िंदगी के लिए तो ज़ाहिर है ही.
लड़के जिस हौसले से लड़कियों के साथ हिंसा कर रहे हैं, वह समाज में बढ़ रही और दूसरी हिंसा से अलग नहीं है. दूसरी हिंसा में भी तो योगदान लड़कों और मर्दों का ही है. लड़कों को यह लगता है कि वे हिंसा कर सकते हैं.
हिंसा उनके मर्द होने का सुबूत है. हिंसा जायज़ है. किसी को पीटकर या मारकर वे आराम से रह सकते हैं. कोई उन्हें सज़ा नहीं दे सकता. इसीलिए, ख़ासतौर पर निहायत निजी रिश्ते में वे बेख़ौफ़ होकर ज़बरदस्त हिंसा कर रहे हैं.
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तो मोहब्बत क्या है?
मोहब्बत तो सब कुछ न्योछावर करने का नाम है. न्योछावर के बदले किसी भी चीज़ की चाह का नाम सौदा हो सकता है, मोहब्बत नहीं.
यह कैसे मुमकिन है कि जिसे हम चाहते हों, उसे नुक़सान पहुँचायें? उसकी हत्या कर दें? हत्या में बर्बरता की सारी हदें पार कर दें?
मोहब्बत तो झूठे वादों का नाम भी नहीं है. इसमें छल-प्रपंच, कपट की भी जगह नहीं है. मोहब्बत किसी लोभ में… इस दुनिया या उस दुनिया में जगह बनाने का नाम भी नहीं है. मोहब्बत में जाति- धर्म-भाषा- लिंग की भी दीवार नहीं हो सकती. इसीलिए मोहब्बत में एकतरफ़ा धर्म-परिवर्तन की भी जगह नहीं होनी चाहिए.
मोहब्बत में तो बर्बरता नहीं ही हो सकती. वह स्त्री को जायदाद मानने, बदले और नफ़रत की भावना से उपजी है. यही ज़हरीली मर्दानगी है.
पुरानी भुलानी होगी, नयी मर्दानगी सीखनी होगी
मोहब्बत में हत्या करना या तेज़ाब से चेहरा ख़राब कर देना- ऐसी सारी हरकत बताती है कि लड़कों की परवरिश में समाज ने कितना तेज़ाब डाला है.
इसलिए लड़कों को सबसे पहले वे सब चीज़ें अपनी ज़िंदगी से निकालनी होंगी, जो उन्होंने अब तक मर्दानगी के नाम पर सीखा है. उन्हें नये तरीक़े से मर्दानगी अपनानी होगी. इस मर्दानगी की पहली और ज़रूरी शर्त अहिंसा और बंधुता है.
लोकतांत्रिक बनना सीखना होगा. लोकतांत्रिक बनने का मतलब अपने मन के ख़िलाफ़ बात सुनने की आदत डालनी होगी. असहमति को सुनने और उसकी इज़्ज़त करने की आदत डालनी होगी.
अपनी बात मनवाने की ज़िद छोड़नी होगी. दूसरों और ख़ासकर लड़की की नज़रिये और राय को जगह देनी होगी. ऐसा होगा तब ही हमें 'मोहब्बत के रिश्ते' में हिंसा की बात सुनाई नहीं देगी.
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