शिवसेना ने नागरिकता संसोधन बिल पर राज्यसभा से वॉकआउट करके एक तीर से साधे कई निशाने, जानिए

महाराष्‍ट्र की अघाड़ी सरकार वाली शिवसेना ने राज्यसभा में नागरिकता संसोधन बिल पर वॉकआउट करके एक साथ कई निशाने साधे,shiv Sena, the Aghadi government of Maharashtra, walked out in the Rajya Sabha by taking a walkout on the Citizenship Amendment Bill and targeting many simultaneously,

बेंगलुरु। नागरिकता संसोधन बिल पर शिवसेना का राज्यसभा से वाॅकआउट ने लोगों को अचंभित कर दिया। महाराष्‍ट्र में कांग्रेस-एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाने के बावजूद लोकसभा में इस बिल के समर्थन में वोट करना फिर यू टर्न लेने पर यह सवाल उठने लगे कि क्या हिंदूवादी शिवसेना पार्टी क्या सेक्युलर हो गयी? इतना ही नहीं शिवसेना पर आरोप लगा कि उसने बिल पर वाॅकआउट का स्‍टैन्‍ड महाराष्‍ट्र की सरकार बचाने के लिए कांग्रेस के दबाव में आकर लिया। लेकिन वास्‍तविकता इससे बिलकुल अलग है, शिवसेना का ये कदम उसकी सोची समझी रणनीति के तहत था। ऐसा करके शिवसेना ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं! शिवसेना का चुनाव चिन्‍ह धनुष और तीर है, सीएम उद्वव ठाकरे ने इसलिए एक तीर से ज्यादा से ज्यादा निशाना साधने की कोशिश की।

shivsena

बता दें नागरिकता संशोधन बिल पर शिवसेना का स्टैंड कांग्रेस नेतृत्व को अच्छा नहीं लगा है। लोकसभा में बिल पर शिवसेना के समर्थन करने की बात पर कांग्रेस ने शिवसेना ने महाराष्‍ट्र में गठबंधन से बाहर आने को लेकर धमकी तक दे डाली। कांग्रेस को लगा कि उसकी इस धमकी के बाद शिवसेना राज्यसभा में बिल के विरोध में उसके साथ खड़ी रहेगी लेकिन शिवसेना ने राज्यसभा से वाॅकआउट कर दिया। वाॅकआउट करके शिवसेना ने कांग्रेस नेतृत्व को साफ कर दिया है कि भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ देने का मतलब हमेशा के लिए सेक्युलर हो जाना नहीं है। इतना ही नहीं महाराष्‍ट्र में गठबंधन की अघाडी सरकार की गरज सिर्फ शिवसेना की नहीं, कांग्रेस और एनसीपी दोनों पार्टी की है।

बीच का रास्‍ता अपनाकर दिया ये संदेश

बीच का रास्‍ता अपनाकर दिया ये संदेश

इतना ही असल में शिवसेना ने भाजपा द्वारा पेश किए गए नागरिकता संशोधन बिल के समर्थन को लेकर बीजेपी को नाराज भी नहीं किया है। क्योंकि शिवसेना जो हमेशा से इस बिल का समर्थन करती आयी अगर अचानक इसका विरोध करेगी तो उससे शिवसेना की हिंदूवादी छवि खतरे में पड़ सकती हैं। इससे महाराष्‍ट्र में उसके वोटर नाराज हो सकते हैं। इसलिए उनके मध्‍यम मार्गी रास्‍ता अपनाकर वाकआउट किया।

शिवसेना को भी अच्‍छे से पता था कि राज्यसभा में उसके तीन वोट बिल न करने की स्थिति में भी यह बिल पास हो जाएगा जो हुआ भी। एक तरफ यह स्‍टैन्‍ड लेकर अपने वोटर को भी संदेश दिया है कि शिवसेना ने हिंदुत्व की लाइन नहीं छोड़ी है और बिल के विरोध में वोट न करके भाजपा को भी नाराज भी नहीं किया हैं। वहीं कांग्रेस नेतृत्व को कड़ा संदेश दिया है कि वो किसी मुगालते में न रहे कि महाराष्‍ट्र में सरकार चलाना जितना शिवसेना के लिए अहम है उतना ही उसके लिए भी है।

कांग्रेस की इस धमकी के बावजूद नहीं झुकी शिवसेना

कांग्रेस की इस धमकी के बावजूद नहीं झुकी शिवसेना

गौरतलब है कि शिवसेना ने नागरिकता संसोधन विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही अपना रुख साफ कर दिया था कि केन्‍द्र में भले ही सरकार भाजपा की हो, लेकिन महाराष्‍ट्र में भाजपा के साथ पुराना गठबंधन टूटने के बाजवूद जिन मुद्दों पर वो आवश्‍यक समझती है वह इसके समर्थन में खड़ी रहेगी। शिवसेना ने इस बयान के बयान के बाद वोट लोकसभा में इस बिल के पक्ष में वोट किया। जिस पर काग्रेंस के पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कह दिया कि जो बिल के सपोर्ट में हैं वे देश के बुनियादी ढांचे के खिलाफ हैं।

कांग्रेस ने फंसाया ऐसे पेंच

इतना ही काग्रेंस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी ने भी इस पर नाराजगी जतायी और महाराष्‍ट्र सरकार गठबंधन से बाहर तक जाने का अल्‍टीमेटम का संदेश तक सीएम उद्वव ठाकरे तक पहुंचा। खबर है कि कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने उद्धव ठाकरे से बात की है और आलाकमान का मैसेज दिया है कि नागरिकता बिल जैसे मुद्दों पर शिवसेना का ऐसा रवैया भविष्य में महाविकास अघाड़ी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। ऐसा करके कांग्रेस ने शिवसेना को फंसा दिया था। लेकिन पेंच फंसते ही उद्वव ठाकरे ने एक कुशल राजनीतिक की तरह बीच का रास्ता निकाला।

हिंदुत्‍व के मुद्दे पर निशाना

हिंदुत्‍व के मुद्दे पर निशाना

इसके बाद उद्धव ठाकरे ने बिल के विरोध और पक्ष में बात करने के बजाय अचानक रुख बदलते हुए कहना शुरु कर दिया कि बिल पर बगैर पूरी तस्वीर साफ हुए शिवसेना राज्य सभा में समर्थन नहीं करेगी। इसके बाद राज्यसभा में वाकआउट करके एक तरफ कांग्रेस से किया वादा किया और दूसरी ओर मध्‍यममार्ग अपना कर बीजेपी और अपने वोटरों को नाराज होने से बचा लिया। इसके साथ जनता को यह संदेश दिया कि सेक्युलर सरकार का मुख्‍यमंत्री होने के बावजूद शिवसेना हिदुत्‍व के मुद्दे को लेकर अभी भी पहले के जैसी ही संजीदा है।

कांग्रेस को सिखाया ये सबक

कांग्रेस को सिखाया ये सबक

कांग्रेस को ये अच्‍छा से पता था कि अगर शिवसेना इस बिल पर भाजपा के विरोध में खड़ी होती है तो भाजपा के साथ उसके संबंध और खराब हो जाएंगे। इसलिए कांग्रेस की शिवसेना पर दबाव बना रही थी कि नागरिकता बिल का विरोध कर रही पार्टियों की तरह ही राज्य सभा में मौजूद रह कर विरोध में वोट करें। लेकिन बहिष्कार करके तो शिवसेना ने एक तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की मदद ही कर दी। साथ ही कांग्रेस को यह संदेश दे दिया कि वह एक सीमा तक ही गठबंधन के लिए समझौता करेगी।

शिवसेना ही नहीं कांग्रेस और एनसीपी की भी ये गरज

शिवसेना ही नहीं कांग्रेस और एनसीपी की भी ये गरज

सीएम उद्वव ठाकरे को ये अच्‍छे से मालूम है कि महाराष्‍ट्र चलाने की गरज उनसे अधिक कांग्रेस और एनसीपी की है। शिवसेना के गठबंधन के बिना महाराष्‍ट्र में वह सरकार बनाने का सपना तक देखने की भी उनकी औकात नही थी। महाराष्ट्र में अगर शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन की महाविकास अघाड़ी सरकार जाती है तो शिवसेना के साथ कांग्रेस और एनसीपी भी सड़क पर आ जाएगे।

शिवसेना तो सड़क पर आने के बाद भी कभी भी पाला बदल के अपनी पुरानी सहयोगी भाजपा का दामन थाम कर दोबारा महाराष्‍ट्र में बड़े आराम से सरकार बना लेगी। भले ही भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद उद्वव ठाकरे मुखयमंत्री नही बन पाएंगे लेकिन सरकार में उनकी साझेदारी तो होगी ही। इसलिए सरकार जाने के बाद अपना वजूद बनाए रखने का संकट शिवसेना के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस और एनसीपी के लिए होगा।

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