दलित आरक्षण की नई राजनीति में INDIA ब्लॉक या NDA किसके लिए मुश्किल होंगे हालात?
SC Reservation News: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में उप-वर्गीकरण के पक्ष में फैसला देकर दलितों की राजनीति की धारा बदलने के हालात पैदा कर दिए हैं। इसकी वजह से अभी से उत्तर से दक्षिण भारत तक की राजनीति में बदलाव नजर आने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सत्ताधारी एनडीए और विपक्षी इंडिया ब्लॉक से जुड़ी पार्टियां अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से बयान दे रही हैं। वैसे कांग्रेस और बीजेपी ने आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है, लेकिन इस मुद्दे पर एनडीए का रास्ता ज्यादा मुश्किल होता दिख रहा है।

प्रभावशाली दलित जातियों के हितों को हो सकता है नुकसान
जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से प्रभावशाली दलित जातियों के हितों को नुकसान पहुंच सकता है और इनपर आधारित राजनीतिक पार्टियों की प्रतक्रिया में इस बात की झलक भी दिख रही है।
चिराग पासवान ने फैसले को चुनौती देने की कर दी है घोषणा
बिहार में भाजपा के अहम सहयोगी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने तत्काल ही कह दिया कि वह सर्वोच्च अदालत के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। चिराग की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का आधार वोट बैंक पासवान जाति है। बिहार में हुए जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़े के मुताबिक इसकी आबादी 5.31% है, जो हिंदुओं में यादवों के बाद सबसे ज्यादा है।
जीतन राम मांझी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ
इनके बाद राज्य में दलित जातियों में चमारों (अन्य राज्यों में जाटव) की जनसंख्या 5.25% है। केंद्र की मोदी सरकार में एक और पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (HAM) भी शामिल है। लेकिन, इसके नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है, 'हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत और समर्थन करते हैं। यह अच्छा है।'
मांझी की पार्टी मुसहर वोट बैंक पर आधारित है, जिनकी जनसंख्या 3% है और बिहार सरकार ने इन्हें 'महादलित' की श्रेणी में रखा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस अति-सामान्य अनुसूचित जाति के लोगों को फायदा मिलने की उम्मीद जगी है और मांझी की प्रतिक्रिया में उसी की झलक मिल रही है।
नीतीश कुमार की पार्टी ने भी किया फैसले का समर्थन
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2008 में ही दलितों में भी सबसे पिछड़ी जातियों को महादलित की श्रेणी में डाला था। उस लिस्ट से पासवान को अलग रखा गया था। इसलिए जेडीयू की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर यही कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब जो कहा है, नीतीश उसे 2008 में ही लागू कर चुके हैं।
आरजेडी ने लिया चिराग पासवान वाला स्टैंड
लेकिन, बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया है। इस पार्टी का भी एलजेपी की तरह ही तर्क है कि अनुसूचित जाति के आरक्षण का आधार कभी भी जनसंख्या या आमदनी नहीं रहा।
मायावती-चंद्रशेखर भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं
इसी तरह से यूपी में मायावती की बसपा और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए इसे दलितों को मिले आरक्षण को खत्म करने का हथकंडा करार दिया है। इन दोनों ही दलों का मूल जनाधार जाटव समुदाय हैं, जिनकी जनसंख्या भी उत्तर प्रदेश के दलितों में सबसे ज्यादा है और यह सामाजिक-राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली भी हैं।
यूपी में भाजपा की दो सहयोगियों ने किया फैसले का समर्थन
लेकिन, यूपी में भाजपा की अन्य सहयोगियों में निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने सर्वोच्च अदालत के फैसला का समर्थन किया है। निषाद पार्टी प्रदेश के निषादों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग कर रही है। वहीं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओपी राजभर ओबीसी आरक्षण में अति-पिछड़ी जातियों के लिए विशेष कोटा की वकालत करते हैं।
प्रकाश अंबेडकर की पार्टी को भी नहीं पच रहा सुप्रीम कोर्ट का फैसला
वहीं महाराष्ट्र में प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) को भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं पच पा रहा है। माना जाता है कि इनकी पार्टी का मुख्य जनाधार महार हैं, जो महाराष्ट्र के दलितों में सबसे दबदबे वाली जाति मानी जाती है।
दक्षिण में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में माहौल
इससे ठीक उलट दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियां आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का खुलकर स्वागत कर रही हैं। भाजपा की सहयोगी टीडीपी ने इसका स्वागत किया है। बताया जाता है कि वहां दलित आरक्षण का सबसे ज्यादा फायदा माला जाति को मिला है, जो तुलनात्मक रूप से काफी संपन्न हैं। लेकिन, राजनीतिक रूप से इन्हें कांग्रेस समर्थक माना जाता है।
वहीं चंद्रबाबू नायडू की रणनीति मडिगा समुदाय को गोलबंद करने की रही है, जो आरक्षण के लाभ से आमतौर पर वंचित बताए जाते हैं। इसी तरह से बीजेपी तेलंगाना में उप-वर्गीकरण की वकालत कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मडिगाओं के लिए सब-कोटा बनाने को लेकर एक समिति के गठन की घोषणा भी कर चुके हैं।
लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बिहार में भाजपा की सहयोगी पार्टियों में जिस तरह से मतभेद उभरे हैं, वह एनडीए की मुश्किलें बढ़ा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भाजपा की बढ़ी चुनौती!
एनडीए के एक बड़े नेता के मुताबिक, 'बीजेपी इस फैसले को पूरी तरह से न तो नकार कर सकती है और न ही स्वीकार कर सकती है। क्योंकि, दक्षिण में उसे इससे लाभ होगा और उत्तर में उसे न सिर्फ सहयोगियों से बल्कि वोटरों से भी विरोध की आशंका है। भाजपा सरकार आरक्षण खत्म कर देगी वाला विपक्ष का अभियान पहले ही उत्तरी राज्यों में उसे बहुत ज्यादा प्रभावित कर चुका है। बीजेपी को इस मसले पर बहुत ही सावधानी से बढ़ना होगा।'












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