बीएचयू में संस्कृत प्रोफ़ेसर विवाद: ऐसे में फ़िरोज़ ख़ान तो मुसलमान ही नहीं होंगे

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मशहूर अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन ने उन्नीसवीं सदी में कहा था, ''बनारस इतिहास से भी प्राचीन है, परंपरा से भी पुराना है और मिथकों से भी पहले से है. इतिहास, परंपरा और मिथ को साथ मिला दें तो बनारस और प्राचीन लगने लगता है.''

लेकिन बनारस अब नया हो चुका है. इस नए बनारस के छात्रों को किसी फ़िरोज़ ख़ान का संस्कृत पढ़ाना नहीं रास आ रहा. ये अड़े हुए हैं कि फ़िरोज़ ख़ान मुसलमान हैं और एक मुसलमान संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है? एक मुसलमान गीता और वेद कैसे पढ़ा सकता है?

फ़िरोज़ ख़ान कहते हैं. ''तीन-चार साल की उम्र में मैं पास के ही एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाया करता था. वहां की पढ़ाई मुझे ठीक नहीं लगी. मतलब मेरे मन की पढ़ाई नहीं थी. टीचर बोलते थे ये भी याद करके आना है वो भी याद करके आना है. पढ़ाई एकदम बोझ बन गई थी. मैंने घरवालों से कहा कि यहां नहीं पढ़ूंगा. पापा ने सरकारी स्कूल में एडमिशन कराने का फ़ैसला किया. लेकिन उन्होंने सरकारी स्कूल में भी सामान्य स्कूल को ना चुन संस्कृत स्कूल को चुना. मेरे पापा ने भी संस्कृत की पढ़ाई की है. उन्होंने संस्कृत में शास्त्री तक की पढ़ाई की है. संस्कृत से मेरी सोहबत और सफ़र की शुरुआत यहीं से होती है.''

फ़िरोज़ ख़ान और संस्कृत की सोहबत यहां से शुरू हुई और अब राजस्थान के जयपुर से बनारस पहुंच चुकी है. बनारस यानी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में.

फ़िरोज़ ख़ान के पिता रमज़ान ख़ान ने अपने गाँव बागरु के एक ज्योतिषी के कहने पर अपना नाम मुन्ना मास्टर कर लिया था. इनका गाँव बागरु जयपुर से 36 किलोमीटर दूर है.

मुन्ना मास्टर संगीत पढ़ाते हैं और गाते भी उतने ही बेहतरीन हैं. मुन्ना मास्टर के पिता भी मंदिरों में भजन गाते थे और वो भी भजन गाते हैं. मुन्ना मास्टर की गायकी और भजन सुन कोई भी आत्ममुग्ध हो जाए. वो कृष्ण का भजन गाते हैं. अगर भजन की आवाज़ से आप किसी के मजहब का अंदाज़ा लगाते हैं, तो इस ऑडियो को सुनिए.

फ़िरोज़ ख़ान मुन्ना मास्टर के तीसरे बेटे हैं. पाँच नवंबर को फ़िरोज़ का बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के लिए इंटरव्यू था. इंटरव्यू में इनका चयन हुआ और छह नवंबर को चयन पत्र मिला.

फ़िरोज़ सात नवंबर को जॉइन करने गए लेकिन संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के स्टूडेंट पहले से ही विरोध करने के लिए बैठे थे. अब तक ये छात्र विरोध कर रहे हैं और सात नवंबर के बाद से कोई क्लास नहीं हो पाई है. फ़िरोज कहते हैं, ''जब मैं वहां गया तो देखा गेट बंद है और लोग धरने पर बैठे हुए हैं.''

मुन्ना मास्टर पूरे वाक़ये पर कहते हैं, ''यह हमारे लिए काफ़ी दुखद है. बनारस ने पहली बार अहसास कराया कि हम मुसलमान हैं. अब तक मुझे इसका अहसास नहीं था.''

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फ़िरोज़ ख़ान कहते हैं, ''किसी धर्म के इंसान को कोई भी भाषा सीखने और सिखाने में क्या दिक़्क़त हो सकती है? मैंने संस्कृत को इसलिए पढ़ा कि इस भाषा के साहित्य को समझना था. इसमें निहित तत्व को समझना था. कहते हैं कि भारत की प्रतिष्ठा के दो आधार हैं- एक संस्कृत और दूसरा संस्कृति. अगर आप भारत को समझना चाहते हैं तो बिना संस्कृत पढ़े पूरी तरह से नहीं समझ सकते हैं.'' फ़िरोज़ कहते हैं भारत का जो मूल तत्व है वो संस्कृत में ही है.

भारत में एक लोकप्रिय धारणा है कि संस्कृत हिन्दुओं और ख़ासकर ब्राह्मणों की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की. हालांकि कोई भी भाषा उनकी होती है जो सीखते हैं, पढ़ते हैं, चाहे कोई किसी भी धर्म का हो.

फ़िरोज़ कहते हैं, ''चाहे उर्दू हो या संस्कृत उसे किसी पंथ या जाति से जोड़कर नहीं देख सकते. मैं मुसलमान हूं लेकिन मुझे उर्दू नहीं आती लेकिन संस्कृत बहुत अच्छी आती है. आप जिस भाषा को पसंद करते हैं और सीखते हैं वही भाषा आपको आएगी. न तो संस्कृत को हम केवल धर्म से बांध सकते हैं और न ही उर्दू को.''

जो छात्र विरोध कर रहे हैं उनका क्या तर्क है?

इस विरोध का नेतृत्व कर रहे चक्रपाणी ओझा कहते हैं, ''फ़िरोज़ ख़ान के संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने से समस्या नहीं है. यहां पर संस्कृत के दो विभाग हैं. एक संस्कृत विभाग है और दूसरा संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान. फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति संस्कृत विभाग में होती तो हमें कोई समस्या नहीं थी लेकिन यहां तो धर्म की शिक्षा दी जाती है. ये धर्म की शिक्षा कैसे देंगे? दूसरी बात यह कि फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्त यूनिवर्सिटी एक्ट का उल्लंघन है. यूनिवर्सिटी एक्ट में साफ़ लिखा है कि धर्म विज्ञान में सनातन वाले ही आ सकते हैं.''

क्या वाक़ई फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति यूनिवर्सिटी एक्ट के ख़िलाफ़ है. ऐसा यूनिवर्सिटी प्रशासन भी नहीं कहा रहा है. चक्रपाणी ओझा कहते हैं कि इस मुद्दे को लेकर नाराज़ छात्रों की बात बीएचयू के वीसी राकेश भटनागर से हुई थी लेकिन कोई रास्ता नहीं निकल पाया. चक्रपाणी ने कहा कि वीसी इस बात को मानने के लिेए तैयार नहीं कि यूनिवर्सिटी एक्ट का उल्लंघन कर फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति की गई है.

चक्रपाणी ख़ुद को बीजेपी के स्टूडेंट विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का बताते हैं.

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बीएचयू के हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर आशीष त्रिपाठी पूरे प्रकरण से उठे सवालों को दूसरे कोण से देखने की वकालत करते हैं. वो कहते हैं, ''1950 के बाद भारत संविधान से संचालित है. अगर किसी संस्था के नियमों-परंपराओं और संविधान में कोई अंतर्विरोध पैदा होता है तो उन दो पक्षों को बिना हिचक संविधान को मानना होगा. यहां तक कि संसद और संविधान में मतभेद पैदा हो तो संविधान ही सर्वोच्च होगा. फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति संविधान सम्मत है. फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति में विश्वविद्यालय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है.''

वो कहते हैं, ''अगर विश्वविद्यालय में कोई ऐसा एक्ट होता तो इस पद के विज्ञापन में यह घोषणा साफ़ शब्दों में होती, जो इस मामले में नहीं थी. विज्ञापन के बाद आए आवेदनों की स्क्रूटनी में संकाय प्रमुख (डीन), विभागाध्यक्ष और कम से कम दो सीनियर प्रोफ़ेसर शामिल होते हैं. ज़ाहिर है उन्हें भी यूनिवर्सिटी एक्ट का ज्ञान होता है. अगर उन्हें लगता कि फ़िरोज़ ख़ान का आवेदन यूनिवर्सिटी के नियमों के ख़िलाफ़ है तो उन्होंने ज़रूर ख़ारिज कर दिया होता. फ़िरोज़ को इंटरव्यू के लिए आमंत्रण भेजा गया यानी स्क्रूटनी कमिटी ने माना कि इस पद हेतु उनकी पात्रता है. चयन समिति ने उन्हें योग्य माना और उन्हें चुना गया.''

मंगलवार को बीएचयू प्रशासन ने भी स्पष्ट कर दिया कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के एक पद पर चुने गए अभ्यर्थी के विरोध में कुछ लोग कई दिनों से कुलपति आवास के बाहर धरने पर बैठे हैं. इस संबंध में विश्वविद्यालय ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि नियुक्ति में पूरी पारदर्शिता अपनाते हुए विश्वविद्यालय ने नियमानुसार योग्यतम पाए गए उम्मीदवार का सर्वसम्मति से चयन किया है. हमने प्रदर्शनकारी छात्रों को फिर से बता दिया है कि इस नियुक्ति में किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है.''

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विरोध करने वाले छात्रों का कहना है कि यह संस्कृति के ख़िलाफ़ है लेकिन संस्कृति को ये धर्म से जोड़ते हैं. क्या यहां धर्म की पढ़ाई होती है? फ़िरोज़ ख़ान कहते हैं, ''इस संकाय में अलग-अलग विभाग हैं. जैसे साहित्य विभाग अलग है, व्याकरण विभाग अलग है, ज्योतिष विभाग अलग है, वेद और धर्मशास्त्र का विभाग अलग है. दर्शन से जुड़ा विभाग भी अलग है. साहित्य में धार्मिक शिक्षा पूरी तरह से नहीं है. यहां नाटक की पढ़ाई होती है. जैसे अभिज्ञान शाकुंतलम है, उत्तर रामचरितम है. यह तो पूरी तरह से साहित्य है. अगर धर्मशास्त्र और वेद की बात आएगी तो वहां ऐसा कह भी सकते हैं.''

आशीष त्रिपाठी कहते हैं कि इतनी बड़ी चूक कैसे हो सकती है? वो कहते हैं, ''दरअसल, यह एक्ट के उल्लंघन का मामला नहीं है. जो विरोध कर रहे हैं उन्हें लग रहा है कि इस क्षेत्र से उनका एकाधिकार ख़त्म हो रहा है. ये अभी भी लोकतांत्रिक नहीं होना चाहते और अपने विशेषाधिकारों को बनाए रखना चाहते हैं. जो लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है. ये तकनीकी, विज्ञान, समाज-विज्ञान या अन्य क्षेत्रों में तो किसी को धर्म या जाति के आधार पर रोक नहीं सकते पर धर्मविद्या में अपने विशेषाधिकारों को छोड़ना नहीं चाहते.''

वो कहते हैं, ''यह सामाजिक वर्चस्व की भावना का ही प्रतिबिम्बन है. ये प्रतिक्रियावादी वर्गों के सदस्य हैं जो हिन्दू धर्म स्थानों में हिन्दू धर्म के अनुयायियों में से ही क्षत्रिय, वैश्य या विशेष रूप से शूद्र पुजारियों का विरोध करते हैं."

फ़िरोज़ ख़ान कहते हैं कि वो संस्कृत में लक्षण ग्रंथ को बहुत बेहतर समझते हैं और उन्हें ये कंठस्थ है. वो कहते हैं, ''लक्षणग्रंथ में मेरी काफ़ी रुचि है. मैंने पूरा काव्य प्रकाश कंठस्थ कर रखा है. इसमें अलंकार, गुण और रीति-दोष आते हैं.'' फ़िरोज़ ने वेद भी पढ़ा है. वो संस्कृत में कविताएं लिखते हैं. दूरदर्शन पर वार्तावाणी साप्ताहिक प्रोग्राम करते हैं. बांग्ला के गानों को भी संस्कृत में दूरदर्शन के लिए गाया है. फ़िरोज़ ख़ान को इसी साल राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने संस्कृत युवा प्रतिभा पुरस्कार दिया था.

इतना कुछ होने के बावजूद विरोध कर रहे छात्रों का कहना है कि जब तक फ़िरोज़ ख़ान को नहीं हटाया जाएगा तब तक क्लास नहीं चलने देंगे.

आशीष त्रिपाठी कहते हैं एक सेक्युलर राष्ट्र की यूनिवर्सिटी में धर्म और जाति को लेकर इस तरह का बर्ताव अलोकतांत्रिक है. इन मामलों में परंपरा की दुहाई को भी वे अवैध मानते हैं. वो कहते हैं, ''अगर कोई बात परंपरा में कहीं किसी ने कभी कही या लिखी भी गई थी, चाहे वो कितनी ही बड़ी शख़्सियत ने ही कही हो तो उसे भी संवैधानिक और लोकतांत्रिक भारत में शब्दसः नहीं माना-अपनाया जा सकता. समय के साथ बदलाव करके ही समाज को श्रेष्ठ बनाया जा सकता है."

आशीष त्रिपाठी इसी संकाय का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ''1920-30 में शूद्रों और को वैदिक शिक्षा से रोका जाता था, बाद में इसे बदला गया और इन वर्गों को भी अध्ययन का अधिकार दिया गया.''

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आशीष त्रिपाठी इस बात को भी असंगत मानते हैं कि भजन गाने जैसी भावनात्मक अपीलों से फ़िरोज़ को समर्थ किया जाए. वो कहते हैं, ''ऐसा करने से फ़िरोज़ के नागरिक अधिकारों का संघर्ष कमज़ोर पड़ता है. जहां तक मुझे फ़िरोज़ खान के बारे में पता है उस आधार पर कह रहा हूं कि उन्होंने संस्कृत को पूरी गंभीरता और पारंपरिकता के साथ पढ़ा है. अगर वे और उनके पिता भजन न भी गाते तब भी उन्हें संस्कृत पढ़ने और पढ़ाने का हक़ है. इससे कोई रोक नहीं सकता."

अगर संस्कृत में महारत रखने वाला हिन्दू या पंडित होता है तो फ़िरोज़ ख़ान दोनों हैं. अगर उर्दू नहीं जानने वाला मुसलमान नहीं होता है तो फ़िरोज़ ख़ान मुसलमान नहीं हैं. एक मुसलमान के पिता को मंदिर में जाना और भजन गाना ग़ैर-इस्लामिक समझा जाता है तो मुन्ना मास्टर अक्सर ऐसा करते हैं. अगर मुसलमान का पिता अपने बेटे को क़ुरान और मदरसे का रुख़ करवाता है तो मुन्ना मास्टर ने ऐसा कभी नहीं किया.

रमज़ान ख़ान, माफ़ कीजिएगा मुन्ना मास्टर इस बात से दुखी हैं कि उन्होंने जो गुण सीखा है उस गुण के कारण उनके बेटे को परेशानी हो रही. वो कहते हैं कि उनका गाँव बागरु और जयपुर ने संस्कृत और संगीत की अराधाना पर कभी सवाल नहीं खड़ा किया लेकिन बनारस ने ऐसा कर उन्हें दुख पहुंचाया है.

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