जानिए, चुनाव में बीजेपी के लिए कैसे काम करता है आरएसएस?
नई दिल्ली- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दावा करता है कि वह किसी भी मुद्दे पर बीजेपी के लिए सिर्फ सलाहकारी रोल अदा करता है, न कि उसके काम में कोई सीधा दखल देता है। लेकिन, अगर गौर से विचार करें, तो आरएसएस की भूमिका इससे कहीं ज्यादा होती है। वह अपने स्वयं सेवकों और संसाधनों के अलावा वैचारिक प्रभाव से भी, चुनाव से लेकर बाकी कई मुद्दों पर भी बीजेपी के नीति नियंताओं के लिए एक तरह से गाइड का काम करता है।

संघ है बीजेपी की ताकत
बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी खबर के मुताबिक इस महीने की शुरुआत में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की थी और अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में भी शामिल हुए थे। यह संघ के फैसले लेने वाली सर्वोच्च संस्था है। अखबार ने लिखा है कि इसबार के चुनाव में बीजेपी के प्रचार के लिए संघ की भूमिका 2014 के मुकाबले बदली हुई नजर आ रही है। 2014 में उसने पार्टी की बहुत ही सक्रिय सहायता की थी, लेकिन इसबार उसने अपनी रणनीति थोड़ी बदल ली है। क्योंकि संघ को लगता है कि आज की तारीख में मोदी और अमित शाह की जोड़ी अपने आप में खुद ही काफी सक्षम हैं। इसी कारण ऐसी भी चर्चाएं सुनने को मिल जा रही हैं कि अगर मोदी को बहुमत नहीं मिला तो नितिन गडकरी को चांस मिल सकता है। लेकिन, सच्चाई ये है कि इन चर्चाओं के बावजूद बीजेपी को संघ के संगठन का भरपूर फायदा मिल रहा है। संघ की मदद से बीजेपी आज अधिकतर वोटरों तक पहुंच बनाने में समर्थ है।

संघ का संगठन
आरएसएस ने देश को अपने हिसाब से संगठनात्मक ढांचे में बांटा हुआ है, जिसके तहत कुल 11 क्षेत्र हैं। इसमें दक्षिण में केरल और तमिलनाडु, दक्षिण मध्य में कर्नाटक, पश्चिम आंध्र प्रदेश, पूर्वी आंध्र प्रदेश, पश्चिम में कोंकण,पश्चिम महाराष्ट्र, देवगीरी,गुजरात और विदर्भ, मध्य में मालवा, मध्य भारत, महाकौशल और छत्तीसगढ़, उत्तर पश्चिम में चित्तौर, जयपुर और जोधपुर, उत्तर में दिल्ली,हरियाणा,पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड, मेरठ और ब्रज, पूर्वी उत्तर प्रदेश में कानपुर, अवध,काशी और गोरखपुर, उत्तर पूर्व में उत्तरी और दक्षिण बिहार एवं झारखंड, पूरब में उत्कल, दक्षिण बंगाल और उत्तर बंगाल, असम में उत्तर असम, अरुणाचल प्रदेश, दक्षिण असम और मणिपुर जैसे राज्य शामिल हैं।
पूरे संगठन में निर्णय लेने वाली दो सर्वोच्च संस्थाएं हैं- अखिल भारतीय कार्यकारिणी और अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा।

चुनाव में जिन चेहरों पर रहेगी बीजेपी की नजर
आरएसएस के कुछ चुनिंदा चेहरे ऐसे हैं, जिनपर इस चुनाव के दौरान बीजेपी की नजर रहने वाली है। वो जो भी कहेंगे या जो भी विचार रखेंगे (सीधा अथवा परोक्ष तौर पर) बीजेपी एक तरह से उसे ही संकेत मानकर रणनीति बना सकती है। निश्चित तौर पर यह राय ही होती है, लेकिन अगर पार्टी समझना चाहेगी तो उसी में इशारा भी छिपा हो सकता है।
सुरेश भैयाजी जोशी- संघ में दूसरा स्थान। बीजेपी और संघ के बीच का तालमेल देखते हैं। इनकी हर बात बीजेपी के लिए मायने रखती है।
दत्तात्रेय होसबोले- संघ के सह-सरकार्यवाह के रूप में इनकी मुख्य जिम्मेदारी भैयाजी जोशी जी की सहायता है। यूपी विधानसभा के दौरान इन्होंने लखनऊ में रहकर काम किया था और बीजेपी नेताओं के साथ संपर्क में बने हुए थे।
डॉ. कृष्ण गोपाल- 2019 के चुनाव में बीजेपी और संघ के बीच आने वाले मुद्दों को निपटाना इनकी जिम्मेदारी है। 2014 में सुरेश सोनी ने यही भूमिका निभाई थी। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनाव प्रबंधन तक में उनका बहुत ही अहम रोल था।
वी भगैय्या- ये संघ के ओबीसी चेहरे हैं। यह दक्षिणी राज्यों में संघ के विस्तार की जिम्मेदारी संभालते हैं। कई भाषाओं में पकड़ और ओजस्वी वक्ता होने के कारण यह अपनी बात आसानी से लोगों तक पहुंचाने में सक्षम हैं।
अरुण कुमार- ये संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख हैं। यह राष्ट्रीय मीडिया के सामने संघ का नजरिया रखते हैं। इन्होंने जम्मू-कश्मीर में भी संघ के विस्तार में बड़ी जिम्मेदारी निभाई है।












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