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क्यों खास है 105mm IFG, जिसने गणतंत्र दिवस पर ब्रिटिश पाउंडर गन की जगह ली

इस बार ब्रिटिश पाउंडर गन की जगह मेड इन इंडिया 105 एमएम एफईआजी से राष्ट्रपति को 21 तोपों की सलामी दी गई।

105 mm ifg

Republic Day Parade: गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार गरुड़ा 105 एमएम से 21 तोपों की सलामी दी गई। यह भारत की स्वदेशी बंदूक है जिसको लेकर काफी चर्चा हो रही है। गणतंत्र दिवस पर यूं तो हर साल 21 तोपों की सलामी 25 पाउंडर बंदूकों से दी जाती थी, लेकिन इस बार 105 एमएम आईएफजी स्वदेशी गन से 21 तोपों की सलामी दी गई। यह पूरी तरह से स्वदेशी गन है, जिसको लेकर काफी चर्चा हो रही है। यह गन क्यों इतनी खास है इसकी आज हम आपको विस्तार से जानकारी देंगे।

1972 में किया गया डिजाइन
इस गन को आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टैबलिश्मेंट ने 1972 में तैयार किया था। 1984 में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन गन कैरिज फैक्ट्री जबलपुर में शुरू किया गया था। इसके बाद से ही यह भारतीय सेना के साथ है। इस गैन के गोला-बारूद को को भारत में ही तैयार किया गया है। इसका उत्पादन अंबझारी और चंद्रपुर में स्थित फैक्ट्री में किया जाता है।

कई खासियत हैं पाउंडर गन वाली
इस गन में कई समानताएं ब्रिटिश L118 लाइट गन की ही तरह हैं। यह पहाड़ और अन्य मुश्किल जगहों पर आसानी से पहुंच सकती है। भारतीय फील्ड गन का वजन 3450 किलोग्राम है जबकि लाइट फील्ड गन का वजन 2380 किलोग्राम है। दोनों ही गन समान रफ्तार से फायरिंग कर सकती हैं। प्रति मिनट यह 4 राउंड की फायरिंग 20000 मीटर से 17400 मीटर की दूरी तक कर सकती हैं। प्रति मिनट यह गन 6 राउंड लगातार 10 मिनट तल फायर कर सकती है। यह लगातार एक घंटे तक फायरिंग कर सकती है।

360 डिग्री फायर करता है
इस गन की खासियत यह है कि इसे 360 डिग्री कहीं भी घुमाकर फायर किया जा सकता है। यह पूरी तरह से स्वदेशी तौर पर डिजाइन की गई है। यह गन काफी हल्की है, जिसकी वजह से इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है। यह गन अल्ट्रा लाइट लाइटवेट है। इस गन की डिजाइन इतनी सरल है कि इसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है और इसे इस्तेमाल करने के लिए कम लोगों की जरूरत होती है। इसे सिर्फ 6 लोग मिलकर इस्तेमाल कर सकते हैं।

पाउंडर गन का इतिहास
इस गन को इस्तेमाल करने के लिए 6 लोगों की जरूरत होती है। यह फील्डगन कम वजन की होती है और इसे हवा से चलाया जा सकता है। वहीं 25 पाउंडर गन की बात करें तो इसका इस्तेमाल 1965 और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में किया गया था। इन गन को काफी सटीक माना जाता था। लेकिन 1990 के बाद से इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया। 21 तोपों की सलामी की बात करें तो राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सैल्यूट के तौर पर दिया जाता है। इसे देते समय राष्ट्रगान लगातार बजता रहता है। इसकी फायरिंग में असल कार्टेज का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, बल्कि डमी कार्टेज का इस्तेमाल होता है, जिससे सिर्फ आवाज आती है।

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