पढिये- आखिर कैसे नेताजी के खुफिया दस्तावेज रूस से भारत के संबंध बिगाड़ सकते हैं
नई दिल्ली। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की खुफिया फाइलें क्या कभी सार्वजनिक हो पायेगी इस पर संदेह अभी भी बरकरार है। देशभर से नेताजी के दस्तावेजों को सार्वजनिक किये जाने की मांग के बाद भी एक के बाद एक केंद्र की सरकारों ने इस मामले में सिर्फ चुप्पी साधे रही।

देश में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने अपने हीरो नेताजी के बारे में कई रिसर्च और अध्ययन किये हैं। उन लोगों को अपने हीरो के बारे में जानकारी दिया जाना उनका अधिकार है। पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी वी बालाचंद्रन नेताजी के द्वीतिय विश्वयुद्ध के साथी एसीएन नांबियार की आत्मकथा लिख रहे हैं।
नांबियार नेताजी के साथ बर्लिन में उनके डेप्यूटी थे। बालाचंद्रन का कहना है कि ब्यूरोक्रैट नहीं चाहते हैं कि नेताजी के दस्तावेज सार्वजनिक किये जाये। उनका कहना है कि यह दस्तावेज भारत के रूस के साथ संबंधों को बिगाड़ सकते हैं।
वनइंडिया से एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान बालाचंद्रन ने ऐसा कुछ जरूर असहज है नेताजी की फाइलों में जो दोनों देशों के रिश्तों को में दखल डाल सकता है।
अंग्रेज नेताजी की जासूसी क्यों करा रहे थे?
नेताजी ने इस बात को महसूस किया था कि गांधीजी का आजादी के लिए अहिंसक आंदोलन अपने अंत की ओर था जिसका भारत को कोई फायदा होता नहीं दिख रहा था। उनका मानना था कि शांति के मार्ग से ही देश को आजादी नहीं दिलायी जा सकती है। ऐसे में देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने कई देशों से मदद की अपील की।
नेताजी ने इस बात को भी महसूस किया कि देश को आजाद कराने के लिए हमें किसी और रास्तें को अख्तियार करना चाहिए जिसके चलते उनका गांधी जी से मनमुटाव हुआ था। उनका मानना था कि अगर अन्य देशों की मदद नहीं ली जाती है तो देश को कभी भी आजाद नहीं कराया जा सकता है।
देश की आजादी के लिए उन्होंने एडोल्फ हिटलर के साथ भी संपर्क साधा, जिसने उन्हें भारत को आजादी दिलाने में मदद का आश्वासन दिया लेकिन वहीं हिटलर ब्रिटेन के साथ शांति समझौता भी करने की फिराक में था। इन सब कारणों के चलते अंग्रेजों ने बोस के उपर पूरी तरह निगरानी रखने का फैसला लिया था।
क्या भारत को इस बारे में जानकारी थी कि अंग्रेज नेताजी की जासूसी कर रहे हैं?
अंग्रेजों ने मुश्किल से ही किसी को इस बारे में कोई जानकारी दी थी। बोस ने सोवियत संघ से भी भारत की आजादी में मदद करने की अपील की थी। हालांकि बोस ना तो कम्युनिस्ट और ना ही नाजी विचारधारा का समर्थन करते थे। लेकिन बावजूद इसके उन्होंने जर्मनी और सोवियत संघ से भारत की मदद की अपील की थी।
नेताजी ने ऐसा सिर्फ इसलिये किया था क्योंकि वह किसी भी हाल में अंग्रेजों को हराना चाहते थे। इन सभी वजहों के चलते अंग्रेजों ने नेताजी की जासूसी का फैसला लिया। उस वक्त भारत ने बेशर्मी के साथ अंग्रेजों की इस नीति का समर्थन किया और उनके खुफिया दुश्मन हमारे भी दुश्मन बन गये।
नेताजी की जासूसी कैसे की गयी थी?
1919 से ही अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान रखा था। हमारे ब्यूरोक्रैट और आईबी जोकि अंग्रेजों से हमे विरासत में प्राप्त हुई है उसने अंग्रजों की इस नीति का 1975 तक अनुसरण किया। 1975 में इंदिरा गांधी ने आईबी को कम्युनिस्ट और पर कड़ी निगरानी रखने का निर्देश दिया था जिस मीटिंग में मैं खुद भी मौजूद था।
नेताजी की जासूसी अप्रैल 1924 से शुरु हो गयी थी। 1922 में भारत के क्रांतिकारी अबानी मुखर्जी को भारत में कम्युनिस्ट की अगुवाई के लिए भेजा गया था। नेताज की आत्मकथा के लेखक पूर्बी रॉय का कहना है कि उन्होंने तकरीबन 11 महीने कोलकाता में गुजारे थे और इस दौरान उन्होंने नेताजी और चितरंजन दास से मुलाकात की थी।
वहीं नेताजी के पड़पोते भतीजे अमीय बोस ने भई अपने ब्लॉग में इस बात का जिक्र किया है कि कम्युनिस्ट नेता सोली बाटलीवाला जिनका नेताजी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध था उन्होंने 1939 में एक पत्र लिखकर सोविय संघ की मदद की बात कही थी। लेकिन इन सब बातों की असल तस्वीर तभी सामने आ सकती है जब भारत में नेताजी से जुड़े खुफिया दस्तावेज सार्वजनिक किये जाए। टीवी पर होने वाली तेज आवाज की बहस मात्र से यह संभव नहीं होने वाला है।
नेताजी के बारे में कई दस्तावेज और किताबों को पढ़ने के बाद नेताजी की मौत के बारे में आपका क्या मानना है?
आज भी यह एक बड़ा रहस्य है कि नेताजी की मौत कैसे हुई थी। एक तरफ जहां सरकार का कहना है कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई थी, लेकिन सरकार के इस दावे के खिलाफ कई सवाल ऐसे हैं जो कई सवाल खड़े करता है।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था और बोस को इस बात का अंदाजा था ऐसे समय में जापान की मदद लेने का कोई मतलब नहीं था। ऐसे हालात में उन्होंने सोवियत संघ ही एक ऐसा देश था जो पश्चिम देशों के खिलाफ मजबूती से खड़ा था, ऐसे में नेताजी ने सोविय संघ से मदद मांगी।
नेताजी की विमान हादसे में मौत पर सवाल इसीलिए उठते हैं क्योंकि नेताजी हवाई रास्ते से नहीं बल्कि सड़क मार्ग से सोवियत संघ गये थे। बोस ने अपने डेप्यूटी नांबियार को कहा था कि हमें पश्चिम देशों के सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए बल्कि सोवियत संघ से मदद मांगनी चाहिए। नेताजी हर हाल में भारत को आजाद कराना चाहते थे।
भारत सरकार को नेताजी की मौत को विमान हादसा बताने की क्यों जल्दी थी?
इस बात को समझने के लिए हमें सोवियत संघ की कुछ संदेहासस्पद गतिविधियों पर नजर डालने की जरूरत है। नेताजी की इस मौत की कहानी के पीछे सोवियत संघ के कुछ खुफिया तत्वों का हाथ हो सकता है। जिसके चलते भारत सरकार ने आनन-फानन में नेताजी को विमान हादसे में मृत घोषित कर दिया।
क्या नेताजी के दस्तावेज कभी सार्वजनिक होंगे?
मेरा मानना है कि भारत के ब्यूरोक्रैट नहीं चाहते हैं कि ये दस्तावेज सार्वजनिक किये जाए। कोई भी राजनीतिक कभी भी उनकी इस राय को दरकिनार नहीं करना चाहता है कि इस खुलासे के बाद देस में समस्या काफी बढ़ सकती है। बोस आज भी महान हीरो के रूप में देखे जाते हैं। यही नहीं जब बोस को देश के विभाजन के बारे में पता चला तो वह वापस भारत आना चाहते थे ताकि वह इसे रोक सके।












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