राज्यसभा: ध्वनि मत की प्रक्रिया क्या है और कैसे होती है वोटिंग
सोमवार को राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होने के साथ जो ख़बर सबसे पहले सामने आई वो ये थी कि राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने नियमों का हवाला देते हुए उपसभापति हरिवंश के ख़िलाफ़ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया.
साथ ही उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने अनुशासनहीनता के आरोप में राज्यसभा के आठ सदस्यों को सत्र के बाक़ी समय के लिए निलंबित कर दिया. ये सदस्य हैं- डेरेक ओ ब्रायन, संजय सिंह, राजू सातव, केके रागेश, रिपुन बोरा, डोला सेन, सैय्यद नासिर हुसैन और इलामारन करीम.
वेंकैया नायडू ने कहा, "कल राज्यसभा के लिए बुरा दिन था. कुछ सदस्य सभापति के आसन के सामने चले आए थे. उपसभापति को डराया गया. उन्हें उनके कर्तव्य पालन से रोका गया. ये दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है. मेरी सांसदों से अपील है कि उन्हें इसका आत्मावलोकन करना चाहिए."
दरअसल, रविवार को केंद्र सरकार ने राज्यसभा में कृषि बिल पेश किया और सदन में इस पर हुई चर्चा ने बाद में हंगामे की शक्ल ले लिया.
केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार की ओर से लाए गए प्रस्तावित कृषि सुधार क़ानूनों के विरोध में एक तरफ़ हरियाणा और पंजाब में किसान सड़क पर थे तो दूसरी तरफ़ राज्यसभा में कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी पार्टियां भी इसका पुरज़ोर विरोध कर रही थीं.
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क्यों हुआ राज्यसभा में हंगामा?
विपक्षी सांसदों की ये माँग थी कि विधेयक पारित किए जाने और संसद की सेलेक्ट कमेटी को दोनों विधेयक भेजे जाने के लिए विपक्ष की तरफ़ से लाए गए प्रस्ताव पर फ़ैसला मत विभाजन के ज़रिए लिया जाए.
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ सभापति के आसन पर बैठे उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने विपक्षी सांसदों की माँग पर विचार नहीं किया और विधेयक को ध्वनि मत से पारित किए जाने की घोषणा कर दी.
इस पर इन विधेयकों पर चल रही बहस हंगामे में बदल गई और तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में कुछ विपक्षी सांसद नारेबाज़ी करते हुए सभापति के पोडियम पर चढ़ गए. हंगामा और नारेबाज़ी कर रहे सांसदों में तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वामपंथी दलों के सांसद थे.
विपक्षी सांसदों की ये माँग भी थी कि रविवार को निर्धारित समय के पूरा हो जाने के बाद सदन की कार्यवाही रोक दी जाए और कृषि विधेयकों पर कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के जवाब पर बहस सोमवार को की जाए. चेयर पर बैठे उपसभापति ने विपक्ष की ये माँग भी नहीं मानी.
विपक्षी सांसदों का कहना है कि उपसभापति का फ़ैसला पक्षपातपूर्ण, अभूतपूर्व और ग़ैरक़ानूनी था और विपक्ष की आवाज़ दबाई जा रही है. हरिवंश पर लाया गया अविश्वास प्रस्ताव भी इसी सिलसिले में था.
निशाने पर हरिवंश और क्या कहते हैं नियम?
उपसभापति हरिवंश जिस फ़ैसले को लेकर विपक्षी सांसदों के निशाने पर थे, वो ध्वनि मत से विधेयक को पारित कराये जाने का निर्णय था.
पत्रकारिता की सीढ़ियों से होकर राज्यसभा के उभासपति पद पर दूसरी बार पहुंचने वाले हरिवंश पर इस फ़ैसले के लिए अलोकतांत्रिक होने का आरोप लग रहा है.
लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर राज्यसभा के उपसभापति के संवैधानिक अधिकार क्या हैं.
संविधान के अनुच्छेद 89 (2) में इसका प्रावधान किया गया है. अनुच्छेद 91(1) कहता है कि राज्यसभा के उपसभापति की ग़ैरमौजूदगी में उनकी हर ज़िम्मेदारी उपसभापति निर्वाह करेंगे.
अनुच्छेद 91(2) के अनुसार सदन की कार्यवाही के दौरान अगर सभापति ग़ैरमौजूद हों तो उपसभापति सदन के कामकाज से जुड़े नियमों पर फ़ैसला लेने के अधिकृत हैं.
अनुच्छेद 92(1) कहता है कि अगर सभापति या उपसभापति को पद से हटाने से जुड़ा कोई प्रस्ताव विचाराधीन हो तो वे सदन के कामकाज की अध्यक्षता नहीं करेंगे.
अगर उपसभापति हरिवंश के ख़िलाफ़ विपक्षी सांसदों की ओर से लाया गया अविश्वास प्रस्ताव मंज़ूर कर लिया गया होता तो वे प्रस्ताव के लंबित रहने तक सदन की अध्यक्षता नहीं कर पाते.
ध्वनि मत की प्रक्रिया
संसदीय लोकतंत्र में आम तौर पर फ़ैसले वोटिंग के ज़रिए लिए जाते हैं. संसद में इसे 'डिविज़न' या विभाजन कहा जाता है यानी किसी मुद्दे पर सदन की राय क्या है, इसका फ़ैसला बहुमत के वोट से तय होता है.
राज्यसभा के कामकाज से जुड़े रूल 252 से 254 तक में 'डिविज़न ' के चार अलग-अलग तरीक़ों का प्रावधान है. दो प्रक्रियाओं में सांसदों के मत दर्ज नहीं किए जाते हैं जबकि बाक़ी दो तरीक़ों में किस सांसद ने क्या वोट दिया, ये राज्यसभा के रिकॉर्ड में स्थाई रूप से दर्ज किया जाता है.
पहला तरीक़ा है ध्वनि मत, दूसरा है काउंटिंग, तीसरा है ऑटोमैटिक वोट रिकॉर्डर के ज़रिए मत विभाजन और चौथा तरीक़ा है लॉबी में जाकर पक्ष या विपक्ष में खड़े होना.
रूल 252 पहले दो तरीक़ों से जुड़ा हुआ है. किसी मुद्दे या विधेयक पर बहस ख़त्म हो जाने के बाद सदन की अध्यक्षता कर रहे सभापति या उपसभापति या कोई अन्य पीठासीन अधिकारी सांसदों से ये पूछते हैं कि कौन लोग इसके पक्ष में हैं और कौन विपक्ष में और इसके आधार पर सभापति अपना फ़ैसला सुनाते हैं. काउंटिंग के ज़रिए मत विभाजन का फ़ैसला पूरी तरह से सभापति के विवेक पर निर्भर करता है.
रूल 253 और रूल 254 के अनुसार सभापति चाहें तो ऑटोमैटिक वोट रिकॉर्डर या फिर सांसदों को लॉबी में खड़ा करके उनके वोट रिकॉर्ड कर सकते हैं.
क़ानूनी सवाल और कोर्ट का विकल्प
कृषि विधेयक के मुद्दे पर सांसदों की माँग मत विभाजन की थी जिसे अनसुना कर दिया गया. ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या सभापति सांसदों की माँग मानने के लिए बाध्य हैं?
हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं, "सभापति सांसदों की माँग मानने के लिए बाध्य नहीं हैं. सदन के कामकाज से जुड़े नियम उनके विशेषाधिकार के तहत आते हैं. लेकिन अगर सभापति अपने अधिकार का मनमाने तरीक़े से इस्तेमाल करते हैं तो उनके फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है और सुप्रीम कोर्ट को इस मामले पर सुनवाई करने का अधिकार है."
अमूमन सदन में ये देखा गया है कि महत्वपूर्ण मुद्दों और विधेयकों पर ध्वनि मत से सदन का फ़ैसला सामने आता है और सांसद जब मत विभाजन की माँग करते हैं तो सभापति को इस पर फ़ैसला करना होता है.
प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं, "सांसद ज़्यादातर मौक़ों पर मत विभाजन की माँग करते हैं. विपक्षी ख़ेमे में भले ही चंद लोग हैं लेकिन फिर भी वे मत विभाजन की माँग करते हैं. सदन के कामकाज से जुड़े नियमों में इस बारे में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि किस मुद्दे पर मत विभाजन कराया जाएगा और किस पर नहीं."
संविधान का अनुच्छेद 121 कहता है कि संसद में महाभियोग के प्रस्ताव को छोड़कर किसी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज के कामकाज पर कोई चर्चा नहीं होगी. इसके साथ ही अनुच्छेद 122 में ये प्रावधान है कि संसद के कामकाज की वैधता को प्रक्रियाओं की कथित अनियमितताओं के आधार पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है.
तो उपसभापति हरिवंश के फ़ैसले को कोर्ट में कैसे चुनौती दी जा सकेगी?
चंचल कुमार सिंह कहते हैं, "भूमि अधिग्रहण क़ानून के वक़्त स्पीकर ने अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए इसे मनी बिल क़रार दे दिया था और स्पीकर के इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी गई थी. जहां संविधान और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन हो रहा हो, वहां इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है."
अब विपक्ष को ये तय करना है कि कृषि विधेयक का मुद्दा लेकर वे कोर्ट जाते हैं या फिर सड़क पर. हालांकि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि वो कृषि विधेयक को अदालत में चुनौती देंगे.
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