राजस्थान की दिलचस्प राजनीति, जानिए आखिर क्यों अशोक गहलोत, भाजपा, सचिन पायलट नहीं कर रहे फ्लोर टेस्ट की मांग
नई दिल्ली। राजस्थान में चल रहे सियासी संकट के बीच प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राज्यपाल कलराज मिश्र के बीच लगातार तनाव बरकरार है। मुख्यमंत्री आरोप लगा रहे हैं कि राज्यपाल रिमोट से चल रहे हैं और संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर रहे हैं, जबकि कलराज मिश्र इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रहे हैं। प्रदेश में गहलोत सरकार बहुमत में है या नहीं इसको लेकर पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट का खेमा पहले ही सवाल खड़ा कर चुका है। कांग्रेस के खेमे के भीतर चल रहे इस सियासी संग्राम पर भाजपा अपनी पैनी नजर बनाए हैं। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि प्रदेश में फ्लोर टेस्ट की ना तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ना ही भाजपा और ना ही सचिन पायलट ने मांग की है, जोकि राजस्थान के सियासी संग्राम को और भी दिलचस्प बना रहा है।
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आखिर क्यों कोई भी पक्ष फ्लोर टेस्ट की बात नहीं कर रहा
मंगलवार को मुख्यमंत्री गहलोत की कैबिनेट ने एक बार फिर से राज्यपाल के पास प्रस्ताव भेजा है। एक हफ्ते के भीतर गहलोत सरकार की ओर से राज्यपाल को यह तीसरा प्रस्ताव भेजा गया है, जिसमे मांग की गई है कि 31 जुलाई को विधानसभा का सत्र बुलाया जाए। लेकिन तीनों ही प्रस्ताव को राज्यपाल ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है। लेकिन राज्यपाल की ओर से यह सवाल जरूर पूछा गया है कि क्या सरकार सदन में विश्वास मत साबित करना चाहती है। प्रदेश में जबसे सियासी संकट शुरू हुआ है उसके बाद गहलोत लगातार दावा कर रहे हैं कि उनके पास पूर्ण बहुमत है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर जब गहलोत के पास बहुमत है तो आखिर क्यों वह सदन में बहुमत साबित करने से कतरा रहे हैं और राज्यपाल को भेजे अपने प्रस्ताव में विश्वास मत का जिक्र नहीं कर रहे है, आखिर वह सदन को बुलाने के पीछे के अपने एजेंडे को साफ क्यों नहीं कर रहे हैं। आखिर में इन सब के पीछे कांग्रेस की क्या रणनीति है।

कांग्रेस-गहलोत सरकार की रणनीति
कांग्रेस और अशोक गहलोत के खेमे का तर्क है कि सरकार और विधानसभा इस बात को तय करेगी कि उसका क्या एजेंडा होगा, ऐसे में राज्यपाल इसको लेकर सवाल नहीं खड़ा कर सकते हैं और नाह ही इस मामले में हस्तक्षेप कर सकते हैं क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनके पास सत्र बुलाने के संबंध में उसके पास कोई विवेकाधीन शक्तियां नहीं हैं। राज्यपाल इस तरह के सवाल पूछकर सिर्फ सत्र बुलाने में देरी करना चाहते हैं। अगर एक बार फिर से राज्यपाल प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं तो माना जा रहा है कि कांग्रेस राज्यपाल को हटाने की मांग कर सकती है।

कांग्रेस किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती
वहीं इस पूरे मामले में कांग्रेस के रुख की बात करें तो पार्टी की ओर से अभी तक इसको लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता का कहना है कि अगर हम सत्र बुलाने की वजह बताते हैं तो राज्यपाल कह सकते हैं कि फ्लोर टेस्ट के लिए प्रस्ताव पेश करिए, वह हमे 10-15 दिन का नोटिस दे सकते हैं। आखिर हम ऐसा क्यों करें, ऐसा करने की कोई भी बाध्यता नहीं है। कांग्रेस नेता का कहना है कि मुख्यमंत्री को पारंपरिक तरीके से बहुमत साबित करने की जरूरत नहीं है। वह ऐसा किसी भी तरीके से कर सकते हैं, इसको लेकर एक व्हिप भी जारी किया जा सकता है। कांग्रेस की ओर से इसको लेकर 2016 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया है जोकि नबाम रेबिया और बमांग फेलिक्स बनाम अरुणाचल प्रदेश के डेप्युटी स्पीकर केस में दिया गया है। कांग्रेस का तर्क है कि अगर मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के पास सदन में बहुमत है तो राज्यपाल सरकार और कैबिनेट के सुझाव से ही सदन में सरकार के बहुमत को लेकर अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

पायलट खेमे की रणनीति
वहीं सचिन पाायलट खेमे की बात करें तो सचिन पायलट के साथ 18 विधायकों का समर्थन है, जोकि राजस्थान हाई कोर्ट में निलंबन नोटिस के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। पायलट का खेमा सदन बुलाने के सवाल पर चुप्पी साधे हुए है। चूंकि उन्हें कांग्रेस द्वारा निष्कासित नहीं किया गया है, इसलिए इन विधायकों के लिए विधानसभा सत्र को रोकना या गहलोत सरकार के खिलाफ मतदान करना पार्टी के व्हिप का उल्लंघन होगा, जिसके चलते उन्हें अयोग्य करार किया जा सकता है। लेकिन पायलट खेमे का दावा है कि अशोक गहलोत सरकार के पास बहुमत नहीं है, यही वजह है कि गहलोत सरकार सदन में विश्वास मत साबित करने की बात नहीं कर रही है। यही नहीं सचिन पायलट का कहना है कि गहलोत सरकार ने राज्यपाल को विधायकों की सूचि भी नहीं दी है, जिनका उनके पास समर्थन है। वहीं गहलोत का कहना है कि राज्यपाल से मुलाकात के बाद पिछले हफ्ते उन्होंने विधायकों के समर्थन की लिस्ट दी है। जिसके बाद सचिन पायलट की ओर से कहा गया कि आखिर इस लिस्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।

पायलट खेमे की उम्मीद
पायलट खेमे का मानना है कि सीपीएम के दो विधायकों ने सरकार को समर्थन देने का आश्वासन नहीं दिया है। बीटीपी के तीन विधायकों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा पायलट खेमा बसपा के 6 विधायकों के फैसले पर भी निर्भर कर रहा है, जिनकी बर्खास्तगी को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट में केस दर्ज किया गया है। इन सभी 6 विधायकों ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था लेकिन बाद में ये सभी कांग्रेस में शामिल हो गए थे। जिसके बाद बसपा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और कोर्ट में कहा है कि राष्ट्रीय पार्टी का विलय एक अन्य राष्ट्रीय पार्टी में नहीं हो सकता है।

आखिर क्या है भाजपा की रणनीति
अब बात आती है कि आखिर विधानसभा में भाजपा विश्वास मत की मांग क्यों नहीं कर रही है। भाजपा ने अभी तक फ्लोर टेस्ट की मांग नहीं की है। सामान्य तौर पर इस तरह की मांग विपक्ष की ओर से की जाती है कि सरकार के पास बहुमत नहीं है, लिहाजा उसे सदन में अपना बहुमत साबित करना चाहिए। भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की थी, लेकिन इस दौरान फ्लोर टेस्ट की मांग नहीं की गई थी। मुलाकात के दौरान भाजपा नेताओं ने तर्क दिया था कि सरकार के मंत्रिमंडल का यह अधिकार है कि वह राज्यपाल को पत्र लिखकर विधानसभा सत्र बुलाए जाने की मांग करे, हम इसके लिए दबाव नहीं डाल सकते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा इस उम्मीद पर टिकी है कि यह पूरा संकट जितना लंबा खिंचेगा उतना ही उसको इसका लाभ होगा, मुमकिन है कि इस दौरान गहलोत के कुछ विधायक उनके साथ आ सकते हैं। मौजूदा समय की बात करें तो राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा फिलहाल पर्दे के पीछे से ही अपनी चाल आगे बढ़ा रही है। वहीं कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही है कि जिस तरह से राज्यपाल ने रुख अख्तियार किया है और हरीश साल्वे, मुकुल रोहतगी जैसे वकील सचिन पायलट के लिए कोर्ट में खड़े हो रहे हैं, बागी विधायक भाजपा शासित राज्य में ठहरे हैं, यह सब इस बात की ओर इशारा करता है कि इस पूरे खेल के पीछे भाजपा का हाथ है।
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