यात्रियों के पान-गुटखे के पीक साफ करने में खर्च होते हैं इतने करोड़ रुपए, रेलवे ने खोजा अनोखा उपाय
नई दिल्ली, 13 अक्टूबर। हर दिन लाखों यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचने वाली ट्रेन हर आम आदमी की जिंदगी का अहम हिस्सा। देश भर में फैली पटरियों पर सरपट भागती ट्रेन के जरिए हम कुछ घंटों की यात्रा करके देश के एक कोने से दूसरे कोने में बर्थ पर लेटे हुए आसानी से पहुंच जाते है। वहीं कोरोन काल में मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई हो या हालिया कोयला संकट में ये ट्रेन ही मददगार संसाधन होती है। लेकिन हम यात्री एक टिकट खरीदकर मान लेते हैं कि उसके मालिक बन गए है और ट्रेन की बर्थ हो या बाथरूम या ट्रेन की पटरिया यात्री मनचाही जगह पर पान और गुटखे की पीक थूकते है और खूब गंदगी करते है।

लाख कोशिशों के बावजूद यात्री नहीं सुधरे हैं तो रेलवे ने अपनी ट्रेन, रेलवे स्टेशन और पटरियों को पान और पान मसाले की पीक से छुटकारा पाने के लिए एक नया उपाय प्रयोग करने जा रही है। रेलवे भी गुटखे के निशान ही नहीं, पटरियों की साफ-सफाई और हाथियों के ट्रेन के साथ होने वाले हादसे से बचाव के लिए बड़े ही नायाब प्रयोग किए हैं।
जानें एक साल में पान की पीक साफ करने में रेलवे कितने खर्च करता है रुपये
आपको शायद ही अंदाजा होगा कि रेलवे गुटखे के निशान मिटाने में करोड़ों रुपये खर्च करता है। अनुमान के अनुसार भारतीय रेलवे हर साल यात्रियों के केवल पीक के दाग मिटाने के लिए 1200 करोड़ रुपये और अथाह पानी खर्च करता है। रेलवे का लाखों लीटर पानी केवल पान और गुटखों के दाग छुड़ाने में बर्बाद होते हैं।
जेब में रखने वाला यात्रियों को स्टेशन पर मिलेगा ये थूकदान
कोरोना काल में यात्रियों के थूक से संक्रमण होने का खतरा अत्यधिक है। लाख पाबंदियों के बाद भी लोग सुधरे नहीं है। इन दागों से छुटकारा पाने के लिए रेलवे नया रास्ता खोज निकाला है। रेलवे ने यात्रियों के लिए ऐसा बायोडीग्रेडेबल थूकदान उपलब्ध करवाने वाला है जिसे जेब में रखा जा सकेगा। जिसका प्रयोग यात्री बाद में भी कर सकेंगे। इस थूकदान में बीज शामिल है, तो जब इसे डिस्पोज किया जाएगा उस जगह पर कुछ समय बाद पेड़ निकल आएगा। रेलवे ने 42 स्टेशनों पर वेंडिंग मशीन और कियोस्क लगाए हैं जहां ये स्पेशल थूकदान 5 से 10 रुपये में बेचे जाएंगे।
हाथियों को ट्रेन की चपेट में आने के लिए शुरू किया गया था ये प्लान
वहीं रेल मंत्री पियूष गोयल ने ट्रेन से हाथियों के एक्सीडेंट बचाने के बारे में रेलवे की प्लानिंग शेयर की है। पियूष गोयल ने कहा 'एक सुबह प्रधानमंत्री ने मुझे एक अनोखा सुझाव दिया। उन्होंने सुना था कि हाथी, मधुमक्खियों से डरते हैं और उनकी आवाज से भागते हैं. उन्होंने मुझसे इस बारे में देखने के लिए कहा कि क्या पटरियों पर हाथियों के साथ दुर्घटनाओं को कम करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। पटरियों पर से हाथियों को हटाने के लिए मुधमक्खियों की आवाज का इस्तेमाल कर 'प्लान बी' की पहल की गई थी। नवंबर 2017 में भारतीय रेलवे ने नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवेज (NFR) में हाथियों को ट्रेन की चपेट से बचाने के लिए ये प्लान बी शुरू किया था। जिसके बाद 2017 से लेकर मई 2021 हाथियों से होने वाले रेल एक्सीडेंट कम हुए है। यात्रियों के साथ हाथी भी सुरक्षित हुए है। अब तक 950 से ज्यादा हाथियों की जान सुरक्षित हुई है।
पटरियों पर हाथ से सफाई के बजाए मशीन से हो रही सफाई
वहीं रेलवे पटरियों की गंदगी साफ करने के लिए विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय ने 5 अप्रैल 2021 में वाहन तैयार किए थे। ये तैयार किया गया मल्टीफंक्शनल रेलवे ट्रैक स्कैवेंजिग व्हीकल सूखे और गीले सक्शन सिस्टम, हवा और पानी छिड़कने वाले नॉजल, कंट्रोल सिस्टम समेत अन्य सुविधाएं है। इसमें मैन पॉवर भी बहुत कम लगता है। ड्राइवर के साथ इसमें एक और सफाई कर्मचारी की जरूरत होती है।












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