अफ्रीकी चीतों को भारत लाना सही था? प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक और वन्यजीव विशेषज्ञ ने क्या कहा, जानिए
इस हफ्ते भारत ने महत्वाकांक्षी चीता प्रोजेक्ट के तहत अफ्रीका से लाए गए नौवां चीता खो दिया है। नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 6 चीतों और उनके तीन बच्चों की मौत हो चुकी है। इस प्रोजेक्ट को लेकर बहुत तरह की बातें हो रही हैं। हालांकि, केंद्र सरकार इन घटनाओं को लेकर बहुत ही संजीदा लग रही है।
इस बीच ईटी ने इस चीता प्रोजेक्ट से लंबे समय तक जुड़े रहे प्रमुख वैज्ञानिक वाईके झाला से जो इसके बारे में बात की है, उससे कई सारी गलतफहमियां दूर हुई हैं। उम्मीद की किरण ये भी मिली है कि इनकी मौतों की समस्या का समाधान हो सकता है।

'चीतों को भारत लाने का आइडिया बहुत ही अच्छा'
चीतों की मौत के बाद इस प्रोजेक्ट पर कई तरह के सवाल उठ रहे है। लेकिन वाईके झाला का कहना है कि 'अफ्रीकी चीतों को भारत लाने का आइडिया बहुत ही अच्छा है। भारतीय और अफ्रीकी चीता एक ही प्रजाति के हैं। भारत ने वह सारे कारणों का समाधान किया, जिसकी वजह से देश से चीता विलुप्त हो गए थे। इसके पास पर्याप्त संरक्षित क्षेत्र है, आर्थिक क्षमता है, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक क्षमता है। इकोसिस्टम को बचाने के लिए विलुप्त हुई प्रजाति को फिर स्थापित करना बेहतरीन तरीका है।' झाला इस साल फरवरी तक इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहे हैं।
'प्रोजेक्ट से जुड़ी सारी चिंताएं गलत साबित हुईं'
एक सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या चीतों को लाने से पहले जितने भी वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता थी, वह पूरी की गई थी। सुप्रीम कोर्ट तक चीतों की मौत पर चिंता जता चुका है। झाला के मुताबिक आलोचको ने इस प्रोजेक्ट की सफलता को लेकर जो भी सवाल उठाए थे, वह गलत साबित हो चुके हैं। सभी अफ्रीकी चीते भारतीय शिकारों का शिकार करने में सफल रहे हैं।
'एक भी चीते को तेंदुए ने नहीं मारा है और न ही जख्मी कर पाया है। शिकारियों और देशी कुत्तों के शिकार बनने की तमाम आशंकाएं भी खारिज हो चुकी हैं। यही नहीं कूनो नेशनल पार्क से बाहर इन्होंने सिर्फ एक बछड़े को मारा है, इसलिए स्थानीय लोगों के साथ इनके संघर्ष की आशंकाएं भी बेवजह की साबित हुई हैं।'
जहां तक 9 चीतों की मौत की बात है तो झाला का कहना है कि दुख की बात यही है कि एक भी चीते तेंदुए या शिकारियों की वजह से नहीं मरे हैं। उनके मुताबिक 'ये मौतें इनके प्रबंधन और निगरानी' से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि जमीनी स्तर पर 'प्रशिक्षित और अनुभवी' लोगों को तैनात किया जाना चाहिए था। 'मौके पर सीखने' के लिए कोई जगह नहीं है।
जब भी दूसरे जीव को कहीं बाहर से लाएंगे तो कुछ मृत्यु होंगी-वन्यजीव विशेषज्ञ
ओआई ने इस पूरे मसले पर गुजरात कैडर के भारतीय वन सेवा के रिटायर्ड अधिकारी अरुण कुमार मिश्रा से खास बात की। उन्होंने कहा कि ग्राउंड स्टाफ कर नहीं पाए इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। दूसरी प्रजातियों को तो वह देखते ही रहे हैं। वे बोले, "जब भी दूसरे जीव को कहीं बाहर से लाएंगे तो कुछ मृत्यु होंगी। एक इंसान ही है जिसकी अनुकूलन क्षमता बहुत ज्यादा है, जो कहीं भी रह सकते है। बाकी जानवरों की कुछ सीमाएं होती हैं...."
मौत का कारण बाहरी नहीं, आतंरिक है-रिटायर्ड आईएफएस
उनके मुताबिक, "चीते लाए गए, उन्हें भारत में फिर से स्थापित करने की कोशिश की गई है, यह बहुत ही अच्छा कदम है।" यही नहीं, "हर जानवर की कुछ सीमाएं हैं। आप जब उसे नई जगह पर लाते हैं तो मृत्यु की संभावनाएं निश्चित तौर पर रहती हैं। धीरे-धीरे लोग भी नए अनुभव प्राप्त करेंगे। भारत में दो-तीन पीढ़ी के लोगों ने चीता देखा ही नहीं था। यह स्वाभाविक है। मौत का कारण बाहरी नहीं, आतंरिक है। धीरे-धीरे वे भी नई परिस्थितियों में एडजस्ट होते जाएंगे। बाकी अगर बचते हैं तो भविष्य के लिए यह बहुत अच्छा है।"
इस प्रोजेक्ट में हम पूरी गंभीरता से लगे हैं, हर चीते की हमें चिंता है- केंद्रीय मंत्री
केंद्रीय वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी वही बातें कही हैं, जो वन्यजीव विशेषज्ञ ने वनइंडिया को बताया है। उनके मुताबिक इस प्रोजेक्ट से जुड़े सभी लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं, 'यह पहला साल है, जब चीतों का ट्रांसलोकेशन हुआ है....यहां की मौसमी परिस्थितियां, उसके प्रभाव, उन सब चीजों पर लगातार कार्य चल रहा है....नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के एक्सपर्ट से भी राय साझा की जाती है....हम विश्वास दिलाना चाहते हैं कि इस प्रोजेक्ट में हम पूरी गंभीरता से लगे हैं....हर चीते की हमें चिंता है....कूनो के लोगों की भी भावना है.....हम चाहेंगे कि यह प्रोजेक्ट सफल हो....यह लंबा प्रोजेक्ट था...जिसमें हर वर्ष चीते आने हैं, इसकी संवेदनशीलता को हम स्वीकार करते हैं...। '












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