लोकसभा चुनाव 2019: टीकमगढ़ लोकसभा सीट के बारे में जानिए

नई दिल्ली: मध्यप्रदेश की टीकमगढ़ लोकसभा सीट से मौजूदा सासंद भाजपा के वीरेन्द्र कुमार खटीक हैं। वो लगातार दो बार इस सीट से सांसद रहे हैं। साल 2014 के चुनाव में यहां पर नंबर 2 पर कांग्रेस, नंबर 3 पर सपा और नंबर 4 पर बसपा थी। उस साल यहां कुल वोटरों की संख्या 15 लाख 29 हजार 3 थी, जिसमें से मात्र 7 लाख 66 हजार 321 लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया था। इसमें पुरुषों की संख्या 4 लाख 66 हजार 689 और महिलाओं की संख्या 2 लाख 99 हजार 632 थी। टीकमगढ़ की 95 प्रतिशत आबादी हिंदू और 3 प्रतिशत आबादी इस्लाम धर्म में भरोसा करती है, यहां सबसे ज्यादा अनुसूचित जनजाति के वोटर्स हैं तो वहीं यादव, ठाकुर वोटर्स का भी यहां अच्छा ख़ासा प्रभाव है।

profile of Tikamgarh lok sabha constituency

टीकमगढ़ लोकसभा सीट का इतिहास

आठ विधानसभा सीटों वाले टीकमगढ़ जिले को पहले 'टेहरी' कहा जाता था, जो अब 'पुरानी टेहरी' के नाम से पहचाना जाता है, वैसे टीकमगढ़ जिला बुंदेलखंड क्षेत्र का एक हिस्सा है, यहां की आबादी 23,00,287 है जिसमें से 77 प्रतिशत आबादी गांवों में निवास करती है जबकि 22 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में रहती है। साल 2008 में हुए नए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट को अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित रखा गया है। पूरे टीकमगढ़ जिले को कवर करने वाली यह सीट छतरपुर के कुछ हिस्सों तक भी फैली हुई है। साल 2009 में हुए चुनाव में भाजपा ने यहां जीत का परचम लहराया और डॉ. वीरेन्द्र खटीक यहां से सांसद चुने गए। साल 2014 के चुनाव में भी उन्हीं का इस सीट पर राज रहा। उनकी सफलता का इनाम ये है कि उन्हें मोदी कैबिनेट में राज्यमंत्री बनाया गया। बताते चलें कि वीरेंद्र कुमार ने सागर संसदीय सीट से 1996 में 11वीं लोकसभा का चुनाव पहली बार जीता था। उसके बाद उन्होंने 12वीं, 13वीं और 14वीं लोकसभा में सागर का प्रतिनिधित्व किया और साल 2009 और साल 2014 में वो टीकमगढ़ से जीतकर लोकसभा पहुंचे।

डॉ. वीरेन्द्र खटीक का लोकसभा में प्रदर्शन

दिसंबर 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 5 सालों में लोकसभा में डॉ. वीरेन्द्र खटीक की उपस्थिति 96 प्रतिशत रही है और इस दौरान उन्होंने 157 डिबेट में हिस्सा लिया और 351 प्रश्न पूछे।

गौरतलब है कि टीकमगढ़ सीट में बुंदेलखंड अंचल का वो हिस्सा भी शामिल है जो अब तक आर्थिक और सामाजिक पिछडे़पन, सामंतवादी तानेबाने और दलितों पर होने वाले अत्याचार के लिए ज्यादा चर्चा में रहा है। यहां की चुनावी राजनीति में जाति, धन और बाहुबल की भूमिका को भी अहम माना जाता रहा है। यह बात भी कम रोचक नहीं है कि पिछड़े और उपेक्षित होने के बावजूद बुंदेलखंड अंचल की जनता ने चुनाव लड़ने और वोट डालने में हमेशा बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया है।

पिछले दस सालों से यहां भाजपा का राज है, बावजूद इसके यहां विकास की गति काफी धीमी है, बुंदेलखंड का यह इलाका हमेशा से ही पानी की समस्या से जूझता रहा है जिसका कोई स्थायी समाधान आज तक नहीं निकला है, ऐसे मे विकास के नाम पर वोट मांगने वाली बीजेपी को क्या यहां की जनता एक बार फिर से मौका देगी, वो भी तब जब विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार हुई है तो वहीं इस सीट को जीतने के लिए कांग्रेस की रणनीति क्या होगी, यही सवाल हर किसी के जेहन में इस वक्त घूम रहा है, जिसका जवाब हमें चुनावी नतीजे देंगे।

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