जगन्नाथ मिश्र: जब लोग उन्हें कहने लगे थे मौलाना जगन्नाथ, इंदिरा भी हो गईं थी नाराज

पटना। जगन्नाथ मिश्र बिहार में कांग्रेस के आखिरी मुगल थे। बहादुरशाह जफर की तरह उन्होंने सत्ता के पतन और पार्टी के पराभव को बहुत संजीदगी से महसूस किया। वे बिहार में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री थे। उन्होंने करीब चालीस साल से सत्ता में रहने वाली कांग्रेस को टूटते, बिखरते और बेजान होते देखा। आपातकाल के दौर के बाद वे बिहार कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेता थे। लेकिन बदलते वक्त ने उन्हें जदयू का नेता बना दिया था। वे मूल रूप से विद्वान शिक्षक थे। जनवरी 1975 में बड़े भाई ललितनारायण मिश्र की हत्या की वजह से उन्हें खुद को राजनीति में बड़ी भूमिका के लिए तैयार करना पड़ा। वे बिहार के सबसे युवा मुख्यमंत्री थे। 1975 में जब वे मुख्यमंत्री बने थे तब उनकी उम्र केवल 38 साल थी। इस लिहाज से वे लालू यादव से भी यंग चीफ मीनिस्टर थे। लालू 42 साल की उम्र में सीएम बने थे। हालांकि सतीश प्रसाद सिंह 32 साल की उम्र में केवल तीन दिनों के लिए बिहार के कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने थे। चूंकि जगन्नाथ मिश्र ने नियमित सीएम के रूप में शपथ ली थी इस लिए उन्हें ही बिहार का सबसे युवा मुख्यमंत्री माना जाता है।

विद्वान शिक्षक से राजनेता

विद्वान शिक्षक से राजनेता

जगन्नाथ मिश्र सुपौल जिले के बलुआ बाजार के रहने वाले थे। उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पांच भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई ललित नारायण मिश्र कांग्रेस के दिग्गज नेता थे और इंदिरा गांधी के अत्यंत करीबी थे। जगन्नाथ मिश्र बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज थे। उन्होंने मुजफ्फरपुर के बिहार विश्वविद्यालय (अब भीम राव अंबेदकर बिहार विश्वविद्यालय) से इकोनॉमिक्स में एम और पीएचडी की। फिर इसी विश्वविद्यालय में उन्हें लेक्चरर की नौकरी मिल गयी। उनकी रिसर्च में गहरी दिलचस्पी थी। करीब 40 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित होने के बाद उनकी छवि एक काबिल अर्थशास्त्री के रूप में स्थापित हो गयी। फिर राजनीति की तरफ झुकाव हुआ। अपने बड़े भाई ललित नारायण मिश्र से प्रेरित हो कर वे भी कांग्रेस का सदस्य बन गये। 1968 में स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीत कर वे बिहार विधान परिषद का सदस्य बने। इस तरह एमएलसी के रूप में उनकी संसदीय राजनीति में इंट्री हुई थी।

1972 में पहली बार MLA

1972 में पहली बार MLA

1972 में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ तो डॉ. जग्नानथ मिश्र ने पहली बार मधुबनी के झंझारपुर से चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उनको जीत मिली। इसके बाद वे 1977, 1980, 1985 और 1990 में इस सीट से लगातार जीते। 1972 में वे पहली बार विधायक बने और बिहार सरकार में मंत्री भी। वे केदार पांडेय कैबिनेट में वे काबिल मिनिस्टर थे। इसी बीच जनवरी 1975 को उनके बड़े भाई और तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की समस्तीपुर में हत्या कर दी गयी। रेलवे के एक कार्यक्रम के लिए वे समस्तीपुर आये थे लेकिन बम धमाके में उनकी जान चली गयी थी। इसके बाद बिहार और कांग्रेस की राजनीति में खलबली मच गयी थी। कई तरह की अफवाहों से कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व घबरा गया था। बिहार और पार्टी में हालात पर काबू पाने के लिए इंदिरा गांधी ने अप्रैल 1975 में जगन्नाथ मिश्र को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी थी। ललित नारायण मिश्र की हत्या के चार महीने बाद वे पहली बार बिहार के सीएम बने थे। जब वे सीएम बने थे तब उनकी उम्र केवल 38 साल थी। वे करीब दो साल तक सीएम बने रहे। 1977 में इमरजेंसी खत्म होने के बाद जब कांग्रेस का सफाया हुआ तो उन्हें भी इस पद से रुखसत होना पड़ा।

जब इंदिरा सरकार के खिलाफ बोला

जब इंदिरा सरकार के खिलाफ बोला

1980 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की फिर वापसी हुई। जगन्नाथ मिश्र दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। वे आर्थिक मामलों के गहरे जानकार थे। 1983 में उन्होंने बिहार की हकमारी के खिलाफ केन्द्र सरकार घेरा था। उन्होंने बिहार विधानसभा में भाषण करते हए कहा कि देश का 40 फीसदी खनिज बिहार से निकलता है लेकिन उसे सिर्फ 18 फीसदी ही रॉयल्टी मिलती है (उस समय झारखंड बिहार में ही था)। यह केन्द्र सरकार की बिहार से नाइंसाफी है। केन्द्र सरकार इस व्यवस्था को तत्काल बदले। उन्होंने केन्द्र की वित्तीय संस्थाओं पर भी बिहार से भेदभाव करने का आरोप लगाया। जगन्नाथ मिश्र के इस भाषण से कांग्रेस में खलबली मच गयी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बेहद नाराज हो गयीं। उनकी पार्टी का मुख्यमंत्री उन्हें ही सार्वजनिक रूप से निशाना बना रहा था। जगन्नाथ मिश्र को दिल्ली तलब किया गया। उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने 23 जुलाई को विधासभा में यह भाषण दिया था और 14 अगस्त 1983 को उन्हें सीएम पद से हटा दिया गया था।

विवादों से भी नाता

विवादों से भी नाता

हालांकि जगन्नाथ मिश्र ने बिहार के हक के लिए आवाज बुलंद की थी लेकिन उनका यह कार्यकाल विवादित भी रहा था। अल्पसंख्यक मतों को ध्यान में रख कर उन्होंने 1980 में अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में उर्दू को राज्य की दूसरी सरकारी भाषा का दर्जा दे दिया था। उस समय भारत में सिर्फ जम्मू कश्मीर में ही उर्दू को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त थी। इसके अलावा उस समय किसी अन्य राज्य में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थीं। फिर तो उन्हें मौलाना जगन्नाथ कहा जाने लगा था। इसी तरह 1982 में प्रेस बिल को लेकर भी उनकी बहुत आलोचना हुई थी। इस बिल को प्रेस की आजादी पर हमला माना गया था।

कांग्रेस के आखिरी मुगल

अक्टूबर 1989 में भागलपुर का दंगा, बिहार की राजनीति का निर्णायक मोड़ है। जब ये दंगा जब हुआ था उस समय बिहार में कांग्रेस का शासन था। सत्येन्द्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री थे। राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। भयावह दंगे की वजह से कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश फैल गया था। उस तनाव के समय जब राजीव गांधी भागलपुर आये थे तब उनके साथ भी धक्की मुक्की हुई थी। राजीव गांधी ने जब सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को हटाने का फैसला किया तो संकट की घड़ी में उन्हें एक बार फिर जगन्नाथ मिश्र ही याद आये। पूरे बिहार में लोग इतने आक्रोशित थे कि उस समय कांग्रेस का कोई नेता सीएम नहीं बनना चाहता था। वे सोचते थे कि बलि का बकरा कौन बने। इस विकट परिस्थिति में जगन्नाथ मिश्र तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1990 के शुरू में बिहार विधानसभा का चुनाव होना था। कांग्रेस के खिलाफ ऐसी हवा बनी कि उसकी दुर्गति हो गयी। जगन्नाथ मिश्र कांग्रेस के आखिरी सीएम साबित हुए। इसके बाद तो बिहार में कांग्रेस लगातार कमजोर हो कर रोग शैय्या पर पड़ गयी और फिर कभी अपना सीएम नहीं बना सकी।

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