लोकसभा चुनाव 2019: नागपुर लोकसभा सीट के बारे में जानिए
नई दिल्ली: महाराष्ट्र की नागपुर लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद भाजपा नेता और केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी हैं। उन्होंने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता विलास मुत्तेमवार को 28, 48, 28 मतों से पराजित किया था। गडकरी को 58,77, 67 वोट मिले थे तो वहीं विलास मुत्तेमवार को मात्र 30,29, 19 वोटों पर संतोष करना पड़ा था।
साल 2014 के चुनाव में यहां पर कुल मतदाताओं की संख्या 19,00,787 थी, जिसमें से 10 लाख 85 हजार 58 लोगों ने यहां अपने मतों का प्रयोग किया था। इनमें पुरुषों की संख्या 5 लाख 79 हजार 529 और महिलाओं की संख्या 5 लाख 5 हजार 529 थी। साल 2014 के चुनाव में इस सीट पर नंबर 2 पर कांग्रेस, नंबर तीन पर बसपा और नंबर चार पर आप थी।

नागपुर लोकसभा सीट का इतिहास
नागपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत 6 विधानसभा क्षेत्र हैं। साल 1951 में अस्तित्व में आने के बाद से अब तक यहां अधिकतर मौकों पर कांग्रेस ने ही परचम लहराया है। आरएसएस मुख्यालय होने के बावजूद यहां से सिर्फ दो बार ही बीजेपी की जीत नसीब हुई है। साल 1952 से लेकर साल 1991 तक यहां केवल कांग्रेस का ही राज रहा है, साल 1996 में पहली बार यहां भाजपा ने जीत का स्वाद चखा और तब यहां से बनवारीलाल पुरोहित जीतकर लोकसभा पहुंचे थे लेकिन इसके बाद साल 2014 तक भाजपा को यहां पर जीत के लिए इंतजार करना पड़ा। साल 2014 के चुनाव में भाजपा पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने चार बार यहां से चुने गए सांसद विलास मुत्तेमवार को हराया था।
नागपुर परिचय-प्रमुख बातें-
महाराष्ट्र की उपराजधानी कहे जाने वाले नागपुर भारत का 13वां और विश्व का 114 वां सबसे बड़ा शहर हैं। यह नगर संतरों के लिये काफी मशहूर है, इसलिए इसे 'संतरों की नगरी' भी कहते हैं। हाल ही में इस शहर को देश के सबसे स्वच्छ और सुंदर शहर का इनाम मिला है। नागपुर भारत देश का दूसरे नंबर का ग्रीनेस्ट (हरित शहर) शहर माना जाता है। नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों का प्रमुख केंद्र है, नाग नदी के नाम पर इस शहर का नाम नागपुर पड़ा, इसकी कुल आबादी 24,05,665 है।
नागपुर में ही जन्मे नितिन गडकरी, भारत सरकार में सड़क परिवहन-राजमार्ग, जहाज़रानी, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री हैं। इससे पहले 2010-2013 तक वो भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। 52 वर्ष की आयु में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनने वाले गडकरी भाजपा के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष थे, राजनेता के साथ-साथ गडकरी सफल उद्यमी भी हैं। यहां के चुनाव में मतों का जातीय समीकरण भी काफी मायने रखता है। डां. बाबासाहब आंबेडकर की कर्मभूमि और दीक्षाभूमि यही है।
दलित समुदाय का रुझान चुनाव परिणाम के लिए प्रभावी रहता है। मुस्लिम समुदाय की संख्या भी यहां अधिक है जो कि निर्णायक वोटों में अहम रोल निभाते हैं, अक्सर यहां कि ताजपोशी दलित ,मुस्लिम मतों के विभाजन के आधार पर होती आई है, जिसका फायदा कांग्रेस को मिलता रहा है और इसी कारण आरएसएस का गढ़ होने के बावजूद यहां से भाजपा को विजयश्री हासिल करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा है। लेकिन साल 2014 के चुनाव में कांग्रेस के सारे गणित यहां पर फेल हो गए थे, जिसकी वजह से उसे यहां हार का सामना करना पड़ा था और बीजेपी को जीत हासिल हुई थी लेकिन क्या इस बार भी ऐसा ही कुछ होगा या फिर यहां की जनता फिर से अपने पुराने साथी को चुनेगी, ये सवाल हर किसी के जेहन में घूम रहा है, जिसका जवाब हमें चुनावी नतीजे देंगे।
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