लोकसभा चुनाव 2019- अररिया लोकसभा सीट के बारे में जानिए

नई दिल्ली: बिहार की अररिया लोकसभा सीट सें सांसद राजद के सरफराज़ आलम हैं। 2006 में भारत सरकार ने इस जिले को देश ढाई सौ सबसे पिछड़े जिलों में शामिल किया था। आज 12 साल बात भी हालात बहुत अच्‍छे नहीं हैं। अररिया मुख्‍य रूप से कृषि पर निर्भर है। यहां पर बहुत कम फैक्ट्रियां हैं जिसकी वजह से बेरोजगारी यहां की एक बड़ी समस्‍या है। उससे भी बड़ी समस्‍या हर साल आने वाली बाढ़ है, जिस पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये हैं। 2017 में बिहार के 19 जिलों में बाढ़ आयी, जिनमें अररिया भी शामिल था और बाढ़ में इस जिले से करीब 90 लोगों की मौत हुई। पिछले अठ्ठारह सालों में केवल अररिया में बाढ़ की चपेट में आने से 215 लोग मारे जा चुके हैं। कुल मिलाकर देखा जाये तो दिल्‍ली में बैठे हमारे सांसदों को इस जिलो को खास तवज्जो देनी चाहिये। खैर बिहार को दी जाने वाली विशेष राशि अररिया के खाते में भी जाती है।

profile of Araria lok sabha constituency

सरफराज़ आलम का लोकसभा में प्रदर्शन

2019 के चुनावों के पहले अगर सांसद की परफॉरमेंस पर नज़र डालें तो सरफराज़ आलम ने सांसद बनने के बाद से दिसम्‍बर 2018 तक सदन में 10 मुद्दे उठाये, जबकि इस दौरान राज्‍य का औसत 21 और राष्‍ट्रीय औसत 34 प्रश्‍नों का रहा। सांसद बनने के बाद से उन्‍होंने लोकसभा में 85 फीसदी उपस्थिति दर्ज करायी। वो मार्च में उपचुनाव जीतने के बाद जब जुलाई के मॉनसून सत्र में आप पहली बार गये, तो सबसे पहले किसानों की सबसे बड़ी समस्‍या, यानी कोल्‍ड स्‍टोरेज की कमी का उठाया।

अगर इतिहास की ओर पलट कर देखें तो इस सीट पर 1998 के बाद से लगातार राजद और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली। हालांकि उससे पहले यानी कि 1989 से 1998 तक यहां पर जनता दल का कब्‍जा रहा। जनता दल के सुखदेव पासवान सबसे लंबे समय तक रहने वाले सांसद रहे हैं। खास बात यह है कि अररिया में मुस्लिम आबादी 42.9 से अधिक है और कुल 56.6 प्रतिशत हिन्‍दू हैं। 1998 में भाजपा के रामजी दास यहां से जीते। उनके बाद से हर पांच साल पर यहां पर भाजपा और राजद बारी-बारी से आ रही हैं। 2004 में राजद के टिकट पर लड़ने वाले सुखदेव पासवान सांसद बने और अगले ही चुनाव यानी 2009 में भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह ने यह सीट उनसे छीन ली। 2014 में फिर से राजद ने यह सीट वापस छीन ली।

इस सीट की छीना-झपटी का खेल 2019 में जारी रहेगा या नहीं, यह निर्भर करेगा यहां किसान भाईयों पर। राजद ने यहां कौन-कौन से विकास कार्य किये, और सांसद के कार्य कितने कारगर साबित हुए। यह जनता को तय करना है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा एक बार फिर राजद को यहां कड़ी टक्‍कर देगी, क्‍योंकि भाजपा का वोट शेयर यहां 43 फीसदी से ज्यादा है, जोकि मात्र पांच प्रतिशत कम है। यानी अगर भाजपा 2019 में पांच का पंच लगाने में कामयाब हो जाती है, तो सरफराज़ आलम के लिये मुश्किलें हो सकती हैं।

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