अब वेस्ट यूपी में प्रियंका गांधी पर दांव लगाएगी कांग्रेस? उपचुनाव में पता चलेगा पास होंगी या फेल
नई दिल्ली- राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को बड़ी उम्मीद से पूर्वी यूपी का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया था। उनपर लोकसभा चुनाव के ठीक पहले मृतप्राय हुए संगठन में जान फूंककर चमत्कार कर दिखाने की जिम्मेदारी थी। लेकिन, उनका सियासी सिक्का खोटा निकला। वैसे ये सच है कि उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से सत्ता से दूर कांग्रेस में प्राण डालने के लिए उनके पास समय नहीं था। लेकिन, नतीजे सोच से भी ज्यादा निराशाजनक रहे। अब शायद कांग्रेस इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि उन्हें अगर अभी से वक्त मिल गया, तो वो जरूर कुछ करके दिखा सकती हैं। इसलिए, इस बात के हर तरफ से संकते मिल रहे हैं कि उन्हें पूर्वी यूपी के साथ-साथ पश्चिमी का जिम्मा दिए जाने की भी तैयारी है। यानी अब कांग्रेस समूचे उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी उन्हें सौंप देगी, ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि प्रियंका के लिए नया टास्क कैसा होगा?

वेस्ट यूपी में पार्टी का क्या है हाल?
राहुल गांधी ने प्रियंका के साथ ही पश्चिमी यूपी में चुनाव देखने का जिम्मा ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपा था। लेकिन, फतेहपुर सीकरी और सहारनपुर छोड़कर किसी भी सीट पर पार्टी की जमानत भी नहीं बची। आरोप लगे कि उन्होंने पूरी सक्रियता नहीं दिखाई और ज्यादातर वक्त जमीन पर काम करने की जगह वे प्रियंका और राहुल गांधी के साथ दूसरे इलाकों में व्यस्त रहे। नतीजे आने के करीब सवा महीने बाद उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी समझ में आई और वे अपने पद से मुक्त हो गए। अब अगर उनकी जगह प्रियंका यहां पर संगठन को खड़ा करने का प्रयास करेंगी तो उनके सामने भी कई चुनौतियां होंगी। पश्चिमी यूपी में कांग्रेस का कोई सांसद तो नहीं ही है, विधायकों की संख्या भी केवल दो है। दोनों विधायक भी सहारनपुर जिले में ही हैं, जहां लोकसभा में पार्टी ने किसी तरह से जमानत बचाई है।

उपचुनाव से ही लग जाएगा अंदाजा
इस साल कुछ महीने के अंदर यूपी में जिन 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से चार सीटें- गंगोह, इगलास, रामपुर और टूंडला वेस्ट यूपी में हैं। 2017 में इन चारों में से एक भी सीट कांग्रेस नहीं जीती थी। यही नहीं इस इलाके में जिला पंचायत, नगर पालिका और नगर पंचायतों में कहीं-कहीं ही कांग्रेस से जुड़े अध्यक्ष या चेयरमैन हैं। सच कहें तो कांग्रेस के पास इस इलाके में अच्छे उम्मीदवारों का भी अभाव है। अगर प्रियंका पश्चिमी यूपी की कमान भी संभालती हैं, तो उनके पास सबसे पहले उपचुनाव के लिए कोई उर्जावान युवा या नामचीन प्रत्याशियों को मैदान में उतारने की चुनौती होगी। इनके अलावा पूर्वी यूपी की 8 सीटों पर भी पार्टी को बेहतर प्रदर्शन करके दिखाना होगा, तभी 2022 में अपने दम पर कांग्रेस मैदान में भी टिक भी पाएगी।

कैसे घटता चला गया सबसे पुरानी पार्टी का जनाधार?
1951-52 के पहले आम चुनाव में यूपी में 86 सीटें थीं, जिनमें से कांग्रेस ने 81 पर जीत हासिल की थी। तब उसे 52.99 % वोट मिले थे। लेकिन, कांग्रेस का प्रदेश में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन 1984 में इंदिरा लहर में देखने को मिला। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति वोट बटोरकर पार्टी 85 में से 83 सीटें जीतने का रिकॉर्ड दर्ज कर गई। लेकिन, 1989 के चुनाव के बाद से न सिर्फ कांग्रेस का वहां जनाधार खिसकना शुरू हुआ, बल्कि वह इस कदर यहां सत्ता से दूर हो गई कि अब उसके लिए उसका सपना देखना भी असंभव सा लगता होगा। 1991 के बाद के चुनावों में उसके हालात बद से बदतर होते चले गए। 1999 में उसने किसी तरह से 10 सीटें जीतीं। लेकिन, 2004 में फिर से घटकर 9 सीटों पर पहुंच गई। 1984 के बाद उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन 2009 में देखने को मिला जब पार्टी ने वहां 21 सीटें जीती लीं। पर 2014 के बाद से बीजेपी की बढ़त ने कांग्रेस के प्रदर्शन पर ऐसा पलीता लगाया है कि पार्टी को फिर से रेस में लाना भगीरथ प्रयास करने से कम नहीं। 2014 में वह 2 सीटें जीती और उसे महज साढ़े सात प्रतिशत वोट मिले। 2019 में तो वह केवल रायबरेली की सीट ही जीत सकी है और वोट शेयर भी घटकर सिर्फ 6.3% पर आ पहुंचा है।

2022 की चुनौती बच्चों का खेल नहीं
10 साल के यूपीए सत्ता के दौरान कांग्रेस पार्टी ने किसी तरह से यूपी में अपनी एक पहचान बनाने की कोशिश की थी। खासकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के चलते प्रदेश में पार्टी का रसूख भी दिख रहा था। लेकिन, 2014 के बाद से यूपी में कांग्रेस का रसूख तो नहीं ही बचा है, वजूद बचाने का संकट भी आ खड़ा हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनाव में उसने किसी तरह अगर साढ़े सात फीसद वोट बटोरे थे, तो 2017 के विधानसभा चुनाव आते-आते वह महज 6.25% तक जा गिरा। इस चुनाव में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की बहुप्रचारित जोड़ी भी पार्टी को 7 सीटों से आगे बढ़ने का हौसला नहीं दे पाई। कांग्रेस का ये हाल उस राज्य में है, जहां 1980 के विधानसभा में उसने 424 में से 309 सीटें जीती थी और 1985 में भी उसे 269 सीटें मिले थे। लेकिन, 90 के दशक आते-आते उसके 80 फीसदी से ज्यादा उम्मीदवारों के सामने जमानत बचाने के लाले पड़ने शुरू हो गए।
यूं समझ लीजिए कि अगर वाकई प्रियंका गांधी लोकसभा चुनाव में करारी हार से सीख लेकर पार्टी को अब प्रदेश की राजनीति की मुख्यधारा में लाना चाहती हैं, तो उन्हें वहां शून्य से शुरू करना होगा।
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