Bangladesh Sheikh Hasina: शेख हसीना के लिए देवदूत बनी ये तीन शख्सियत! जानिए कब-कहां और कैसे?
Bangladesh: बांग्लादेश में एक लंबी पारी खेलने के बाद शेख हसीना की सरकार का 5 अगस्त 2024 को पतन हो गया। जान जोखिम में पडते ही शेख हसीना अपनी छोटी बहन शेख रेहाना को लेकर हेलीकॉप्टर से शरण की तलाश में भारत पहुंची। बहुत ही कम दरम्यान में हसीना ने भारत से शरण के लिए इजाजत मांगी। यह उसी तरह का पल था, हसीना के लिए, जब 15 अगस्त 1975 में उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान का कत्ल हुआ और उन्हें शरण के लिए भटकना पड़ा। तब महज हसीना 28 साल की थीं।
यह तो गनीमत थी, उस वक्त उनके साथ दुख बांटने के लिए पति साथ में थे। तब भी भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया था, इस बार भी उसी ने ही आसरा दिया। मानों भारत शेख हसीना के लिए वरदान साबित हुआ है। वहीं, यह तीन शख्सियत उनके लिए देवदूत से कम नहीं हैं। जिन्होंने उनकी उस वक्त मदद की, जब उन्हें जान बचाने के लिए दर-दर भटकना पड रहा। आइए आपको रूबरू कराते हैं कौन हैं शख्सियत? कब कहां और कैसे? हसीना के लिए देवदूत बने....

हुमांयु रशीद चौधरी
15 अगस्त 1975 यह वक्त शेख हसीना के लिए सबसे दर्दनाक रहा, जब उन्हें फोन से पता चला था कि पिता रहमान का कत्लेआम हो चुका है। उस वक्त हसीना पति डॉ. वाजेद और बहन के साथ ब्रसेल्स में बांग्लादेश के राजदूत सनाउल हक के यहां थी और पेरिस निकलने की तैयारी में लगी थीं। उस वक्त जर्मनी में बांग्लादेश के राजदूत हुमांयु रशीद चौधरी से मिली दुखद घटना ने हसीना को सबसे बडा दर्द दिया।
इस बीच, राजदूत सनाउल हक ने मदद का हाथ खींच लिया। तब हुमांयु रशीद चौधरी देवदूत बनकर उभरे। उन्होंने हसीना और उनकी बहन रेहाना को जर्मनी बुलाया और आसरा दिया।
इंदिरा गांधी
1975 में पिता की मौत के बाद हसीना के रहने का संकट गहराता गया। हुमांयु रशीद चौधरी ने पश्चिमी जर्मनी में भारत के राजदूत वाई से शेख हसीना और उनके परिवार को राजनीतिक शरण देने के लिए भारत का जिक्र किया। उस वक्त भारत में इंदिरा गांधी की सरकार थी, जो आपातकाल की स्थिति से गुजर रही थी। जब हसीना के रहने का कोई ठिकाना तय नहीं हुआ, चौधरी ने थक-हार कर इंदिरा गांधी के दफ्तर फोन मिलाया। इंदिरा गांधी से सारी बात बताई। यह दूसरा पल था, जब मुसीबत के वक्त में देवदूत बनकर भारत की पीएम रहीं इंदिरा गांधी ने मदद का हाथ बढ़ाया।
इंदिरा ने, तुरंत हसीना के परिवार को 24 अगस्त, 1975 को एयर इंडिया के विमान से दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुंचा। सबसे पहले रॉ के 56, रिंग रोड स्थित सेफ हाउस में ले जाया गया। उसके बाद, हसीना को इंडिया गेट के पास पंडारा पार्क के सी ब्लाक में एक फ्लैट आवंटित किया गया।
1977 के हुए चुनाव में इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं। भारत के नए प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने हसीना के परिवार को शरण देने में कुछ खास रुचि नहीं दिखाई। धीरे-धीरे उन पर देश छोड़ने का दबाव डाला गया। लेकिन, वो कहते हैं न ऊपर वाला किसी न किसी रूप में मदद भेज ही देता है। कुछ ऐसा ही हसीना के साथ हुआ। जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी एक बार फिर सत्ता में आ गईं। शेख हसीना की सारी परेशानियां मानों पलक झपते ही दूर हो गईं। यह दूसरी बार था, जब इंदिरा हसीना के परिवार के लिए देवदूत बनीं।

पीएम नरेंद्र मोदी
भारत के वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने पिछले दो कार्यकाल के दौरान बांग्लादेश के साथ संबंधों को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। नरेंद्र मोदी और शेख हसीना ने दोनों देशों के बीच व्यापार, परिवहन, ऊर्जा और संपर्क को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। दोनों नेताओं ने आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ संयुक्त रूप से लड़ने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
बांग्लादेश में आतंकी गतिविधियों के खिलाफ मोदी सरकार ने शेख हसीना को समर्थन दिया है। ऐसे में हसीना का कई बार भारत में दौरा भी हुआ है। जब भी दोनों नेताओं की मुलाकात किसी मंच पर होती है, तो आदर और सत्कार की परिभाषा को व्यक्तिगत रूप से देखा जा सकता है।
हिंसा के बीच जैसे ही 5 अगस्त 2024 को हसीना ने बांग्लादेश प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया, उन्होंने भारत से बात की। बहुत ही कम वक्त में भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया और हेलीकॉप्टर से हिंडन एयरबेस पर पहुंची हसीना को सुरक्षा के साथ गुप्त जगह आसरा दिया। मुसीबत के वक्त में, पीएम नरेंद्र मोदी हसीना और उनकी बहन रेहाना के लिए देवदूत से कम नहीं थे।
एक नजर में समझें
- जर्मनी में बांग्लादेश के राजदूत रहे हुमांयु रशीद चौधरी- 15 अगस्त 1975 को दिया आसरा।
- भारत की पूर्व पीएम इंदिरा गांधी- 1975 और 1980 में बनी मददगार।
- भारत के पीएम नरेंद्र मोदी- 5 अगस्त 2024 को बने देवदूत।












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